SIR शुरू होते ही बोरिया बिस्तर समेटकर भागने लगे बांग्लादेशी घुसपैठिये, पूर्वी सीमाओं पर जमा हो रही भीड़

By नीरज कुमार दुबे | Nov 19, 2025

भारत के कई राज्यों में जैसे ही मतदाता सूची के दस्तावेज़ सत्यापन (SIR) की कड़ी प्रक्रिया शुरू हुई है, वैसे-वैसे एक दिलचस्प प्रवृत्ति सामने आ रही है कि वर्षों से देश के अलग-अलग कोनों में बसे अवैध बांग्लादेशी घुसपैठिए अपना सामान समेटकर अचानक गायब होने लगे हैं। मजदूरी, घरेलू काम और निर्माण क्षेत्रों में घुले-मिले ये लोग प्रदेशों से निकलकर पूर्वी सीमाओं की ओर भागते दिख रहे हैं। SIR की सख्ती ने कई इलाकों में मानो एक मौन भगदड़ पैदा कर दी है। अवैध प्रवासी इस आशंका में हैं कि उनके नाम, पहचान और निवास की पूरी जांच होने पर उनका “अदृश्य जीवन” उजागर हो जाएगा इसलिए वह वापस भागने का प्रयास कर रहे हैं। यह घटनाक्रम न केवल भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण संकेत है, बल्कि सीमा सुरक्षा ढांचे और शहरी प्रशासन दोनों की कमजोरियों को भी एक बार फिर सामने लाता है।

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हम आपको बता दें कि BSF की 143वीं बटालियन ने नदी किनारे संदिग्ध गतिविधि देखी और समूह को घेरकर पूछताछ की। अगले 24 घंटों में यह संख्या 500 से ऊपर पहुँच गई, सभी लोग ज़ीरो लाइन के पास डेरा जमाए बैठे थे, अपने पास केवल कंबल और कुछ सामान लिए हुए। ये वे लोग हैं जो वर्षों से कोलकाता और उसके आसपास के इलाकों जैसे- बिराती, मध्यमग्राम, राजारहाट, न्यू टाउन, सॉल्ट लेक में अवैध तरीके से रह रहे थे। अधिकतर घरेलू कामगार, दिहाड़ी मज़दूर या निर्माण श्रमिक हैं। किसी के पास पासपोर्ट नहीं, न वीज़ा, न कोई वैध पहचान पत्र। बीएसएफ अधिकारियों के मुताबिक हाल के सप्ताहों में ऐसी वापसी की कोशिशों में तेज़ बढ़ोतरी देखी गई है। इस महीने की शुरुआत में तराली बॉर्डर से ऐसे 94 लोग पकड़े गए थे।

सवाल उठता है कि क्या SIR (Special Identification and Revision) की सख्ती इसकी वजह है? दरअसल हिरासत में लिए गए कई लोगों ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि निर्वाचन सूची (electoral rolls) के लिए चल रही दस्तावेज़ जाँच यानी SIR की प्रक्रिया से उन्हें भय हो गया। उन्हें लगता है कि उनके अवैध प्रवास का खुलासा होना तय है और इससे गिरफ्तारी या कानूनी कार्रवाई हो सकती है। एक महिला ने बताया कि “दस साल से किराये पर रहकर घरेलू काम कर रही थी। मेरे पास कोई कागज़ नहीं। अब डर लग रहा है, इसलिए वापस जाना चाहती हूँ।” यह बयान सिर्फ एक महिला की चिंता नहीं; यह हजारों की मनोदशा दर्शाता है। SIR जैसी प्रक्रियाएँ जब लंबे समय से अवैध रूप से रह रहे लोगों पर लागू होती हैं, तो इस तरह का पलायन स्वाभाविक हो जाता है।

वैसे यह तथ्य नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि इतने लोग सालों तक कोलकाता और उसके उपनगरों में बिना दस्तावेज़ों के कैसे रह पाए। यह दो गंभीर विफलताओं की ओर इशारा करता है। पहली- सीमा नियंत्रण का ढीलापन और दूसरी- शहरी प्रशासन में पहचान सत्यापन की कमजोरी। जब अवैध प्रवासी बड़ी संख्या में रिहायशी इलाकों में बस जाते हैं, किराये पर घर ले लेते हैं और आजीविका पा लेते हैं, तो यह स्थानीय तंत्र की खामियों को उजागर करता है। यह सिर्फ सुरक्षा का मुद्दा नहीं; यह डेमोग्राफिक प्रबंधन, मतदाता सूची की शुचिता और आंतरिक सुरक्षा का प्रश्न बन जाता है।

वैसे सालों से अवैध रूप से रह रहे लोगों का अचानक वापस लौटना सिर्फ SIR की वजह से नहीं हो सकता। लगातार रिवर्स माइग्रेशन और भी कई संकेत देता है जैसे— दस्तावेज़ सत्यापन की बढ़ती सख्ती और स्थानीय समुदायों का बढ़ता दबाव। इसके अलावा, बड़े समूहों में सीमा पर लौटने की कोशिश यह भी दिखाती है कि संगठित नेटवर्क अभी भी सक्रिय हैं, जो लोगों को देश में लाते भी हैं और उचित समय आने पर वापस ले भी जाते हैं।

यह घटना दर्शाती है कि भारत को SIR जैसी प्रक्रियाओं को और निरंतर बनाना चाहिए तथा सीमा पर तकनीकी निगरानी बढ़ानी चाहिए। नदी, दलदल और जंगलों वाले क्षेत्रों में सेंसर, कैमरे और UAV तैनात किये जाने चाहिए। शहरी पहचान सत्यापन प्रणाली को कठोर करना चाहिए, खासकर महानगरों में जहां ऐसे लोग आसानी से घुलमिल जाते हैं। साथ ही भुगतान, किराया, श्रम बाजार में KYC को अनिवार्य बनाया जाए ताकि बिना दस्तावेज़ वालों का आधार कमजोर हो।

बहरहाल, हाकिमपुर सीमा पर उमड़ी सैकड़ों लोगों की भीड़ किसी एक घटना का परिणाम नहीं; यह भारत की सीमा सुरक्षा और शहरी प्रशासन के लिए एक चेतावनी है। रिवर्स माइग्रेशन संकेत देता है कि दस्तावेज़-सत्यापन की सख्ती असर दिखा रही है लेकिन यह भी साफ दिख रहा है कि अवैध तंत्र अब भी सक्रिय है।

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