By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Oct 13, 2026
बंबई उच्च न्यायालय ने एक दंपति पर ईसाई धर्म अपनाने के लिए दबाव डालने के आरोप में चार लोगों के खिलाफ दर्ज मामला रद्द कर दिया और कहा कि किसी व्यक्ति पर धर्मांतरण करने का दबाव डालना किसी वर्ग की धार्मिक मान्यताओं का अपमान करने के समान नहीं है। उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ के न्यायमूर्ति एम. डब्ल्यू. चांदवानी ने कहा कि आरोपी अपने धर्म का प्रचार कर रहे थे, लेकिन उन्होंने देश के किसी भी वर्ग के नागरिकों की धार्मिक भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाई थी। अभियोजन पक्ष का दावा था कि आरोपियों ने शिकायतकर्ता और उसकी पत्नी से कहा था कि यदि वे हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपना लेते हैं, तो उन्हें हर महीने पैसे दिए जाएंगे, उनके बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाया जाएगा और उनके लिए एक घर भी बनवाया जाएगा।
अदालत ने छह अक्टूबर के अपने आदेश में कहा कि अधिक से अधिक आरोपियों पर यह आरोप लगाया जा सकता है कि उन्होंने शिकायतकर्ता और उसकी पत्नी पर हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपनाने का दबाव डाला था, लेकिन इससे उनकी धार्मिक मान्यताओं को ठेस नहीं पहुंची थी। अदालत ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि कथित घटना वर्ष 2025 में हुई थी। उस समय महाराष्ट्र में प्रलोभन देकर धर्मांतरण कराने पर रोक लगाने वाला कोई कानून नहीं था।
अदालत ने कहा कि महाराष्ट्र ने धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा और गैरकानूनी धर्मांतरण पर रोक लगाने के लिए कानून बनाया है, जो 28 अगस्त 2026 से लागू हुआ। उच्च न्यायालय ने अमरावती निवासी आरोपियों जोसेफ खुड़ावंत, उनके बेटे विक्टर खुड़ावंत, बहू एल्विना खुड़ावंत और सामाजिक कार्यकर्ता अनंत मानकर के खिलाफ प्राथमिकी और आरोपपत्र रद्द कर दिया। आरोपियों ने जनवरी में अमरावती में दर्ज प्राथमिकी और इस मामले में दाखिल आरोपपत्र को रद्द करने की मांग की थी।