राव की सोच की बुनियाद पर भारत बना चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था

By उमेश चतुर्वेदी | Dec 23, 2025

पामुलपार्थी वेंकट नरसिंह राव...यही पूरा नाम था उनका। आज ही के दिन ठीक इक्कीस साल पहले उन्होंने दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में आखिरी सांस ली थी, जिसे देश के सबसे बेहतरीन सार्वजनिक अस्पताल माना जाता है। एम्स के नाम से विख्यात इस अस्पताल में जब उनकी आत्मा उनके शरीर रूपी पिंजरे से उड़ गई, तब देश में उन डॉक्टर मनमोहन सिंह का शासन था, जिन्हें उन्होंने ही राजनीति की दुनिया में प्रवेश कराया था। राव कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण और गरिमापूर्ण विदाई के हकदार थे। लेकिन उनकी ही पार्टी ने उन्हें यह विदाई मयस्सर नहीं होने दी और देश का प्रधानमंत्री भी मौन व्रत धारण किए रह गया। नेहरू, इंदिरा और राजीव को भारत रत्न देने वाली कांग्रेस की अगुआई वाली सरकार ने अपने ही उस राव को उचित सम्मान देना उचित नहीं समझा, जिसके वे अध्यक्ष रह चुके थे।

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किनारा करने की वजह रहा बाबरी विध्वंस। छह दिसंबर 1992 को बाबरी का ध्वंस हुआ। ऐसा नहीं कि नरसिंह राव ने ध्वंस को रोकने की तैयारी नहीं की थी। गांधी-नेहरू परिवार के नजदीकी रहे पूर्व विदेश सेवा अधिकारी और कांग्रेसी राजनेता मणिशंकर अय्यर राव को इसी वजह से भाजपा का पहला प्रधानमंत्री कहते हैं। बाबरी विध्वंस के बाद वामपंथी बौद्धिकों के एक खेमे ने उन्हें खाकी निक्कर वाला कहना शुरू कर दिया था। यहां याद दिलाना जरूरी है कि खाकी निक्कर कुछ साल पहले तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों की गणवेश होती थी। लेकिन नरसिंह राव ने अपने उपर लगे आरोपों का पुस्तक लिखकर जवाब दिया है. जो 2004 में उनके निधन के बाद प्रकाशित हुई है। ‘अयोध्या: छह दिसंबर’ नामक यह पुस्तक साल 2006 में प्रकाशित हुई। इस किताब में एक तरह से राव ने बाबरी ध्वंस को लेकर उन पर लगने वाले अकर्मण्यता के आरोपों का सिलसिलेवार जवाब दिया है। इसमें उन्होंने बाबरी मस्जिद विध्वंस के दिन और उससे पहले की घटनाओं, अपनी कार्रवाइयों और तब के राजनीतिक दबावों को लेकर पूरी जानकारी दी है। इसमें उन्होंने बताया है कि आखिर उत्तर प्रदेश में वे संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन क्यों नहीं लगा पाए। उन्होंने बताया है कि राज्यपाल की रिपोर्ट राष्ट्रपति शासन के पक्ष में नहीं थी और उनके सामने कई संवैधानिक चुनौतियां और बाधाएं भी थीं। इन तथ्यों के जरिए उन्होंने बताने की कोशिश की है कि आखिर क्यों मस्जिद को बचाने की उनकी कोशिशें किस तरह नाकाम रहीं। विनय सीतापति ने ’हाफ लायन’ नाम से राव की जीवनी लिखी है। इस पुस्तक में वे भी तमाम तथ्यों से साबित करने में सफल रहे हैं कि राव चाहकर भी उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन नहीं लगा सकते थे। अपनी किताब में राव ने तफसील से बताया है कि उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि अयोध्या पहुंच रहे कारसेवक शांतिपूर्ण हैं। राव ने साथ ही यह भी बताया है कि तत्कालीन कल्याण सिंह सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर मस्जिद की सुरक्षा का आश्वासन दिया था। ऐसे में संवैधानिक मर्यादाओं और संघीय ढांचे के संवैधानिक प्रावधानों के कारण उनके हाथ बंधे हुए थे। राव ने अपनी पुस्तक में राम मंदिर आंदोलन के पीछे की राजनीतिक चालों और धार्मिक भावनाओं के दोहन के खतरों पर भी प्रकाश डाला गया है।

इसमें दो राय नहीं कि बाबरी ध्वंस के बाद कांग्रेस की राजनीति पूरी तरह बदल गई। दलित, ब्राह्मण और मुसलमान की जातीय कीमियागिरी के दम पर लंबे समय तक शासन में रही कांग्रेस का समर्थक आधार छीजने लगा। अल्पसंख्यकों ने कई प्रमुख राज्यों मसलन उत्तर प्रदेश, बिहार आदि से किनारा कर लिया। इसका असर कांग्रेस की सत्तावादी राजनीति पर पड़ा। जिस समय बाबरी ध्वंस हुआ, उस समय गांधी-नेहरू परिवार राजनीति से दूर था। सोनिया गांधी तो सक्रिय राजनीति में 1998 में आईं। लेकिन उनके इशारे पर कांग्रेस का एक बड़ा खेमा काम करता रहा। अर्जुन सिंह,  प्रियरंजन दास मुंशी, मणिशंकर अय्यर, प्रणब मुखर्जी आदि कांग्रेसी प्रथम परिवार के इशारे पर काम करते रहे। जब 1996 में कांग्रेस संसदीय चुनावों में हार गई तो नरसिंह राव को इस खेमे ने ना सिर्फ अप्रासंगिक बनाना शुरू किया, बल्कि उन्हें महत्वहीन भी बना दिया। कांग्रेस पर इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 19884 में हुए सिख विरोधी हिंसा का भी दाग है। दिलचस्प यह है कि उस वक्त राजीव सरकार के गृहमंत्री नरसिंह राव ही थे। लेकिन कांग्रेस ने इस मामले में चुप्पी साध रखी है। क्योंकि उसके साथ राजीव गांधी का वह बयान चिपका हुआ है, जिसमें उन्होंने कहा था कि जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हिंसा से ग्रस्त पंजाब को पटरी पर लाने वाले नरसिंह राव ही थे। नरसिंह राव ने ही लुक ईस्ट नीति शुरू की और एशियायी देशों से भारत के मजबूत संबंध बनाने शुरू किए थे। लेकिन उनके इन योगदानों को भुला दिया गया। राव सिर्फ भारतीय आर्थिकी के ही शिल्पकार नहीं थे, बल्कि देश के आतंकग्रस्त इलाकों को सख्त प्रशासन और विकास कार्यों के समायोजन के जरिए मुख्यधारा में जोड़ने वाले रचनाकार भी रहे। मोदी सरकार के बारे में कहा जा सकता है कि उसने राजनीतिक कारणों से राव को 2024 में भारत रत्न दिया। लेकिन यह भी स्वीकार किया जाना चाहिए कि राव का सम्मान भारत के बदलाव का दौर शुरू करने वाले शिल्पी का सम्मान है। 

-उमेश चतुर्वेदी

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं

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