Core Vote Bank पाला बदलने पर यूँ ही मजबूर नहीं होता, ये बात BJP को समझ आ गयी होगी

By नीरज कुमार दुबे | Aug 04, 2026

राजनीति में कोई भी दल जब किसी क्षेत्र को अपना अभेद्य किला और वहां के मतदाताओं को अपना स्थायी वोट बैंक मानकर निश्चिंत हो जाता है, तभी उसकी पराजय की पटकथा लिखनी शुरू हो जाती है। लोकतंत्र में जनता किसी की बंधक नहीं होती। वह सत्ता देती भी है और उसी सत्ता के अहंकार को ध्वस्त भी करती है। बिहार के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव ने इसी लोकतांत्रिक सच को एक बार फिर स्थापित कर दिया है। तीन दशक से अधिक समय तक भाजपा के सबसे सुरक्षित गढ़ माने जाने वाले बांकीपुर में जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर की जीत मात्र एक उम्मीदवार की जीत नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक मानसिकता की हार है जो यह मान बैठी थी कि कुछ सीटें और कुछ वोट हमेशा के लिए उसके नाम लिखे जा चुके हैं।

इसे भी पढ़ें: Prashant Kishor का BJP पर तंज: 30 साल का किला सिर्फ 30 दिनों में ढहा

सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस परिणाम के बाद भाजपा के भीतर भी आत्ममंथन शुरू हो गया है। पार्टी के कई नेताओं का मानना है कि इस चुनाव ने सबसे बड़ा संदेश यह दिया है कि कोर वोट बैंक भी अब स्थायी नहीं रहा। जिस मतदाता को वर्षों तक पार्टी का अटूट समर्थक माना जाता था, उसने इस बार अपना रुख बदलकर बता दिया कि लोकतंत्र में समर्थन किसी दल की जागीर नहीं होता। मतदाता अब काम, व्यवहार और नेतृत्व की शैली के आधार पर फैसला करेगा, न कि केवल पुराने राजनीतिक रिश्तों के आधार पर।

यह भी स्वीकार किया जा रहा है कि सत्ता का आत्मविश्वास कई बार अहंकार में बदल जाता है और यही चुनावी हार की सबसे बड़ी वजह बनता है। चुनाव प्रचार के दौरान जिस तरह कुछ नेताओं के बयान सामने आए, उन्होंने भी यह संदेश दिया कि पार्टी अपने गढ़ को लेकर अत्यधिक आश्वस्त थी। लेकिन जनता ने मतदान के जरिए यह बता दिया कि किसी भी मतदाता को हल्के में लेने की कीमत राजनीतिक दलों को चुकानी पड़ सकती है।

इस हार के पीछे केवल विपक्ष की रणनीति नहीं, बल्कि भाजपा के भीतर की बेचैनी भी चर्चा का विषय बनी। उम्मीदवार चयन से लेकर संगठनात्मक बदलाव तक कई फैसलों को लेकर असंतोष की बातें सामने आईं। राज्य की सरकार में नेतृत्व परिवर्तन के बाद पार्टी के अंदर जिस तरह की खींचतान दिखाई दी, उसका असर भी चुनावी परिणामों में झलकता नजर आया। यह संदेश भी साफ है कि मजबूत संगठन होने का दावा तभी तक प्रभावी है, जब तक कार्यकर्ता और स्थानीय नेतृत्व स्वयं को सम्मानित महसूस करे।

मध्य प्रदेश के दतिया उपचुनाव ने भी लगभग यही कहानी दोहराई। भाजपा के लिए यह हार केवल कांग्रेस की जीत नहीं थी, बल्कि उसके सबसे प्रभावशाली नेताओं में रहे राज्य के पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा के राजनीतिक प्रभाव पर भी सवाल खड़े कर गई। स्थानीय स्तर पर लंबे समय से चली आ रही गुटबाजी, टिकट वितरण को लेकर नाराजगी और मिश्रा समर्थक संगठनात्मक ढांचे का पूरी तरह सक्रिय न हो पाना भाजपा पर भारी पड़ा। दूसरी ओर कांग्रेस ने स्थानीय असंतोष, बेरोजगारी, पलायन, खाद की कमी और कथित प्रशासनिक दबंगई जैसे मुद्दों को चुनाव का केंद्र बनाया। पार्टी ने चुनाव को सरकार के पक्ष या विपक्ष की लड़ाई बनाने के बजाय स्थानीय जनभावनाओं से जोड़ा और उसी का लाभ उठाया। साफ है कि मतदाताओं ने यहां भी यह संकेत दिया कि किसी एक नेता की राजनीतिक पकड़ या पुराने प्रभाव के भरोसे चुनाव नहीं जीते जा सकते।

