By अशोक भाटिया | Oct 23, 2026
उत्तर प्रदेश की राजनीति में रामपुर की जेल सिर्फ एक चारदीवारी नहीं, बल्कि वर्तमान में समाजवादी पार्टी के भविष्य और मुस्लिम सियासत के नए ध्रुवीकरण का केंद्र बन चुकी है। 22 अक्टूबर 2026 को सपा प्रमुख अखिलेश यादव और पार्टी के सबसे कद्दावर मुस्लिम चेहरे आजम खान के बीच रामपुर जिला जेल में हुई लगभग एक घंटे की मुलाकात केवल दो नेताओं की शिष्टाचार भेंट नहीं थी। यह उत्तर प्रदेश के आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात पर चली गई एक ऐसी चाल है, जिसके दूरगामी परिणाम न केवल समाजवादी पार्टी के भीतर, बल्कि पूरे राज्य के सामाजिक-राजनीतिक ताने-बाने पर दिखाई देंगे। कानूनी शिकंजे में फंसे और चुनावी राजनीति से तकनीकी रूप से दूर हो चुके आजम खान की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके एक इशारे पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की दर्जनों सीटों का गणित बदल सकता है। यही कारण है कि अखिलेश यादव को खुद रामपुर जेल पहुंचकर यह संदेश देना पड़ा कि समाजवादी पार्टी में आजम खान की हैसियत न तो कम हुई है और न ही उन्हें हाशिए पर धकेला जा सकता है। यह मुलाकात इस बात का जीवंत प्रमाण है कि सत्ता और कानूनी मुकदमों के उतार-चढ़ाव के बावजूद, सपा की सियासत में आजम की ताकत का सूरज पूरी तरह अस्त नहीं हुआ है, बल्कि रामपुर जेल की सलाखों के पीछे से वह एक नई ऊर्जा के साथ उभर रहा है। यह घटनाक्रम यह भी दर्शाता है कि जब-जब उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन या बड़े राजनैतिक उलटफेर की नींव रखी जाती है, तब-तब रामपुर का किला और वहां का नेतृत्व स्वतः ही मुख्यधारा की चर्चा के केंद्र में आ जाता है।
इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए समाजवादी पार्टी के अंतर्विरोधों और उत्तर प्रदेश के बदलते मुस्लिम नेतृत्व के संकट को देखना जरूरी है। पिछले कुछ समय से यह चर्चा आम थी कि आजम खान के जेल जाने और उनके परिवार पर आए कानूनी संकट के दौरान समाजवादी पार्टी ने उस आक्रामकता के साथ उनका साथ नहीं दिया, जिसकी उम्मीद एक संस्थापक सदस्य को होती है। पार्टी के भीतर और बाहर इस बात को लेकर सुगबुगाहट थी कि अखिलेश यादव अपनी छवि को एक नए, आधुनिक और गैर-विवादास्पद रूप में ढालने के लिए 'माई' (मुस्लिम-यादव) समीकरण से थोड़ा इतर 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नारा दे रहे हैं। इस नए विमर्श में आजम खान जैसे पुराने समाजवादी दिग्गजों की कट्टर छवि फिट नहीं बैठ रही थी। इसी बीच, असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम और अन्य क्षेत्रीय दलों ने इस खालीपन को भरने की कोशिश शुरू कर दी। ओवैसी लगातार यह आरोप लगाते रहे कि सपा मुस्लिमों के वोट तो लेती है, लेकिन जब उनके बड़े नेताओं पर संकट आता है, तो नेतृत्व चुप्पी साध लेता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जो कभी आजम खान का अभेद्य किला माना जाता था, वहां मुस्लिम मतदाताओं के बीच उपजे इस असमंजस को अखिलेश यादव भांप चुके थे। रामपुर लोकसभा उपचुनाव और उसके बाद के घटनाक्रमों में जिस तरह से अंदरूनी गुटबाजी सामने आई, उसने पार्टी आलाकमान को सचेत कर दिया कि आजम खान को नजरअंदाज करने की कीमत २०२७ में बेहद भारी पड़ सकती है। इसलिए, अखिलेश यादव का रामपुर जेल जाना राजनीतिक मजबूरी भी था और एक सोची-समझी रणनीति भी, जिसके जरिए उन्होंने एक ही झटके में ओवैसी के नैरेटिव को ध्वस्त करने और अपने कोर वोटर को यह भरोसा दिलाने का प्रयास किया कि 'नेताजी' (मुलायम सिंह यादव) के दौर के स्तंभ आज भी उतने ही आदरणीय हैं। यह कदम यह भी स्पष्ट करता है कि सपा अपने पारंपरिक और वफादार वोट बैंक को किसी भी अन्य वैचारिक प्रयोग की वेदी पर होम करने के लिए तैयार नहीं है।
अशोक भाटिया
वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार