रूस विरोधी और चीन प्रतियोगी, ट्रंप प्रशासन से बिल्कुल अलग है ड्रैगन से डील करने का बाइडेन का नजरिया, पुरानी दोस्ती है वजह?

By अभिनय आकाश | Jun 07, 2022

वर्तामान दौर में अगर हम भारत करे कि सुपर पावर मुल्क अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन कौन है। सबसे पहले नाम रूस का आता है वहीं हालिया घटनाक्रमों के  बाद सरसरी निगाहें चीन पर भी आकर टिक जाती है। लेकिन बाइडेन प्रशासन के सत्ता संभालने के बाद से अब तक संयुक्त राज्य अमेरिका के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी के रूप चीन के उभार को लेकर अपने विजन और अप्रोच का उल्लेख सार्वजनिक मंच से नहीं किया है। आपको याद होगा डोनाल्ड ट्रंप का वो दौर जब  चीन और अमेरिका के रिश्ते सबसे खराब दौर में पहुंच गए। कोरोना वायरस, ट्रेड डील, साउथ चाइना सी, ताइवान और जासूसी के मुद्दे पर ट्रंप ने बिना किसी लाग-लपेट के चीन को कठघरे में खड़ा किया। यहां तक की कोरोना को वुहान वायरस कहकर भी संबोधित किया था। ये और बात है कि राज्य के सचिव एंटनी ब्लिंकन ने एक भाषण में बाइडेन प्रशासन के दृष्टिकोण को रखा जिसमें स्वीकार किया गया कि चीन "अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के लिए सबसे गंभीर दीर्घकालिक चुनौती" है। अमेरिका के जॉर्ज वाशिंगटन विश्वविद्यालय में ब्लिंकन ने अपने संबोधन में कहा था कि चीन एकमात्र ऐसा देश है जिसकी मंशा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में बदलाव लाने की है और उसके पास ऐसा करने के लिए आर्थिक, कूटनीतिक, सैन्य और तकनीकी ताकत भी है। उन्होंने चीन को दीर्घावधि में अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और अमेरिका के लिए सबसे गंभीर चुनौती बताया था। लेकिन ये बात भी किसी से छुपी नहीं है कि बाइडेन प्रशासन केवल रूस को एक विरोधी के रूप में चिन्हित करता है, जबकि चीन को केवल एक प्रतियोगी कहता है। 

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बाइडेन ने खुद चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को पिछले नवंबर में एक आभासी शिखर बैठक में आश्वासन दिया था कि अमेरिका चीन की राजनीतिक व्यवस्था को बदलने या उसके खिलाफ अपने गठबंधनों को निर्देशित करने की कोशिश नहीं करेगा। जब उन्होंने पिछले सितंबर के महीने में शी जिनपिंग को फोन किया तो व्हाइट हाउस ने एक बयान में कहा, ‘‘दोनों नेताओं के बीच एक व्यापक, रणनीतिक चर्चा हुई जिसमें उन्होंने उन क्षेत्रों पर चर्चा की जहां हमारे हित मिलते हैं, और उन क्षेत्रों पर जहां हमारे हित, मूल्य और दृष्टिकोण भिन्न हैं।’’ व्हाइट हाउस को उम्मीद है कि बढ़ते मतभेदों के बावजूद दोनों पक्ष जलवायु परिवर्तन और कोरियाई प्रायद्वीप पर परमाणु संकट को रोकने सहित आपसी सरोकार के मुद्दों पर मिलकर काम कर सकते हैं। बाइडेन ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को लेकर जो नई रणनीति बनाई है। उसके मुताबिक बाइडेन अमेरिका और चीन के बीच जिम्मेदारी से प्रतिस्पर्धा को मैनेज करना चाहते हैं और इसी कड़ी में उन्होंने शी जिनपिंग से कई बार फोन पर बात भी की है।

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एक बार नहीं, दो बार नहीं, बल्कि हाल के महीनों में तीन बार बाइडेन ने कहा है कि अमेरिका सैन्य रूप से ताइवान की रक्षा करेगा। वहीं अपनी टोक्यो यात्रा के दौरान उस मुद्दे पर नए सिरे से अंतरराष्ट्रीय भ्रम पैदा करते हुए बाइडेन ने ताइवान पर चीन के आक्रमण की संभावना को कमतर बताते हुए कहा कि मेरी उम्मीद है कि ऐसा नहीं होगा।" लेकिन चीन को खुश करके बाइडेन ऐसी आक्रामकता को न्योता दे सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार वास्तव में यूक्रेन संघर्ष में अमेरिका की भागीदारी के जरिये बाइडेन ने शी को एक उपयुक्त समय पर ताइवान पर आगे बढ़ने के लिए एक अवसर प्रदान किया। बढ़ती धमकियों के जरिए शी पहले से ही ताइवान पर अपना दबाव बढ़ा रहा है।  

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वैसे बाइडेन और जिनपिंग की पुरानी दोस्ती भी किसी से छिपी नहीं है। बाइडेन चीन के लिए अनजान व्यक्ति नहीं हैं। जिनपिंग उन्हें काफी पहले से जानते हैं। 2001 में जब वे सीनेटर थे तो डब्ल्यूटीओ में चीन की एंट्री का उन्होंने पुरजोर समर्थन किया था। ओबामा के दौर में बाइडेन 8 साल उप राष्ट्रपति रहे। ओबामा के कहने पर ही उन्होंने जिनपिंग से अच्छे रिश्ते बनाए थे। जिनपिंग ने बाइडेन को अपना पुराना दोस्त भी बताया था।  

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