अंधविश्वास पर विश्वास (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Nov 01, 2025

हमारा समाज दिन में चार गुनी, रात में आठ गुनी तरक्की कर रहा है। हर तरफ एक दूसरे से आगे निकल रहे हैं हम। करोड़पति बढ़ते जा रहे हैं। नकली बुद्धि हर एक की प्रेमिका हो गई है। विकासजी सातवें आसमान पर विराजमान हैं। प्रशंसनीय बात यह है कि इतना कुछ नया नया होने के बावजूद, हम अभी भी अपनी सांस्कृतिक और पौराणिक परम्पराएं निभा रहे हैं। दुनिया आशा भरी नज़रों से हमारी तरफ देख रही है। पहले हम पश्चिमी देशों की नक़ल करते थे अब वे हमारी कर रहे हैं। हर देश, क्षेत्र और संप्रदाय के अपने अपने लोकप्रिय विश्वास और प्रिय अंधविश्वास होते हैं, हमारे भी हैं। बदलते वक़्त के साथ इनमें ज़रूरी बदलाव आते हुए बढ़ोतरी हो रही है। कई अवसरों पर तो गर्व का अनुभव होता है कि अंधविश्वास पर विश्वास कम नहीं हुआ जी हमारा। 

  

यह सम्मान की बात है जी, कि सबसे ज्यादा ट्रम्प चालें सहने वाले अमेरिका में कितने ही मामलों में हमारी नक़ल की जा रही है। हमारे आम और प्रसिद्ध लोगों की तरह, वहां के प्रभावशाली, प्रतिभाशाली और दूसरे लोग भी टोने टोटकों पर काफी भरोसा करने लगे हैं। कोई ऑनलाइन तांत्रिक को साध रहा ताकि उसकी शादी के दिन मौसम सुहावना रहे। करियर, प्रेम, रिश्ते और ज़िंदगी की दूसरी परेशानियां दूर करने के लिए मदद ली जा रही है। दिलचस्प यह है कि अंधविश्वास को, ‘एंटरटेनमेंट सर्विस’ नाम दिया जा रहा है लेकिन हमारे यहां यह रोज़मर्रा ज़िंदगी का ज़रूरी और संजीदा हिस्सा है ।

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अब यह तो होता ही है कि जिस डाक्टर की दवाई रास आ जाए वही बढ़िया। टोने टोटके या मंत्र जाप से ख़ास दिन मौसम ठीक रहे तो वाह वाह। बात तो ठीक है जी, शादी या जन्मदिन के उत्सव में खर्च बहुत होता है। उस दिन मौसम साथ न दे तो ज़िंदगी उदास हो जाती है जी । कई बार अंधविश्वास पर विश्वास नहीं किया जाता, पूजा या जाप नहीं करवाते तो वक़्त ठीक नहीं रहता। फिर सोचते हैं काश कर लिया होता। जितनी सेवा की जाएगी, मेवा उतना ही मिलेगा जी। जितना पैसा उतनी सेवा हो सकती है जी। 

पूरी दुनिया में खतरा बढ़ रहा है, असुरक्षा का भाव व्याप्त है, युवा रिश्तों के असमंजस और बेरोजगारी की गिरफ्त में हैं। असली बुद्धि पर नकली बुद्धि का कब्ज़ा बढ़ता जा रहा है। करियर, नौकरी, मकान, स्वास्थ्य और विशेषकर पत्नी पति के आपसी रिश्तों की दुविधाएं नए नए रूप अख्तियार कर रही हैं। इच्छाएं बढ़ती जा रही हैं, स्वार्थ टकरा रहे हैं। इंसान सब जानते बूझते हुए आपसी, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक खतरों से खेल रहा है। ईएमआई ने आमदनी को टुकड़े टुकड़े कर दिया है। सब दिख रहा है लेकिन देखना नहीं चाहते। चाहते हैं कोई दूसरा मदद कर सब ठीक कर दे लेकिन ऐसा कहां होता है। आत्मविश्वास पर भरोसा नहीं रहा जी। परहेज़ और व्यायाम करना नहीं चाहते। अंधविश्वास पर विश्वास कर रहे। यह भी तो एक व्यवसाय है जो मनोवैज्ञानिक संबल देता है। खुशी इस बात की है कि दुनिया में अब यह हमारी तरह हो रहा है। बदलता वक़्त साबित कर रहा है कि अंधविश्वास में विश्वास से ज़्यादा शक्ति होती है जी।

- संतोष उत्सुक

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