Bal Gangadhar Tilak Birth Anniversary: बाल गंगाधर तिलक ने दिया था 'स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार' का नारा, जानें रोचक बातें

By अनन्या मिश्रा | Jul 23, 2024

आज ही के दिन यानी की 23 जुलाई को लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का जन्म हुआ था। वह एक पत्रकार, शिक्षक, राष्ट्रवादी, समाज सुधारक, वकील और स्वतंत्रता आंदोलन के फेमस नेता थे। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने साल 1916 में 'स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा' का नारा दिया था। वह 'भारतीय अशांति के जनक' के रूप में भी जाने जाते थे। तिलक उन नेताओं में शामिल रहे, जो देश में स्वराज और स्व-शासन के लिए हमेशा खड़े रहे। आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर बाल गंगाधर तिलक के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...

ब्रिटिश भारत में बॉम्बे प्रेसीडेंसी के रत्नागिरी जिले (वर्तमान में भारत का महाराष्ट्र) बाल गंगाधर तिलक का 23 जुलाई 1856 को जन्म हुआ था। शुरूआती शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने साल 1877 में पुणे के दक्कन कॉलेज से गणित में ग्रेजुएशन पूरा किया। इसके बाद कानून की पढ़ाई के लिए तिलक ने एम.ए का कोर्स बीच में छोड़ दिया था। फिर साल 1979 में बाल गंगाधर तिलक ने बॉम्बे विश्वविद्यालय के सरकारी लॉ कॉलेज से एलएलबी की डिग्री हासिल की। ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद वह एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने लगे थे। बाद में वह पत्रकार बन गए थे।

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लेख लिखने पर हो गए थे गिरफ्तार

बता दें कि खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चंद चाकी ने 30 अप्रैल 1908 को जज किंग्सफोर्ड को अपना निशाना बनाते हुए एक बम विस्फोटक की घटना को अंजाम दिया था। इस घटना में दो ब्रिटिश महिलाओं की मृत्यु हो गई थी। जिसके बाद अंग्रेजी सेना ने खुदीराम बोस को गिरफ्तार कर उनपर मुकदमा चलाया था। इस गिरफ्तारी के बाद तिलक की जिंदगी बदल गई। खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चंद चाकी दोनों क्रांतिकारियों के पक्ष में तिलक ने अपने अखबार 'केसरी' में लेख लिखा। 

तिलक के लेख ने अंग्रेजों के होश उड़ा दिए। जिसके बाद अंग्रेजों ने 03 जुलाई 1908 को तिलक को गिरफ्तार लिया और उनको 6 साल की सजा सुनाई गई। इस दौरान उनको बर्मा की जेल में रखा गया। बर्मा में सजा काटने के दौरान बाल गंगाधर तिलक ने 400 पन्नों की एक किताब 'गीता रहस्य' के बारे में लिखा।

दो भाषाओं में अखबार

बाल गंगाधर तिलक ने दो भाषाओं मराठी और अंग्रेजी में दो अखबार 'मराठा दर्पण और केसरी' की शुरूआत की। तिलक ने अंग्रेजी शासन की क्रूरता के खिलाफ इन दोनों ही अखबारों में अपनी आवाज उठाई। वहीं यह अखबार भी आम लोगों द्वारा काफी पसंद किए जा रहे थे।

राजद्रोह का मुकदमा

महाराष्ट्र में साल 1896-97 के बीच प्लेग महामारी ने तेजी से पैर पसारे थे। इस स्थिति से निपटने के लिए तिलक ने महामारी अधिनियम 1897 के प्रावधानों के खिलाफ लेख लिखे, जिसके परिणामस्वरूप उन पर ब्रिटिश शासन की ओर से राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया। अपने इस लेख में उन्होंने कमिश्नर वाल्टर चार्ल्स रैंड को निशाना बनाया था। वहीं बाल गंगाधर तिलक के लेख से प्रभावित दो युवाओं चापेकर बंधुओं ने चार्ल्स रैंज की हत्या कर दी थी।

इसलिए ब्रिटिश सरकार ने बाल गंगाधर तिलक को हत्या के लिए उकसाने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। इस मामले की सुनवाई और सजा के उनको 'लोकमान्य' यानी की जनता के प्रिय नेता की उपाधि मिली। इस दौरान तिलक को 18 महीने की जेल सजा सुनाई गई। जहां पर तिलक ने पहली बार स्वराज के अपने विचारों को विकसित किया।

चरमपंथियों का युग

बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल उस दौरान लाल, बाल, पाल के नाम से काफी फेमस हुए थे। यह चरमपंथी नेता थे, जिनके लेखन से देश में कई क्रांतिकारी गतिविधियां हुईं। अपने समाचार पत्रों के माध्यम से तिलक ने ब्रिटिश शासन और उदारवादी राष्ट्रवादियों के खिलाफ काफी आलोचनाएं की।

मौत

बता दें कि 01 अगस्त 1920 को असहयोग आंदोलन की शुरूआत के दिन बाल गंगाधर तिलक ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम में तिलक के योगदान और बलिदान को सम्मान देने के लिए 'तिलक फंड' की शुरूआत की थी।

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