By अभिनय आकाश | Oct 27, 2026
बॉम्बे हाई कोर्ट ने मंगलवार को पुणे के एक इंजीनियरिंग छात्रा के खिलाफ दर्ज FIR को खारिज कर दिया। छात्रा पर 'ऑपरेशन सिंदूर' से जुड़ी एक विवादित सोशल मीडिया पोस्ट को दोबारा शेयर करने का आरोप था। कोर्ट ने कहा कि युवावस्था में हुई गलती को अपने आप जानबूझकर किया गया आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी पोस्ट को आपत्तिजनक मान लेना ही, किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हो सकता। न्यायमूर्ति मिलिंद एन. जाधव ने खदीजा शहाबुद्दीन शेख की याचिका को स्वीकार कर लिया। उन्होंने कहा कि अभियोजन पक्ष ऐसे पर्याप्त सबूत पेश करने में विफल रहा, जिनसे इन अपराधों के लिए जरूरी 'आपराधिक इरादा' साबित हो सके। अदालत ने कहा कि ऐसी सामग्री जो आपत्तिजनक हो सकती है, और ऐसा आचरण जो आपराधिक अपराध की श्रेणी में आता है। इन दोनों के बीच के अंतर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
राज्य ने याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि आपत्तिजनक सामग्री को दोबारा पोस्ट करने पर आपराधिक दायित्व भी बन सकता है। उन्होंने आगे कहा कि पोस्ट को हटा देने और माफी मांग लेने से ही ऐसा दायित्व अपने आप खत्म नहीं हो जाता। अदालत ने गौर किया कि इसके परिणामस्वरूप कोई गैर-कानूनी घटना सामने नहीं आई है। अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि आपराधिक कार्यवाही का उद्देश्य सजा देने के बजाय सुधार लाने वाला होना चाहिए, खासकर युवा छात्रों के मामले में। इसके बाद अदालत ने कोंढवा पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR को रद्द कर दिया।