हमले का हलवा (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Aug 25, 2025

अगर हम इसे हलवे का हमला लिखें तो नया और स्वादिष्ट लगेगा। हमला अगर बड़े और प्रसिद्ध लोगों पर हो तभी आम लोगों को हलवे जैसा स्वाद मिलता है। कोई बताएगा, ऐसा लगा रहा है। वो कहेंगे, नहीं नहीं वैसा लग रहा है। आम आदमी पर हुए हमले बारे कोई बात नहीं करता। महान होने के चक्कर में राजनेता, सार्वजनिक रूप से बातों, फिल्मी अंदाज़ में डायलाग और अपनी ही तरह की गुस्ताखियों के माध्यम से हमला करते रहते हैं। एक दूसरे को जानवर भी बताते रहते हैं। पहले हमले में मज़ा न आए तो दूसरे हमले को, हलवे की तरह स्वादिष्ट बनाकर समाज में बांट देते हैं। एक दूसरे की राजनीतिक सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक योजनाओं को गलत, अनुपयोगी और बेस्वाद बताते रहते हैं। चाहते हैं, जनता शासकों से अभी इस्तीफा लेकर उन्हें मंत्री बना दें।

जब कोई तीसरा बंदा हमला करता है तो उसकी कड़ी निंदा की जाती है। हमले को लोकतंत्र के खिलाफ बताया जाता है। उसे आरोपी बताकर कड़ी से कड़ी कार्रवाई की मांग की जाती है। उन्हें पता है आम आरोपी के खिलाफ तो कार्रवाई हो ही सकती है। इसलिए महात्मा गांधी को बीच में लाया जाता है, जैसे वे बीच में आने को तैयार खड़े हों। कहा जाता है कि उन्होंने तो पिछली सदी में कह दिया था कि हमारे देश और समाज में किसी भी तरह की हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है। कहा जाता है कि हमला करने वाले के पीछे कोई है जिसकी सुनियोजित साज़िश है, क्यूंकि यह हमला साधारण नहीं है। नफरत से भरा है। ऐसा हमला पहले कभी नहीं देखा गया। हमला वीभत्स और दुर्भाग्यपूर्ण है।

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हमले से कमज़ोर, सामान्य, छोटे और गरीब आदमी का शारीरिक और मनोबल एक दम कम हो जाता है लेकिन प्रसिद्ध और शक्तिशाली व्यक्ति का कुछ भी कम नहीं होता बल्कि कई चीजें बढ़ जाती हैं जैसे प्रसिद्धि, रुतबा और आत्मविश्वास वगैरा। हमले की अविलम्ब निंदा करनी ज़रूरी होती है। इसमें कोई राजनीति शामिल नहीं होती। वैसे भी ख़ास, विरोधी, दुश्मन और विपक्षी पार्टी के नेता खुद हमला कभी नहीं करते क्यूंकि इसमें वाकई राजनीति नहीं होती। हमेशा सुरक्षित शैली में ही सब कुछ निबटाया जाता है। किसी विशेष व्यक्ति से बयान दिलवाया जाता है कि इस हमले में जान लेने का प्रयास किया गया । हमला सहने वाला व्यक्ति अगर बच जाए तो परम्परा अनुसार जरुर कहता है कि हम किसी से डरते नहीं।

हमले के मामले में सुरक्षा भी हलवे की तरह स्वाद होती है। इस बारे कोई कुछ कहता है, कोई हर कुछ कहता है। सुरक्षा कोई लोहे, पत्थर, लकड़ी या प्लास्टिक की दीवार तो होती नहीं। इंसानों की सुरक्षा इंसानों द्वारा की जाती है, इंसान ही उसे भेदते हैं और बार बार साबित करते हैं कि इंसान गलती का पुतला है। असामाजिक मिडिया पर हमले के झूठे सच्चे वीडियो और चित्र प्रसारित होने शुरू हो जाते हैं। आरोपों की झड़ियां लग जाती हैं। आरोपों को ख़ारिज करने की परम्परा निभाई जाती है। हमलावर हिम्मत बटोरकर ही हमला करता है लेकिन दिलचस्प यह है कि उसे कायराना हरकत कहा जाता है। हमले की बातों का हलवा दो चार दिन तक बंटता रहता है फिर किसी नए तरह के हमले का हलवा बंटना शुरू हो जाता है।  

- संतोष उत्सुक

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