स्वतंत्रता की अलख जगाने वाले महान क्रांतिकारी थे बिपिन चंद्र पाल

By टीम प्रभासाक्षी | Nov 07, 2023

भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाने वाली लाल-बाल-पाल की तिकड़ी को तो हम सभी जानते ही हैं। इस तिकड़ी ने अंग्रेजों को नाकों चने चबवा दिए थे। ये तीन पूरे नाम थे लाला लाजपत राय ‘लाल’, बाल गंगाधर तिलक ‘बाल’ और बिपिन चंद्र पाल ‘पाल’। भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास में इन क्रांतिकारियों के नाम सुनहरे अक्षरों में लिखे गए हैं। इस तिकड़ी में से एक बिपिन चंद्र पाल का आज 7 नवंबर को जन्मदिन है। आइए जानते हैं देश के इस महान क्रांतिकारी, समाजसुधारक, शिक्षाविद और सिद्धांतवादी के जीवन से जुड़ी कुछ बातें।

इसे भी पढ़ें: Sardar Patel Birth Anniversary: लौहपुरुष एवं भारत के बिस्मार्क थे सरदार पटेल

उस समय जब पूरा भारत अंग्रेजों के अत्याचारों से ग्रस्त था, बिपिन चन्द्र पाल हर हाल में अंग्रेजों से भारत को मुक्ति दिलाने के लिए प्रतिबद्ध थे, उन्होंने भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के लिए रूपरेखा तैयार की। भारत में स्वदेशी आंदोलन के बाद पाल इंग्लैंड चले गए थे जहां जाकर वे क्रांतिकारी विचारधारा वाले इंडिया हाउस जिसके संस्थापक श्यामजी कृष्ण वर्मा थे से जुड़ गए और ‘स्वराज पत्रिका’ का प्रकाशन शुरू किया। उन्होंने स्थानीय भारतीयों के बीच अपने क्रांतिकारी विचार रखे। 1909 में क्रांतिकारी मदनलाल ढींगरा ने जब कर्जन वाइली की हत्या कर दी तो स्वराज पत्रिका का प्रकाशन बंद करना पड़ा। जिसके बाद बिपिन चन्द्र भारत लौट आए।

भारत में स्वराज की अलख जगाने के लिए उन्होंने कई अखबार भी निकाले जिनमें बंगाली साप्ताहिक ‘परिदर्शक’ वर्ष 1886 में, अंग्रेजी साप्ताहिक ‘न्यू इंडिया’ वर्ष 1902 में और बंगाली दैनिक ‘वंदे मातरम’ वर्ष 1906 में निकले प्रमुख अखबार थे। इन अखबारों के जरिए बिपिन चंद्र पाल ने पूर्ण स्वराज, स्वदेशी वस्तुएं अपनाओ और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करो जैसी अपनी आवाज को बुलंद किया तथा राष्ट्रीय शिक्षा के महत्व का भी प्रचार किया और इन आदर्शों के प्रति लोगों को प्रेरित किया। इसके लिए उन्होंने कई सभाएं भी कीं। उनका कहना था कि विदेशी उत्पादों की वजह से देश की अर्थव्यवस्था खराब हो रही है और बेरोजगारी बढ़ रही है। अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग आंदोलन या अहिंसावादी आंदोलन जैसे नरम विरोध के तौर-तरीकों के वे सख्त खिलाफ थे। अंग्रेजों के खिलाफ 1905 में चलाए गए बंग-भंग विरोधी आंदोलन में उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और उसके खिलाफ कई सभाएं भी कीं।

1907 में ‘वंदे मातरम’ पत्र में उनके द्वारा अंग्रेजों के विरूद्ध जनमत तैयार करने और अरविन्द घोष पर चल रहे राजद्रोह के मुकदमें पर गवाही न देने के कारण उन्हें 6 माह के लिए जेल भेजा गया। 

बिपिन चंद्र पाल को उनके क्रांतिकारी विचारों के कारण गरम दल का नेता कहा जाता था। निर्भीक और खुले विचारों वाले बिपिन पाल का कहना था कि दासता मानवीय आत्मा के विरूद्ध है, भगवान ने सब प्राणियों को स्वतंत्र बनाया है।

अपने जीवन के अंतिम वर्षों में कोलकाता में रहते हुए बिपिन चन्द्र पाल ने स्वयं को राजनीति से अलग कर लिया था। 20 मई 1932 में पाल इस दुनिया को अलविदा कह गए। 

परतंत्रता की बेड़ियों से हटकर भारत में स्वतंत्रता की अलख जगाने वाले महान क्रांतिकारी बिपिन चंद्र पाल आज भले ही दुनिया में नहीं है किन्तु देश हित के लिए किए उनके कार्यों के जरिए आज भी वे हर भारतवासी के मन में बसे हैं। 

प्रमुख खबरें

एक या दो नहीं, चारों दिशाओं में अपनी पहुंच मजबूत कर रहा है भारत, Global Politics के भी जबरदस्त खिलाड़ी बने Modi

सेट पर बंद हुआ कैमरा, बहने लगा खून... जब अमिताभ बच्चन की वजह से अस्पताल पहुंच गये थे विनोद खन्ना, बॉलीवुड की सबसे बड़ी जंग!

Pocket Entertainment का वार्षिक राजस्व 70 प्रतिशत बढ़कर 50 करोड़ डॉलर पहुंचा

Mahadevi Verma Death Anniversary: साहित्य से समाज सेवा तक, ऐसा रहा हिंदी की मीरा का Iconic Journey