मुड़-मुड़ के भी देख...(व्यंग्य)

By विजय कुमार | Jun 12, 2020

पचास के दशक में एक फिल्म आयी थी श्री 420। कई लोगों ने इसे देखकर ही चार सौ बीसी सीखी। उसका एक गीत ‘मुड़-मुड़ के न देख मुड़-मुड़ के...’ बहुत लोकप्रिय हुआ था। बहुत से नौजवान लड़कियों के आसपास घूमते हुए इसे थोड़ा बदल लेते थे। वे गाते थे ‘मुड़-मुड़ के भी देख मुड़-मुड़ के..।’

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कल शर्माजी का फोन आया, तो वे हालचाल पूछे बिना सीधे ही डांटने लगे। वैसे बड़े होने के नाते ये उनका सांस्कृतिक और नैतिक कर्तव्य है। इसलिए मैंने बुरा नहीं माना।

- तुमसे ये उम्मीद नहीं थी वर्मा। तुम इतने अशिष्ट होगे, ये मैंने सोचा भी नहीं था।

- क्या हुआ शर्माजी; आप कहें तो बिना शर्त माफी मांग लेता हूं; पर खाली प्याली में तूफान का कारण तो बताएं ?

- तुम आज सुबह बाजार गये थे ?

- जी हां। कुछ जरूरी सामान लेना था। इसलिए..।

- मैं भी वहां था। मैंने कई बार हाथ हिलाया; पर तुमने एक बार भी मुड़कर नहीं देखा।

- जरूर आपने मुखबंद लगा रखा होगा।

- हां, उसके लिए तो सरकारी आदेश है।

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- बस इसीलिए मैंने नहीं पहचाना। आजकल नाइयों की दुकान बंद होने से कई बुजुर्ग लोग ऋषि-मुनियों जैसे जटा-जूटधारी हो गये हैं। शायद...।

- बकवास मत करो। मेरे बेटे के पास नाइयों जैसी बिजली से चलने वाली एक छोटी मशीन है। उसने एक दिन उससे मेरा पूरा सिर चकाचक साफ कर दिया।

- अरे, पर सिर के पूरे बाल तो किसी नजदीकी रिश्तेदार की मृत्यु पर कटाये जाते हैं ?

- वो तो है; पर इससे कई फायदे हुए। नाई के पास जाने का टाइम बचा और पैसे भी। गर्मी में सिर हल्का हुआ सो अलग। फिर अब अगले दो महीने की छुट्टी हो गयी। जहां तक किसी की मृत्यु की बात है, तो कोरोना के कारण हर दिन सैकड़ों लोग मर रहे हैं। वे सब भी तो अपने ही हैं।

- चलिए शर्माजी, मैं आपको पहचान नहीं सका, इसका मुझे बहुत दुख है। भगवान करे ये महामारी जाए और मुखबंद उतरें। बड़ी परेशानी हो रही है इससे।

- नहीं, नहीं। इससे कई फायदे भी हैं। मैंने गुप्ताजी से तीन महीने पहले दस हजार रु. उधार लिये थे। वे कई बार मांग चुके हैं; पर मैं उन्हें हर बार टरका देता हूं। कल वे भी उस समय बाजार में ही थे। मैं उनके बगल से निकला; पर उन्होंने मुझे नहीं पहचाना। इसका लगाना तो ठीक ही है।

- शर्माजी, ठीक-ठीक बताओ कि आप इसके पक्ष में हैं या विपक्ष में ?

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- इस मामले में तो मैं निष्पक्ष हूं।

- यानि.. ?

- देखो वर्मा, अपराधी इससे खुश हैं और पुलिस वाले दुखी। अपराधी मुंह ढककर सामने से चला जाता है; पर वे पहचान नहीं पाते। फिर वह मुड़ कर मुस्कुराता है; पर बेचारे अब कुछ कर नहीं सकते। आग लगी हुई है उनके दिल में। उनका मासिक वसूली का नैतिक धंधा इसने मंदां कर दिया है। मैंने सुबह बाजार में द्विवेदीजी को नमस्ते कही, तो वे मुड़कर बोले, ‘‘मेरा दर्जा मत घटाइए। मैं द्विवेदी नहीं, चतुर्वेदी हूं।’’ अजीब मुसीबत है। आदमी को पहचानना मुश्किल हो गया है।

- जी ठीक कहा।

- लड़कियों से पूछो, इस मुए मुखबंद ने उनके मेकअप का मजा ही किरकिरा कर दिया है। आधे से ज्यादा चेहरा तो ये ही ढंक लेता है, तो मेकअप माथे का करें या कानों का ? शादी-विवाह के दिनों में कइयों की गाड़ी पटरी पकड़ लेती है; पर अब शादी के कार्यक्रम ऐसे हो रहे हैं मानो गुरुजी ट्यूशन पढ़ा रहे हों।

- शर्माजी, किस्से-कहानी छोड़कर ये बताइए कि आप मुझसे क्या चाहते हैं ?

- सिर्फ इतना कि तुम्हें बाजार में कोई भला आदमी मिले, तो थोड़ा मुड़-मुड़ के भी देख लिया करो। हो सकता है वो तुम्हारा पुराना दोस्त शर्मा ही हो।

इतना कहकर उन्होंने फोन पटक दिया। मैं काफी देर तक फोन को ही मुड़-मुड़ कर देखता रहा।

-विजय कुमार

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