By नीरज कुमार दुबे | Jan 17, 2026
संगीत जगत के सबसे प्रभावशाली नामों में शुमार एआर रहमान इन दिनों चर्चा में हैं, लेकिन वजह उनकी कोई नई रचना नहीं, बल्कि वह बयान हैं जिनमें उन्होंने कथित रूप से अपने धर्म के कारण पिछले लगभग एक दशक से हिंदी फिल्म उद्योग में काम कम मिलने का संकेत दिया। जिस तरह से उनके इन बयानों को हिंदी सिनेमा जगत की कई वरिष्ठ और प्रतिष्ठित हस्तियां सिरे से खारिज कर रही हैं, वह साफ करता है कि प्रख्यात संगीतकार ने बॉलीवुड को धर्म के चश्मे से देखकर एक बुनियादी भूल की है। हिंदी सिनेमा एक ऐसा मंच रहा है जहां पहचान नहीं, बल्कि प्रतिभा निर्णायक रही है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस उद्योग ने रहमान को सिर आंखों पर बैठाया, उसी के स्वभाव को वह आज तक नहीं समझ पाए, यह हैरानी का विषय नहीं तो और क्या है?
हम आपको बता दें कि बीबीसी एशियन नेटवर्क को दिये गये इस साक्षात्कार में एआर रहमान ने कहा, ''फिल्म उद्योग में सत्ता संतुलन बदला है और संभव है कि इसके पीछे कोई साम्प्रदायिक पहलू भी हो, हालांकि यह बात उनके सामने सीधे तौर पर कभी नहीं आई।'' एआर रहमान के अनुसार उन्हें यह सब सीधे नहीं बताया जाता, बल्कि कानों कान खबर के रूप में पता चलता है। उनका कहना है कि वह काम की तलाश में नहीं रहते, बल्कि चाहते हैं कि उनके काम की सच्चाई खुद काम को उनकी ओर खींच लाए। उन्होंने इसे अपनी आस्था और कार्यशैली से जोड़ा और कहा कि वह जबरन अवसर खोजने में विश्वास नहीं रखते।
दिलचस्प बात यह है कि नब्बे के दशक में जब रहमान ने हिंदी फिल्म जगत में कदम रखा, तब उन्हें किसी भेदभाव का अनुभव नहीं हुआ। वह कहते हैं कि शायद उस समय ईश्वर ने ऐसी बातों से उन्हें दूर ही रखा। लेकिन हाल के वर्षों में परिस्थितियां बदली हैं। उनके अनुसार अब निर्णय की शक्ति कई बार ऐसे लोगों के हाथ में है जिनका रचनात्मकता से सीधा संबंध नहीं है। कभी कभी यह भी सुनने में आता है कि किसी परियोजना के लिए उन्हें चुना गया था, लेकिन बाद में संगीत कंपनी ने अन्य संगीतकारों को साथ लेकर काम कर लिया।
साक्षात्कार में रहमान ने यह भी कहा कि वे ऐसी फिल्मों से दूरी बनाने की कोशिश करते हैं जिनकी मंशा उन्हें ठीक नहीं लगती। इसी संदर्भ में उनसे हाल में आई एक ऐतिहासिक फिल्म में उनके काम को लेकर सवाल किया गया था। उन्होंने स्वीकार किया कि फिल्म विभाजन की भावना पर आधारित लग सकती है, लेकिन उनका मानना है कि इसका मूल उद्देश्य साहस और शौर्य को दिखाना था। उन्होंने यह भी कहा कि दर्शक इतने समझदार हैं कि वह सच्चाई और चालाकी में फर्क कर सकते हैं। उल्लेखनीय है कि यह फिल्म जो छत्रपति संभाजी महाराज के जीवन पर आधारित है, फरवरी 2025 में प्रदर्शित हुई और ऐतिहासिक तथ्यों को लेकर तीखी बहस के बावजूद व्यापारिक रूप से अत्यंत सफल रही। इसकी कुल कमाई लगभग सात सौ करोड़ रुपये बताई गई।
