Book Review। विसंगतियों पर तीव्र प्रहार का दस्तावेज़ है "बाजार से गुजरा हूँ"

By दीपक गिरकर | Jan 15, 2025

"बाजार से गुजरा हूँ" सुपरिचित साहित्यकार सुरेश उपाध्याय का पहला व्यंग्य संग्रह है। इसके पूर्व लेखक के दो आलेख संग्रह "हाशिये की आवाज", "अतिसर्वत्र विराजिते" और दो कविता संग्रह "शब्दों की बाजीगरी नहीं", "नई रोपणी" प्रकाशित हो चुके हैं। देश के विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में सुरेश उपाध्याय की व्यंग्य रचनाएं निरंतर प्रकाशित हो रही हैं। व्यंग्यकार ने इस संग्रह की रचनाओं में वर्तमान समय में व्यवस्था में फैली अव्यवस्थाओं, विसंगतियों, विकृतियों, विद्रूपताओं, खोखलेपन, पाखण्ड इत्यादि अनैतिक आचरणों को उजागर करके इन अनैतिक मानदंडों पर तीखे प्रहार किए हैं। सुरेश उपाध्याय को जो बातें, विचार-व्यवहार असंगत लगते हैं, वे उसी समय अपनी लेखनी से त्वरित व्यंग्य आलेखों के माध्यम से राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक क्षेत्र से जुड़े सभी कर्णधारों को सचेत करते रहते हैं और पाठकों का ध्यान आकृष्ट कर उन्हें झकझोर कर रख देते हैं।

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"ये तो होना ही था" व्यंग्य रचना में व्यंग्यकार ने वाटर प्लस में नंबर वन शहर की पोल खोल कर रख दी है। इस रचना में लेखक ने व्यवस्था में फैली अव्यवस्थाओं पर तीखा प्रहार किया है। यह व्यंग्य हमारे शहर के जनप्रतिनिधियों पर गहरा कटाक्ष है। "मुखौटे ही मुखौटे" रचना में लेखक ने दर्शाया हैं कि नेता लोग अपने असली चेहरे को छिपा कर एक नकली या दिखावे का रूप अख्तियार करते हैं। राजनीति, समाज और जीवन के अन्य क्षेत्रों में यह विशेष रूप से प्रासंगिक है, जहाँ लोग अपने वास्तविक स्वभाव, उद्देश्यों या विचारों को छुपाते हुए समाज में एक सजग और आकर्षक चेहरा प्रस्तुत करते हैं। "खेल, खेला और प्रबंधन" व्यंग्य रचना आज की चुनावी राजनीति पर करारा कटाक्ष है। शीर्षक रचना "बाजार से गुजरा हूँ" उपभोक्तावादी संस्कृति पर विनोदपूर्ण और चुटीली भाषा में रोशनी डाली गई है। 

"नाम में क्या रखा है?" रचना में लेखक ने लिखा हैं "नाम में कुछ रखा हो या न रखा हो लेकिन नाम बदलने में बहुत कुछ रखा है। इसमें इतिहास रखा है, इतिहास को बदलने की मंशाएं रखी हैं, राजनीति रखी है, निष्फलता, निष्क्रियता व अकर्मण्यता को छुपाने की बलवती इच्छाएँ रखी है, समय के ज्वलंत मुद्दों से ध्यान हटाने की कूटनीति रखी है, कुछ न करते हुए कुछ करते हुए दिखने की इबारत लिखी है।" शहरों, सडकों, पुलों, संस्थानों, विश्वविद्यालयों, भवनों, स्टेडियम, बस व रेल स्टेशन, हवाई अड्डों, विभिन्न सरकारी योजनाओं के नाम बदलने को लेकर व्यंग्यकार ने कटाक्ष किया है। "कूटनीति बनाम कूट नीति" व्यंग्य रचना में शक्तिशाली देशों द्वारा कमजोर देशों की कुटाई का रोचक चित्रण किया है। "रेवड़ी फिर बदनाम हुई" में व्यंग्यकार देश में सरकार द्वारा मुफ्त में बांटी जा रही रेवड़ी, छूट, अनुदान के प्रति चिंतित दिखाई देते हैं।

"जंगल में बहार का जतन", "लहर पे लहर और कोशिश की डगर", "विश्वास की शपथ और शपथ पर विश्वास", "सरकारी ही असरकारी है", "अपुन तो निर्दलीय", "उचित मूल्य की दुकान", "चोरी और बदनामी", "टेगड़ों की व्यथा-कथा", "राज़ को राज़ रहने दो", "कबाड़ी की दुकान में पार्टी" जैसे व्यंग्य अपनी विविधता का अहसास कराते है और पढ़ने की जिज्ञासा को बढ़ाते हैं।

वैसे व्यंग्य की राह बहुत कठिन और साहस का काम है, लेकिन सुरेश उपाध्याय  की लेखनी का नश्तर व्यवस्था में फैली अव्यवस्थाओं, विसंगतियों पर तीव्र प्रहार करता है। व्यंग्य लेखन में सुरेश उपाध्याय की सक्रियता और प्रभाव व्यापक है। व्यंग्यकार ने इस संग्रह में व्यवस्था में मौजूद हर वृत्ति पर कटाक्ष किए हैं। व्यंग्यकार सुरेश उपाध्याय ने अपनी सहज लेखन शैली से गहरी बात सामर्थ्य के साथ व्यक्त की हैं। संग्रह की विभिन्न रचनाओं की भाषा, विचार और अभिव्यक्ति की शैली वैविध्यतापूर्ण हैं। इस व्यंग्य संग्रह में अधिकांश व्यंग्य सामयिक घटनाओं पर आधारित है। संग्रह की रचनाएं पाठकों के दिलों को छू लेती हैं। आशा है इस व्यंग्य संग्रह का साहित्य जगत में स्वागत होगा। 

  

पुस्तक: बाजार से गुजरा हूँ (व्यंग्य संग्रह) 

लेखक: सुरेश उपाध्याय

प्रकाशक: ऋषिमुनि प्रकाशन, 90, विद्यानगर, सांवेर रोड, उज्जैन (म.प्र.)

आईएसबीएन नंबर: 978-93-931079-8-5

मूल्य: 250/- रूपए

- दीपक गिरकर

समीक्षक

28-सी, वैभव नगर, कनाडिया रोड,

इंदौर- 452016

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