भाजपा से दशकों पुराना नाता तोड़कर 'दिग्गा' बने थे मुख्यमंत्री, एकनाथ शिंदे ने बगावत कर गिराई थी सरकार

By अनुराग गुप्ता | Jul 27, 2022

मुंबई। पूर्व मुख्यमंत्री और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे अपना 62वां जन्मदिन मना रहे हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने उन्हें बधाई दी है। एकनाथ शिंदे शिवसेना के वही नेता हैं, जिन्होंने बागी विधायकों का नेतृत्व किया और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महाविकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार का कार्यकाल पूरा नहीं होने दिया। हालांकि एकनाथ शिंदे और तमाम बागी विधायकों ने कभी भी उद्धव ठाकरे को लेकर तल्ख टिप्पणी नहीं की।

साल 2019 के विधानसभा चुनाव को उद्धव ठाकरे ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ मिलकर लड़ा था लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद उन्होंने दशकों पुराने गठबंधन को तोड़कर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) और कांग्रेस से हाथ मिला लिया था। ऐसे में तीनों पार्टियों को मिलकर एक नया गठबंधन तैयार हुआ था, जिसे महाविकास अघाड़ी (एमवीए) नाम दिया गया था।

आपको बता दें कि भाजपा ने भले ही विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें जीती थीं लेकिन शिवसेना के साथ छोड़ने के बाद सरकार बनाना थोड़ा मुश्किल हो गया था लेकिन भाजपा ने फिर भी एनसीपी नेता अजित पवार के साथ मिलकर सरकार बनाई थी। खैर वो बाद अलग है कि राजनीति के भीष्म पितामह माने जाने वाले शरद पवार के एक्टिव होते ही देवेंद्र फडणवीस को इस्तीफा देना पड़ा और अजित पवार वापस से एमवीए में आ गए। जिसके बाद शिवसेना प्रमुख ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। यह महाराष्ट्र की राजनीति में पहला मौका था जब ठाकरे परिवार का कोई सदस्य सीधे सरकार का नेतृत्व कर रहा था।

हिंदुत्व के चेहरा रहे उद्धव ठाकरे के पिता, जिन्होंने शिवसेना की स्थापना की थी, ने कभी सार्वजनिक पद ग्रहण नहीं किया था, लेकिन वर्ष 1995-99 में बनी पहली शिवसेना-भाजपा गठबंधन सरकार को रिमोट कंट्रोल की भांति चलाया। कुशल फोटोग्राफर उद्धव ठाकरे स्वभाव से मिलनसार हैं लेकिन 2019 के विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री पद की मांग भाजपा के सामने रखते हुए उन्होंने अपने पिता की तरह ही आक्रामक तेवर दिखाए थे। उद्धव ठाकरे ने स्वयं कई बार कहा था कि महा विकास आघाडी बनने के बाद वह मुख्यमंत्री बनने के इच्छुक नहीं थे लेकिन शरद पवार ने उनके शीर्ष पद की जिम्मेदारी लेने पर जोर दिया। लेकिन सत्ता पर काबिज होने के करीब ढाई साल बाद मुख्यमंत्री के तौर पर उद्धव ठाकरे की राजनीतिक पारी अचानक समाप्त हो गई। 

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उद्धव ठाकरे जिन्हें 'दिग्गा' के नाम से भी जाना जाता है, ने अपने पिता की पार्टी के कार्यों में 1990 से ही मदद करनी शुरू कर दी थी। उद्धव ठाकरे को 2003 में पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया जबकि उनके चचेरे भाई राज ठाकरे को अधिक करिश्माई और आक्रामक नेता माना जाता था। यह संयोग है कि राज ठाकरे ने स्वयं उद्धव ठाकरे का नाम इस पद के लिए महाबलेश्वर सम्मेलन में प्रस्तावित किया था। उद्धव ठाकरे की इस पदोन्नति से अंतत: पार्टी में टूट हुई। वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे ने भी राज ठाकरे का अनुकरण किया और वर्ष 2005 में शिवसेना से अलग हो गए। हालांकि, इस झटके के बावजूद शिवसेना अहम बृह्नमुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) और ठाणे नगर निगम (टीएमसी) चुनाव वर्ष 2002,2007, 2012 और 2017 में जीतने में सफल रही।

पार्टी को एकजुट नहीं कर पा रहे दिग्गा

वर्ष 2012 में जब बालासाहेब ठाकरे का निधन हुआ तो पार्टी के कई आलोचकों का कहना था कि शिवसेना समाप्त हो सकती है। लेकिन इन बातों को गलत साबित करते हुए उद्धव ठाकरे पार्टी को एकजुट रखने में सफल रहे थे। लेकिन मौजूदा समय में उद्धव ठाकरे पार्टी को एकजुट कर पाने में लगातार नाकामयाब हो रहे हैं। क्योंकि पार्टी नेता, कार्यकर्ता, पार्षद, विधायक और सांसद लगातार उनके खेमे से छिटककर एकनाथ शिंदे के खेमे में जाते हुए दिखाई दे रहे हैं।

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