बापू, बंदर, संदेश और समाज (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Apr 01, 2022

यह बात अलग है कि बापू के जन्म या निर्वाण दिवस पर उन्हें श्रद्धांजलि देने वालों में उनके भक्त या देश भक्त दो गुटों में बंट जाएं। झगड़ा, मार कुटाई हो इस मुद्दे पर कि असली चेले कौन हैं और एफआईआर भी दर्ज हो। पुलिस कर्मी फ़ख्र महसूस करें कि बापू के सन्दर्भ में हुए झगड़े की एफआईआर उन्होंने लिखी लेकिन ईमानदारी से देखा जाए तो बापू के संदेश समाज में संजीदगी से लागू हैं। ख़ास देशवासियों की तो छोड़ो आजकल सभी ने बुरा देखना बंद कर दिया है। मानसिक और शारीरिक अंधेरों के कारण भी बुराई दिखनी बंद हो चुकी है। इसकी प्रेरणा सामाजिक, धार्मिक व राजनीतिक नायकों से मिली है। अब सिर्फ अच्छाई देखना, तारीफ़ करना ज़रूरी हो गया है। बापू को गहन श्रद्धांजलि के रूप में उनके पहले बंदर का सन्देश सफलता से लागू है।

तीसरा बंदर भी अपना सन्देश देने में पूरी तरह कामयाब रहा और समाज ने उसे अपनाया भी। बुरा कहना सचमुच बुरा है। बापू का यह सन्देश बाहें खोलकर, गले से लगाया जा रहा है। बुरा तो भूल जाओ अब तो कुछ भी कहना खतरनाक हो सकता है इसलिए बहुत सोच समझ कर बात करने का ज़माना है। हरा हरा देखो, भूरे को भी हरा कहते रहो। कई बार अच्छा, सही या उचित कहना भी परेशान कर सकता है। अच्छे और बुरे का फर्क मिटा दिया गया है। बुरा देखना, बुरा कहना, बुरा सुनना लोकतंत्र के चारों खानों को चित कर चुका है। इस तरह के कार्य अनैतिक होते हैं। नैतिकता के गिरते स्तर पर सुप्रीम अदालत भी चिंता ज़ाहिर कर चुकी है। व्यवहारिक पैकेज ज़िंदगी पर लागू है। 

इसे भी पढ़ें: बजट की अदाएं (व्यंग्य)

वह बात अलग है कि चुपके चुपके सब सुनो, सब कहो और सब देखो और बेशर्मी से हंसते रहो। कभी बोलो तो बोलो, हमने कुछ नहीं देखा, कुछ नहीं सुना। सबसे सुरक्षात्मक जवाब रहेगा, हमें नहीं पता। बापू के बंदरों के संदेश हमारे रोम रोम में रच बस गए हैं, समाज पर शासन कर रहे हैं।

- संतोष उत्सुक

प्रमुख खबरें

Kurukshetra Murder: महिला ने तीन चाकुओं से की पति की हत्या, जांच जारी

Indian Coast Guard ने Odisha तट पर डूबे जहाज की लाइफबोट खोजी, 22 नाविकों की तलाश जारी

Kuwait Security Risk: US Troops की मौजूदगी पर उठे सवाल, Iran के हमलों में भारी Casualties से हड़कंप

Odisha Snakebite घटनाओं में 5 बच्चों समेत 6 लोगों की मौत, मंत्री ने दिए निर्देश