By डॉ. अनिमेष शर्मा | Oct 16, 2026
स्मार्टवॉच अब केवल समय देखने, फिटनेस ट्रैक करने और कॉल का जवाब देने तक सीमित नहीं रह गई हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से इन डिवाइसेज में ऐसे फीचर्स शामिल किए जा रहे हैं, जो आसपास की आवाजों को समझने, बातचीत को टेक्स्ट में बदलने और उसका सार तैयार करने में सक्षम हैं। हालांकि, इस तरह की तकनीक जितनी सुविधाजनक दिखाई देती है, उतने ही गंभीर सवाल व्यक्तिगत गोपनीयता को लेकर भी खड़े करती है।
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लेकिन सवाल यह है कि क्या ऐसी सुविधा के लिए दिनभर आसपास की आवाजों को सुनने की जरूरत होनी चाहिए? यदि कोई डिवाइस लगातार ध्वनि का विश्लेषण करती है, तो यूजर्स के साथ-साथ उनके आसपास मौजूद लोगों की निजता भी चर्चा का विषय बन जाती है।
मान लीजिए कि आप किसी कैफे में दोस्तों के साथ बैठे हैं या ऑफिस में किसी गोपनीय मीटिंग का हिस्सा हैं। ऐसे में आप उम्मीद करते हैं कि आपकी बातचीत उसी माहौल तक सीमित रहेगी। लेकिन यदि वहां मौजूद कोई व्यक्ति AI फीचर वाली स्मार्टवॉच पहनता है, तो दूसरे लोगों के मन में यह सवाल उठ सकता है कि उनकी बातें किस तरह प्रोसेस की जा रही हैं।
तकनीक और निजता के बीच इसी संतुलन को समझने के लिए 'कॉन्टेक्स्चुअल इंटीग्रिटी' की अवधारणा महत्वपूर्ण है। इसका मतलब है कि निजी जानकारी का इस्तेमाल उसी संदर्भ और परिस्थिति के अनुरूप होना चाहिए, जिसमें उसे साझा किया गया है। केवल डेटा सुरक्षित होने का दावा करना पर्याप्त नहीं है; लोगों की सहमति और पारदर्शिता भी जरूरी हैं।
एपल लंबे समय से अपनी डिवाइसेज में डेटा सुरक्षा को प्रमुखता देने का दावा करता रहा है। कंपनी की प्राइवेसी तकनीकों में ऑन-डिवाइस प्रोसेसिंग और चुनिंदा AI कार्यों के लिए प्राइवेट क्लाउड कंप्यूट जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। इनका उद्देश्य संवेदनशील जानकारी को सुरक्षित रखना और डेटा तक अनावश्यक पहुंच सीमित करना है।
हालांकि, किसी भी तकनीक की सुरक्षा का आकलन उसके डिजाइन, वास्तविक कार्यप्रणाली और स्वतंत्र जांच के आधार पर किया जाना चाहिए। यूजर्स को यह समझना जरूरी है कि कौन-सा डेटा डिवाइस पर प्रोसेस होता है, कौन-सी जानकारी सर्वर तक जाती है और उसे कितनी देर तक रखा जाता है।
कैमरे और माइक्रोफोन से लैस वियरेबल डिवाइसेज के बढ़ते इस्तेमाल ने सार्वजनिक स्थानों पर निजता से जुड़े नए विवाद पैदा किए हैं। स्मार्ट ग्लासेज की मदद से वीडियो रिकॉर्डिंग संभव होने के कारण कुछ संस्थानों और स्थानों पर उनके इस्तेमाल को लेकर प्रतिबंध या नियम बनाए जा सकते हैं।
भविष्य में स्मार्टवॉच और दूसरे AI डिवाइसेज के लिए भी इसी तरह के दिशानिर्देशों की जरूरत महसूस हो सकती है। खासकर अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों, कार्यालयों और गोपनीय बैठकों में यह तय करना जरूरी होगा कि ऐसी तकनीक का इस्तेमाल कहां और किन शर्तों पर किया जा सकता है।
यूजर्स को किसी भी नए फीचर को सक्रिय करने से पहले उसकी परमिशन, प्राइवेसी सेटिंग्स और डेटा प्रोसेसिंग से जुड़ी शर्तें पढ़नी चाहिए। जरूरत न होने पर माइक्रोफोन एक्सेस और संबंधित AI सुविधाओं को बंद रखना बेहतर विकल्प हो सकता है। साथ ही, संवेदनशील बातचीत के दौरान दूसरे लोगों की सहमति का सम्मान करना भी जरूरी है।
AI तकनीक का उद्देश्य रोजमर्रा के काम आसान बनाना है, न कि लोगों को लगातार निगरानी में होने का एहसास कराना। इसलिए तकनीकी कंपनियों को सुविधा के साथ पारदर्शिता, जवाबदेही और सहमति को भी प्राथमिकता देनी होगी। आखिरकार, स्मार्ट डिवाइस कितनी भी आधुनिक क्यों न हो, व्यक्तिगत गोपनीयता से समझौता करके हासिल की गई सुविधा लंबे समय तक भरोसा नहीं जीत सकती।
- डॉ. अनिमेष शर्मा