भारत में महिलाओं के प्रति बदलने लगा है नज़रिया

By रमेश सर्राफ धमोरा | Mar 08, 2026

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक उपलब्धियों का जश्न मनाने और लैंगिक समानता की वकालत करने के लिए मनाया जाता है।  यह जागरूकता बढ़ाने, बाधाओं को तोड़ने और सभी के लिए समान अवसरों को बढ़ावा देने का दिन है।  यह दिन हमें याद दिलाता है कि जब महिलाएं आगे बढ़ती हैं तो समाज और राष्ट्र मजबूत होते है।  यह समानता और अधिकारों के लिए एक वैश्विक आंदोलन है, जो महिलाओं के सम्मान और उनके अधिकारों के लिए संघर्ष का प्रतीक है। यह एक ऐसा दिन है जो महिलाओं को सपने देखने और उन्हें पूरा करने के लिए प्रोत्साहित करता है। 

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भारत में महिलाओं की सुरक्षा और इज्जत का खास ख्याल रखा जाता है। अगर हम इक्कीसवीं सदी की बात करे तो यहां की महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला काम कर रही है। अब तो भारत की संसद ने भी महिलाओं के लिये लोकसभा व विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण का विधेयक पास कर दिया है। उससे आने वाले समय में भारत की राजनीति में महिलाओं की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो जायेगी। देश में महिलाओं को अब सेना में भी महत्वपूर्ण पदो पर तैनात किया जाने लगा है। जो महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ा कदम है। 

यहां महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार है। महिलायें देश की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करती है तथा विकास में भी बराबर की भागीदार है। आज के युग में महिला पुरुषों के साथ ही नहीं बल्कि उनसे दो कदम आगे निकल चुकी है। महिलाओं के बिना समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। भारतीय संविधान के अनुसार महिलाओं को भी पुरुषों के समान जीवन जीने का हक है। भारत में नारी को देवी के रूप में देखा गया है। कहा जाता है कि जहां नारी की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं। प्राचीन काल से ही यहां महिलाओं को समाज में विशिष्ट आदर एवं सम्मान दिया जाता है। 

भारत में वर्षो से महिला सुरक्षा से जुड़े कई कानून बने है। इसमें हिंदू विडो रीमैरिज एक्ट 1856, इंडियन पीनल कोड 1860, मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट 1861, क्रिस्चियन मैरिज एक्ट 1872, मैरिड वीमेन प्रॉपर्टी एक्ट 1874,चाइल्ड मैरिज एक्ट 1929, स्पेशल मैरिज एक्ट 1954, हिन्दू मैरिज एक्ट 1955, फॉरेन मैरिज एक्ट 1969, इंडियन डाइवोर्स एक्ट 1969, मुस्लिम वुमन प्रोटेक्शन एक्ट 1986, नेशनल कमीशन फॉर वुमन एक्ट 1990, सेक्सुअल हर्रास्मेंट ऑफ वुमन एट वर्किंग प्लेस एक्ट 2013 आदि। इसके अलावा 7 मई 2015 को लोक सभा ने और 22 दिसम्बर 2015 को राज्य सभा ने जुवेनाइल जस्टिस बिल में भी बदलाव किया है। इसके अन्तर्गत यदि कोई 16 से 18 साल का किशोर जघन्य अपराध में लिप्त पाया जाता है तो उसे भी कठोर सजा का प्रावधान है। 

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक साल 2023 में भारत में महिलाओं के खिलाफ कुल 4,05,861 अपराध दर्ज किए गए। इन अपराधों में बलात्कार, छेड़छाड़, दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न, साइबर अपराध, और अपहरण जैसे गंभीर अपराध शामिल हैं। इनमें सबसे ज्यादा मामले घरेलू हिंसा और यौन उत्पीड़न के सामने आए हैं।जो समाज में महिलाओं की सुरक्षा के प्रति हमारी उदासीनता को दर्शाते हैं। इससे पहले 2022 में 4,45,256 मामले, 2021 में 4,28,278मामले 2020 में 3,71,503 मामले दर्ज किए गए थे।

