Prabhasakshi NewsRoom: China से J-10CE Fighter Jets खरीदने वाला है Bangladesh, इससे India पर क्या असर पड़ेगा?

By नीरज कुमार दुबे | Jun 23, 2026

बांग्लादेश अब खुलकर उस मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है जहां वह चीन के साथ अपने सामरिक रिश्तों को खतरनाक स्तर तक ले जाने की तैयारी में है। खबर है कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान की चीन यात्रा के दौरान ढाका 24 चीनी J-10 CE बहुउद्देशीय लड़ाकू विमानों की खरीद पर आगे बढ़ सकता है। यदि यह सौदा अंतिम रूप लेता है तो यह दक्षिण एशिया की शक्ति संतुलन रेखाओं को बदलने वाली एक बड़ी सामरिक चाल होगी। यही कारण है कि इस घटनाक्रम पर नई दिल्ली की नजर बेहद पैनी है।

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हम आपको यह भी बता दें कि ढाका और बीजिंग के बीच केवल लड़ाकू विमान ही चर्चा का विषय नहीं हैं। दोनों देशों के बीच सत्रह दस्तावेजों पर हस्ताक्षर की तैयारी है जिनमें पंद्रह समझौता ज्ञापन, दो औपचारिक समझौते, एक प्रोटोकाल और एक कार्य योजना शामिल है। रक्षा सहयोग, आधारभूत ढांचा, व्यापार, निवेश और सामरिक साझेदारी को नए स्तर तक ले जाने की तैयारी हो रही है। बांग्लादेश के विदेश सचिव ने चीन को अपना अत्यंत करीबी मित्र, रणनीतिक साझेदार और विकास सहयोगी बताया है। यह बयान अपने आप में संकेत देता है कि ढाका किस दिशा में बढ़ रहा है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तीस्ता परियोजना भी बातचीत के केंद्र में है। यही वह मुद्दा है जिस पर चीन लंबे समय से नजर गड़ाए बैठा है। यदि चीन को तीस्ता क्षेत्र में गहरी घुसपैठ का अवसर मिलता है तो यह भारत की पूर्वोत्तर सुरक्षा के लिए गंभीर चिंता बन सकता है। चीन पहले ही हिंद महासागर से लेकर हिमालय तक अपनी रणनीतिक उपस्थिति बढ़ा चुका है। अब यदि बांग्लादेश भी उसी धुरी पर तेजी से आगे बढ़ता है तो भारत के लिए सुरक्षा चुनौतियां कई गुना बढ़ सकती हैं।

हालांकि यहां बांग्लादेश को एक बात बेहद स्पष्ट रूप से समझनी होगी। भारत और बांग्लादेश का रिश्ता केवल सीमाओं का रिश्ता नहीं है। यह इतिहास, संस्कृति, भाषा, व्यापार, जल, सुरक्षा और भावनात्मक साझेदारी का संबंध है। 1971 के युद्ध में भारत ने जिस तरह बांग्लादेश की मुक्ति के लिए निर्णायक भूमिका निभाई थी, उसे कोई मिटा नहीं सकता। आज भी बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था, व्यापारिक पहुंच, ऊर्जा आपूर्ति और क्षेत्रीय स्थिरता में भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। चीन निवेश दे सकता है, हथियार दे सकता है, लेकिन वह वह भरोसा नहीं दे सकता जो भारत ने हर संकट में बांग्लादेश को दिया है।

ढाका को यह भी समझना होगा कि चीन का इतिहास कर्ज, दबाव और सामरिक नियंत्रण की राजनीति से भरा पड़ा है। जिन देशों ने आंख बंद करके चीनी परियोजनाओं और रक्षा सौदों पर भरोसा किया, वह बाद में आर्थिक और राजनीतिक दबाव के जाल में फंस गए। पड़ोस में श्रीलंका इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। बांग्लादेश यदि केवल तत्काल लाभ देखकर चीन की गोद में बैठने की कोशिश करेगा तो आने वाले समय में उसकी सामरिक स्वतंत्रता कमजोर पड़ सकती है।

बताया जा रहा है कि तारिक रहमान ग्रीष्मकालीन दावोस सम्मेलन में भी हिस्सा लेंगे जहां वैश्विक अर्थव्यवस्था, नवाचार और सतत विकास जैसे विषयों पर चर्चा होगी। वह जलवायु नेतृत्व पर मुख्य भाषण भी देंगे और कजाकिस्तान, मंगोलिया, वियतनाम तथा दक्षिण कोरिया के नेताओं से मुलाकात करेंगे। लेकिन असली चर्चा की धुरी चीन और बांग्लादेश के बढ़ते सामरिक संबंध ही रहने वाले हैं।

बहरहाल, नई दिल्ली ढाका की हर चाल पर नजर बनाये हुए है क्योंकि यदि दक्षिण एशिया में चीन की घुसपैठ इसी गति से बढ़ती रही तो आने वाले वर्षों में पूरा क्षेत्र नए तनावों का अखाड़ा बन सकता है। यहां बांग्लादेश को इस बात का ध्यान रखना होगा कि वह इस भ्रम में न रहे कि चीनी J-10 CE बहुउद्देशीय लड़ाकू विमान भारत के लिए कोई निर्णायक चुनौती बन जाएंगे। भारतीय वायुसेना के पास रॉफेल जैसे अत्याधुनिक लड़ाकू विमान हैं जिनमें मेटियोर जैसी घातक लंबी दूरी की मिसाइलें लगी हैं। इसके अलावा सुखोई 30 एमकेआई, तेजस, आकाश वायु रक्षा प्रणाली, एस-400 रक्षा कवच और अत्याधुनिक रडार नेटवर्क भारत को कई स्तरों पर बढ़त देते हैं। भारतीय वायुसेना के पायलटों का युद्ध अनुभव, नेटवर्क आधारित युद्ध क्षमता और बहुस्तरीय रक्षा ढांचा चीन निर्मित विमानों की चमक को मिनटों में फीका कर सकता है। सच यह है कि चीनी J-10 CE लड़ाकू विमान केवल शक्ति प्रदर्शन का औजार बन सकता है, लेकिन भारत की सामरिक क्षमता के सामने वह किसी भी निर्णायक संघर्ष में ज्यादा देर टिक नहीं पाएगा। बांग्लादेश को समझना होगा कि भारत केवल हथियारों के दम पर नहीं, बल्कि तकनीक, प्रशिक्षण, युद्ध अनुभव और व्यापक सैन्य समन्वय के बल पर क्षेत्र की सबसे मजबूत शक्ति बना हुआ है।

बांग्लादेश को भी यह याद रखना चाहिए कि भूगोल बदलता नहीं। भारत उसका सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण पड़ोसी है। चीन हजारों किलोमीटर दूर बैठा रणनीतिक खेल खेल सकता है, लेकिन संकट की घड़ी में सबसे पहले भारत ही खड़ा दिखाई देता है। इसलिए ढाका को संतुलन, समझदारी और दूरदर्शिता के साथ आगे बढ़ना होगा, वरना चीन की चमकदार कूटनीति के पीछे छिपा सामरिक जाल उसके लिए भारी पड़ सकता है।

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