वहीं बांकीपुर का संदेश केवल भाजपा तक सीमित नहीं है। यह उतनी ही बड़ी चेतावनी राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (यू) और देश के अन्य राजनीतिक दलों के लिए भी है। वर्षों से बिहार की राजनीति जातीय समीकरणों और परंपरागत वोट बैंकों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन इस उपचुनाव ने संकेत दिया है कि मतदाता अब नए विकल्पों को भी मौका देने के लिए तैयार है। यदि कोई दल यह मानकर चल रहा है कि कोई विशेष जाति, वर्ग या क्षेत्र हमेशा उसके साथ रहेगा, तो बांकीपुर का परिणाम उस भ्रम को तोड़ने के लिए पर्याप्त है।

बांकीपुर में प्रशांत किशोर की जीत का महत्व भी केवल एक सीट जीतने तक सीमित नहीं है। इस परिणाम ने यह संकेत दिया है कि बिहार की राजनीति में वर्षों से हावी जातीय ध्रुवीकरण के बीच अब विकास, शिक्षा, रोजगार, भ्रष्टाचार और पलायन जैसे मुद्दों के लिए भी राजनीतिक जगह बन रही है। भाजपा के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले शहरी गढ़ में जीत हासिल कर प्रशांत किशोर ने यह साबित किया कि यदि कोई राजनीतिक दल पारंपरिक वोट बैंक की राजनीति से आगे बढ़कर जनता के वास्तविक सरोकारों को लगातार उठाता है, तो वह स्थापित दलों के लिए चुनौती बन सकता है। यह जीत भाजपा के लिए सत्ता के अहंकार के खिलाफ चेतावनी है तो राजद के लिए भी संदेश है कि भाजपा विरोधी राजनीति पर उसका एकाधिकार अब निर्विवाद नहीं रहा। यानी यह परिणाम बिहार की राजनीति में एक नए राजनीतिक विकल्प के उभरने का संकेत भी देता है।

यही कारण है कि प्रशांत किशोर की जीत को केवल एक चुनावी सफलता के रूप में नहीं देखा जा रहा। इसे बिहार की राजनीति में एक नए राजनीतिक हस्तक्षेप के रूप में भी देखा जा रहा है। पिछली बार उन्हें चुनावी सफलता भले नहीं मिली थी, लेकिन उन्होंने शिक्षा, रोजगार, भ्रष्टाचार और पलायन जैसे मुद्दों को राजनीतिक बहस के केंद्र में लाने का प्रयास किया था। अब बांकीपुर की जीत ने उन मुद्दों को राजनीतिक वैधता भी प्रदान कर दी है।

इस जीत का सबसे बड़ा प्रतीकात्मक महत्व यही है कि यह भाजपा के सबसे मजबूत माने जाने वाले शहरी गढ़ में हासिल हुई। इससे यह संकेत भी मिला कि यदि कोई तीसरी राजनीतिक ताकत जनता के बीच विश्वसनीय विकल्प बनती है, तो बिहार की परंपरागत द्विध्रुवीय राजनीति का समीकरण बदल सकता है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि बिहार इस समय नेतृत्व परिवर्तन और राजनीतिक पुनर्संरचना के दौर से गुजर रहा है। एक ओर पुराने राजनीतिक चेहरे अपने प्रभाव को बनाए रखने की कोशिश में हैं, वहीं दूसरी ओर नई राजनीति की मांग भी लगातार मजबूत होती दिखाई दे रही है। ऐसे समय में बांकीपुर का परिणाम आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों के लिए एक मनोवैज्ञानिक संकेत बन गया है।

बहरहाल, भारतीय राजनीति लंबे समय तक "कोर वोट बैंक" की अवधारणा पर टिकी रही है। हर दल अपने कुछ सामाजिक समूहों और क्षेत्रों को अपनी स्थायी राजनीतिक पूंजी मानता रहा। लेकिन बदलते समय का मतदाता अब खुद को किसी दल की स्थायी संपत्ति मानने को तैयार नहीं है। वह सत्ता बदलने से भी नहीं हिचकता और नए चेहरे को मौका देने से भी नहीं डरता। बांकीपुर का जनादेश इसी बदलती राजनीतिक चेतना का सबसे सशक्त उदाहरण है। यह परिणाम बताता है कि लोकतंत्र में जनता अंतिम निर्णायक है। वह किसी भी दल को जितना ऊपर उठा सकती है, उतनी ही तेजी से उसे जमीन पर भी ला सकती है। एक सच्चाई सभी को समझनी होगी कि लोकतंत्र में कोई किला हमेशा के लिए अभेद्य नहीं होता और कोई वोट बैंक हमेशा के लिए किसी का नहीं होता।

-नीरज कुमार दुबे

प्रमुख खबरें

सिर्फ एक बंदा काफ़ी है: PK से ओवैसी तक...कैसे अकेले दम पर राजनीति का रुख बदलने में लगे ये लोन वॉरियर्स

India Bhutan China Tri-Junction पर भारत की नई रणनीति ने किया हैरान, Doklam तक पहुँचेगी रेल, चीन के छूटे पसीने

Avengers: Endgame का रिकॉर्ड तोड़कर Spider-Man ने उत्तरी अमेरिका में रची इतिहास

Jammu में Amarnath Yatra के लिए 964 श्रद्धालुओं का नया जत्था रवाना