By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Oct 30, 2026
मुंबई उच्च न्यायालय ने सितंबर 2011 में नक्सली समूह का सदस्य होने के आरोप में हुई सामाजिक कार्यकर्ता अरुण फरेरा की गिरफ्तारी को अवैध करार दिया और महाराष्ट्र सरकार को उन्हें मुआवजे के तौर पर दो लाख रुपये देने का आदेश दिया है। फरेरा 2018 के भीमा कोरेगांव मामले में भी आरोपी हैं। फिलहाल वह इस मामले में जमानत पर बाहर हैं।
सभी मामलों में बरी होने के बाद, सितंबर 2011 में उन्हें नागपुर जेल से रिहा किया जाना था। लेकिन जैसे वह जेल से निकले, पुलिस दल ने उन्हें रोक लिया। पुलिस दल उन्हें गाड़ी में बिठाकर ले गया एवं बाद में गढ़चिरौली पुलिस ने दिखाया कि उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
अपनी अर्जी में फरेरा ने कहा कि उस समय उन्हें गिरफ्तारी का आधार नहीं बताया गया। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि पुलिस ने संविधान के अनुच्छेद 21 (स्वतंत्रता का अधिकार) और अनुच्छेद 22 (गिरफ्तारी और हिरासत के खिलाफ संरक्षण) के तहत फरेरा के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया है। उच्च न्यायालय ने कहा कि पुलिस की मुख्य जिम्मेदारी कानून की रक्षा करना है, लेकिन जब वह खुद ही इसका उल्लंघन करती है, तो ऐसी गलती के लिए सजा इतनी सख्त होनी चाहिए कि उसका एक कड़ा संदेश जाए और समाज में भरोसा कायम हो सके।
उच्च न्यायालय ने कहा कि यह भी याद दिलाना समीचीन हो सकता है कि महाराष्ट्र पुलिस का आदर्श वाक्य सद्रक्षणाय खलनिग्रहणाय (अच्छे लोगों की रक्षा करना और बुरे लोगों को दंडित करना) है, जिसका सम्मान किया जाना चाहिए।