By शुभा दुबे | Apr 02, 2025
अग्निदेव महाराज दशरथ को खीर देकर अदृश्य हो गये। उसके बाद महाराज दशरथ ने अपनी रानियों को बुलाया और सबको यथायोग्य खीर का वितरण किया। अग्निदेव के द्वारा दिये गये प्रसाद के प्रभाव से कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी, तीनों रानियां गर्भवती हो गयीं। जिस दिन से भगवान कौशल्या के गर्भ में आये, उसी दिन से संपूर्ण लोकों की संपत्ति सिमट कर अयोध्या में आ गयी। चारों तरफ सुख और शांति का साम्राज्य छा गया। भगवान का अंश सुमित्रा और कैकेयी के गर्भ में भी आ चुका था। इसलिए सब रानियां शोभा, शील और तेज की खान दिखायी पड़ने लगीं।
कौशल्या अंबा की विनती सुनकर प्रभु शिशु रूप में आ गये और अपने रुदन से महल को गुंजा दिया। फिर क्या था, दासियों के माध्यम से पूरी अयोध्या में कौशल्या अंबा को पुत्र होने का समाचार फैल गया। संपूर्ण अयोध्यावासी आनंद से झूम उठे। महाराज दशरथ तो पुत्र जन्म का समाचार सुनकर ब्रह्मानंद में मग्न हो गये। प्रेम के आवेग को रोकना उनके लिए कठिन हो रहा था। वे सोचने लगे कि जिन प्रभु के नाम स्मरण मात्र से विघ्नों का विनाश होता है और संपूर्ण शुभों की प्राप्ति होती है, वही मेरे यहां अवतरित हुए हैं। उन्होंने तुरंत सेवकों को बुलाकर बाजा बजवाने एवं गुरु वसिष्ठ को सादर बुलाने की आज्ञा दी। राजा का संदेश सुनकर वसिष्ठजी तुरंत चले आये और वेदविधि के अनुसार नांदीमुख-श्राद्ध तथा भगवान का जातकर्म संस्कार करवाया। कैकेयी जी की कोख से एक पुत्र तथा सुमित्रा को दो पुत्र पैदा हुए। नगर की वधूटियां अपने अपने सिर पर मंगल कलश लेकर गाती हुईं महाराज दशरथ के राज भवन में आयीं। महाराज दशरथ ने ब्राह्मणों को अनेकों प्रकार के दान देकर संतुष्ट किया। इस प्रकार आनन्दोत्सव और उल्लास में कुछ दिन बीत गये। गुरु वसिष्ठ ने समय पर चारों कुमारों का नामकरण संस्कार किया। उन्होंने कौशल्या के पुत्र का नाम राम, कैकेयी के पुत्र का भरत तथा सुमित्रा के पुत्रों का नाम लक्ष्मण और शत्रुघ्न रखा।
- शुभा दुबे