राष्ट्रीय महिला आयोग की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक 2023 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले में उत्तर प्रदेश सबसे आगे रहा। राष्ट्रीय महिला आयोग की तरफ से जारी आंकड़ों के मुताबिक देश भर से पूरे साल में महिलाओं के खिलाफ अपराध की 28,811 शिकायतें मिलीं। इसमें 16 हजार से ज्यादा मामले उत्तर प्रदेश राज्य से आए हैं। आंकड़े हैरान कर देने वाली हैं। क्योंकि आयोग में ये शिकायत गरिमा के अधिकार कैटेगरी के अंतर्गत दर्ज किया गया है। इसके बाद दूसरे नंबर पर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में 2,411 मामले दर्ज किए गए। महाराष्ट्र में 1,343, बिहार में 1,312 और मध्य प्रदेश में 1,165 इतने मामले दर्ज किए गए हैं। 

2023 के 12 महीने बाद जारी किए गए इस रिपोर्ट में महिलाओं के प्रति हो रहे अपराध में दहेज उत्पीड़न और दुष्कर्म जैसे अपराध दर्ज किए गए हैं। राष्ट्रीय महिला आयोग की यह रिपोर्ट महिलाओं के प्रति पुलिस की उदासीनता दिखाती है। आंकड़ों के मुताबिक देश भर में यौन उत्पीड़न के 805 मामले, साइबर अपराध के 605 मामले, पीछा करने की 472 मामले और सम्मान से जुड़े अपराध के खिलाफ  409 शिकायतें दर्ज कराई गईं। आंकड़ों के मुताबिक, महिलाओं के खिलाफ अपराधों में बलात्कार के मामले भी शामिल हैं। साल 2023 में बलात्कार और बलात्कार के प्रयास के 1,537 मामले दर्ज किए गए। इसके बाद गरिमा के अधिकार के तहत 8,540, घरेलू हिंसा के 6,274, दहेज उत्पीड़न के 4,797, छेड़छाड़  के 2,349,और महिलाओं के प्रति पुलिस की उदासीनता के 1,618  मामले दर्ज किए गए।

2023 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले 2022 की तुलना में कम हुए हैं। 2022 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 30,864 मामले दर्ज किए गए थे। जबकि 2023 में यह संख्या घटकर 28,278 हो गई। यह एक सकारात्मक संकेत है लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। साल 2022 के बाद से शिकायतों की संख्या में कमी देखी गई है। जब 30,864 शिकायतें प्राप्त हुई थी, जो 2014 के बाद से सर्वाधिक आंकड़ा था। जहां तक बात महिलाओं की सुरक्षा की आती है तो पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अभूतपूर्व निर्णयों से महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई प्रबंध किये हैं। आज भारत में महिलायें पहले की अपेक्षा ज्यादा सुरक्षित है। 

हम एक तरफ महिलाओं को हर क्षेत्र में बराबरी का दर्जा देकर उन्हे आगे बढ़ा रहें है। वहीं दूसरी तरफ उनके साथ अत्याचार की घटनाओं में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है। आये दिन हमें महिलाओं के साथ बलात्कार, दुर्व्यवहार होने की घटनाये सुनने को मिलती रहती है। ऐसी घटनाओं से महिला सशक्तिकरण के अभियान को धक्का लगता हैं।देश में महिलाओं के प्रति खराब होते माहौल को बदलने की जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की ही नहीं अपितु हर आम आदमी की भी है। हम सभी को आगे आकर महिला सुरक्षा की लड़ाई में महिलाओं का साथ देना होगा तभी देश की मातृ शक्ति सर उठा कर शान से चल सकेगीं। अब महिलाओं को समझना होगा कि आज समाज में उनकी दयनीय स्थिति समाज में चली आ रही परम्पराओं का परिणाम है। इन परम्पराओं को बदलने का बीड़ा स्वयं महिलाओं को ही उठाना होगा। तभी समाज में उनके प्रति सोच बदल पायेगी।

रमेश सर्राफ धमोरा

(लेखक राजस्थान सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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