Goa Nightclub Fire: Bombay High Court ने रद्द की 3 आरोपियों की जमानत, 2 हफ्ते में सरेंडर का आदेश

By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Aug 20, 2026

मुंबई उच्च न्यायालय ने गोवा नाइटक्लब अग्निकांड मामले में तीन आरोपियों को दी गई जमानत यह कहते हुए रद्द कर दी अधीनस्थ अदालत जांच के दौरान जुटाई गई सामग्री पर ठीक से विचार नहीं कर पाई और उसकी यह टिप्पणी गलत थी कि यह अपराध हत्या या डकैती जितना जघन्य नहीं था। उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से प्रथम दृष्टया संकेत मिलता है कि रेस्तरां बिना लाइसेंस के संचालित किया जा रहा था और उसका ढांचा अनधिकृत था। साथ ही, आरोपी और उसके साझेदार कथित तौर पर पर्याप्त सुरक्षा उपायों के बिना परिसर में आतिशबाजी करने के जोखिमों से परिचित थे।

सौरभ लूथरा और गौरव लूथरा भाई हैं। वे अपने व्यावसायिक साझेदार अजय गुप्ता के साथ ‘मैसर्स बीइंग जीएस हॉस्पिटैलिटी अर्पोरा एलएलपी’ में साझेदार थे, जो इस नाइटक्लब का संचालन करती थी। तीनों आरोपियों को इस साल अप्रैल में अधीनस्थ अदालत ने जमानत दी थी।

अपने आदेश में उच्च न्यायालय ने तीनों आरोपियों को दो सप्ताह के भीतर सत्र अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। हालांकि, अदालत ने उन्हें आत्मसमर्पण के बाद नए सिरे से जमानत याचिका दायर करने की अनुमति दी। अदालत राज्य सरकार द्वारा दायर उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें आरोपियों को जमानत देने के सत्र अदालत के आदेश को चुनौती दी गई थी।

राज्य सरकार ने दलील दी कि सत्र अदालत अपराध की गंभीरता को समझ नहीं पाई। राज्य के अनुसार, कथित आपराधिक लापरवाही, लापरवाह आचरण और वैधानिक अग्नि सुरक्षा मानकों के उल्लंघन के कारण 25 लोगों की मौत हुई। उच्च न्यायालय ने कहा कि जमानत के लिए दायर याचिका आरोपियों की दूसरी याचिका थी और उनकी पहली याचिका महज दो महीने पहले खारिज की गई थी।

अदालत ने कहा कि सत्र अदालत ने जमानत देने को उचित ठहराने के लिए आरोपपत्र दाखिल होने के अलावा किसी अन्य बदली परिस्थिति का उल्लेख नहीं किया था। उच्च न्यायालय ने इस निष्कर्ष को भी खारिज कर दिया कि आरोपी के फरार होने का कोई खतरा नहीं है। अदालत ने कहा कि जिस दिन प्राथमिकी दर्ज हुई, उसी दिन आरोपी देश छोड़कर फरार हो गया था और बाद में उसे भगोड़ा घोषित किया गया।

अदालत ने कहा कि आरोपपत्र दाखिल होने से आरोपों की गंभीरता कम नहीं हो जाती और न ही इससे आरोपी को जमानत पाने का कोई अधिकार मिल जाता है। उच्च न्यायालय ने कहा कि सत्र अदालत की यह टिप्पणी गलत थी कि अपराध हत्या या डकैती जितना जघन्य नहीं था। उसने इस बात पर बल दिया कि कथित अपराध की गंभीरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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