उमंग और खुशियों के त्यौहार बैसाखी का ऐसे पड़ा नाम

By कंचन सिंह | Apr 12, 2019

इस बार 13 अप्रैल को उमंग और खुशियों का त्यौहार बैसाखी मनाई जाएगी। पंजाब और आसपास के राज्यों में यह त्योहार बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। दरअसल, यह त्यौहार फसल पकने की खुशी में मनाया जाता है और इसी दिन गुरु गोविंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना भी की थी। बैसाखी का त्योहार पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन अलग-अलग राज्यों में इसका नाम अलग है।  

नए साल की शुरुआत

हिंदुओं के लिए यह त्यौहार नए साल की शुरुआत माना जाता है। केरल में बैसाखी को विशु के रूप में मनाया जाता है। इस दिन फूल, फल, अनाज, वस्त्र, सोना आदि सजाए जाते हैं और सुबह इसके दर्शन किए जाते हैं। असम में बिहू के रूप में मनाते हैं। इस दिन असमिया नववर्ष की शुरुआत मानी जाती है। पश्चिम बंगाल में नबा वर्षा अर्थात नए साल के रूप में इसे मनाते हैं।

क्यों मनाते हैं बैसाखी?

बैसाखी, दरअसल सिख धर्म की स्थापना और फसल पकने के प्र‍तीक के रूप में मनाई जाती है। इस महीने फसल पूरी तरह से पक कर तैयार हो जाती है और पकी हुई फसल को काटने की शुरुआत हो जाती है। किसाना फसल पकने की खुशी में यह त्यौहार मनाते हैं। साथ ही 13 अप्रैल 1699 के दिन सिख पंथ के 10वें गुरू श्री गुरू गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की थी, इसके साथ ही इस दिन को त्यौहार के रूप में मनाने की शुरुआत हुई। इसी दिन से पंजाबी नए साल की शुरुआत होती है।

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ऐसे पड़ा बैसाखी नाम

बैसाखी के समय आकाश में विशाखा नक्षत्र होता है। विशाखा नक्षत्र पूर्णिमा में होने के कारण इस माह को बैसाखी कहते हैं। यानी वैशाख महीने के पहले दिन को बैसाखी कहा गया है। इस दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, इसलिए इसे मेष संक्रांति भी कहते हैं। बैसाखी का त्यौहार अप्रैल 13 और 14 तारीख को ही मनाया जाता है। दरअसल, जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है तभी यह त्यौहार मनाया जाता है और ऐसा हर साल 13 या 14 अप्रैल को ही होता है।

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मौसम में बदलाव का प्रतीक

बैसाखी के बाद से मौसम और गर्म हो जाता है। दरअसल, इसके बाद से सूर्य की स्थिति बदलने के कारण धूप तेज़ हो जाती है और गर्मी बढ़ जाती है। अप्रैल में सर्दी पूरी तरह से खत्म होकर गर्मी शुरू हो जाती है इसलिए इस त्यौहार को मौसम बदलाव की वजह से भी मनाया जाता है। इस दिन लोग नए कपड़े पहनकर, अच्छे पकवान बनाकर और नाच-गाकर खुशियां मनाते हैं।

- कंचन सिंह

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