दूसरी ओर, रहमान की टिप्पणी ने कला जगत में तीखी प्रतिक्रियाएं पैदा की हैं। वरिष्ठ गीतकार और पटकथा लेखक जावेद अख्तर ने इस विचार से असहमति जताई है। उनका कहना है कि उन्होंने कभी ऐसा माहौल महसूस नहीं किया। जावेद अख्तर ने कहा कि मुंबई में रहमान को अपार सम्मान मिलता है लेकिन कई छोटे निर्माता उनसे संपर्क करने में हिचकिचाते हैं। उनका मानना है कि रहमान की व्यस्त अंतरराष्ट्रीय जीवनशैली भी काम कम होने का एक कारण हो सकती है, न कि कोई साम्प्रदायिक तत्व।
वहीं लेखिका और स्तंभकार शोभा डे ने रहमान की टिप्पणी को खतरनाक बताया। उन्होंने कहा कि पिछले पांच दशकों के अनुभव में उन्होंने हिंदी फिल्म उद्योग को प्रतिभा के आधार पर चलने वाला क्षेत्र पाया है, जहां धर्म आड़े नहीं आता। गायक शान ने भी इसी तरह की राय रखते हुए कहा कि काम मिलना या न मिलना व्यक्तिगत परिस्थितियों और पसंद नापसंद पर निर्भर करता है। ऐसी ही टिप्पणियां कई अन्य कलाकारों की भी रहीं।
देखा जाये तो एआर रहमान की यह आशंका कि हिंदी फिल्म उद्योग में उनके लिए अवसर कम होने के पीछे कोई साम्प्रदायिक कारण हो सकता है, न केवल कमजोर तर्क पर आधारित दिखती है बल्कि बॉलीवुड के लंबे इतिहास और वर्तमान सच्चाई से भी मेल नहीं खाती। हिंदी सिनेमा की बुनियाद ही विविधता, समावेश और प्रतिभा की स्वीकृति पर टिकी रही है। यहां धर्म नहीं, बल्कि दर्शकों से जुड़ने की क्षमता और काम की गुणवत्ता निर्णायक रही है।
अगर बॉलीवुड में सचमुच धर्म के आधार पर भेदभाव होता, तो यह कल्पना भी संभव नहीं होती कि पिछले तीन दशकों से उद्योग के सबसे बड़े सितारे तीन मुसलमान कलाकार होते। शाहरुख खान, सलमान खान और आमिर खान न केवल व्यावसायिक सफलता के शिखर पर हैं, बल्कि उन्हें देश के हर वर्ग, हर धर्म और हर क्षेत्र से अपार प्रेम मिला है। उनके प्रशंसकों की संख्या लगातार बढ़ती रही है और उनकी फिल्मों ने सैंकड़ों करोड़ रुपये का कारोबार किया है। यह तथ्य अपने आप में इस धारणा को खारिज करने के लिए पर्याप्त है कि बॉलीवुड में धर्म किसी कलाकार की राह रोकता है।
हिंदी फिल्म उद्योग में संगीत, लेखन, अभिनय और निर्देशन जैसे रचनात्मक क्षेत्रों में अनगिनत उदाहरण हैं, जहां कलाकारों को उनकी पहचान या आस्था के कारण नहीं, बल्कि उनके हुनर के कारण स्वीकार किया गया। जावेद अख्तर, सलीम खान, मजरूह सुल्तानपुरी और नौशाद जैसे नाम इस बात की गवाही देते हैं कि यह उद्योग प्रतिभा को सिर आंखों पर बैठाता है। एआर रहमान निस्संदेह एक महान संगीतकार हैं और उनके योगदान पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता। लेकिन बदलते दौर में काम की मात्रा कम या ज्यादा होना कई व्यावसायिक और रचनात्मक कारणों से जुड़ा हो सकता है। इसे सीधे साम्प्रदायिक नजरिये से देखना न तो उद्योग के साथ न्याय करता है और न ही स्वयं रहमान की उस वैश्विक छवि के साथ, जो संगीत को सीमाओं और पहचानों से परे मानती है।
आज जरूरत इस बात की है कि ऐसे कयासों की बजाय आत्मविश्लेषण और बदलती कार्यप्रणाली को समझा जाए। बॉलीवुड को संदेह के कटघरे में खड़ा करने की बजाय, रहमान जैसे कलाकारों को अपनी ही विरासत पर भरोसा रखना चाहिए। यह उद्योग आज भी उसी सिद्धांत पर चलता है जिस पर वह दशकों से चलता आया है यानि प्रतिभा ही सबसे बड़ा धर्म है।
-नीरज कुमार दुबे