Border 2 Review: भव्य पैमाना और सितारों की फौज, पर 'बॉर्डर' वाली रूह नदारद

By रेनू तिवारी | Jan 27, 2026

देशभक्ति अपने सबसे शुद्ध रूप में एक ऐसी भावना है जिसे शब्दों में पिरोना कठिन है। यह एक ऐसा अहसास है जो या तो आपके भीतर होता है, या नहीं होता। यह काफी हद तक ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास जैसा है-एकतरफा और गहरा। अक्सर सिनेमा इस भावना को छूने की कोशिश करता है, लेकिन क्या हर फिल्म उस 'दिल' तक पहुँच पाती है? 'लाल सिंह चड्ढा' जैसी फिल्मों में मानवता को राष्ट्रीय गौरव से ऊपर रखने का तर्क दिमाग को तो समझ आता है, लेकिन एक सच्चे देशभक्त के दिल को शायद नहीं। इसी उम्मीद के साथ जब हम 'बॉर्डर 2' देखने बैठते हैं, तो दिल वही पुरानी गर्माहट और अपने देश के प्रति उस निस्वार्थ प्रेम की तड़प को महसूस करना चाहता है।

स्क्रीनप्ले की उलझन: ब्रोमांस और मेलोड्रामा के बीच फंसी कहानी

सुमित अरोड़ा और अनुराग सिंह द्वारा लिखित इस फिल्म का स्क्रीनप्ले एक साथ कई दिशाओं में भागने की कोशिश करता है, और यही इसकी सबसे बड़ी कमजोरी बनकर उभरता है। फिल्म का एक बड़ा हिस्सा युद्ध की गंभीरता दिखाने के बजाय किसी 'वॉर ट्रेनिंग एकेडमी' के ड्रामे जैसा लगने लगता है। पटकथा में गहराई की कमी इसे एक थका देने वाले अनुभव में बदल देती है।

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फिल्म के इस हिस्से में हम देखते हैं:

दिलजीत दोसांझ (निर्मल जीत सिंह सेखों): एक खुशमिजाज और जिंदादिल फौजी के रूप में दिलजीत अपनी ऊर्जा तो लाते हैं, लेकिन पटकथा उन्हें केवल मनोरंजन तक सीमित कर देती है।

वरुण धवन (होशियार सिंह दहिया): वरुण का किरदार एक 'सुस्त' फौजी का है, जिसे दिलजीत का किरदार दोस्ती के जरिए प्रेरित करने की कोशिश करता है।


अहान शेट्टी (एम. एस. रावत): अहान इस 'ब्रोमांस' (लड़कों की आपसी दोस्ती) को पूरा करने के लिए एक सहायक कड़ी के रूप में नजर आते हैं।

यह पूरा हिस्सा किसी गंभीर युद्ध फिल्म के बजाय एक 'स्टेज्ड मेलोड्रामा' जैसा महसूस होता है। जहाँ दर्शकों को सरहद की चुनौतियों और मानसिक तनाव की उम्मीद थी, वहाँ फिल्म काफी समय तक आपसी हंसी-मजाक और सतही दोस्ती के इर्द-गिर्द घूमती रहती है। ऐसा लगता है मानो मेकर्स ने युद्ध के मैदान में उतरने से पहले कहानी को खींचने के लिए इन हल्के-फुल्के पलों का सहारा लिया है, जो फिल्म की लय (Pace) को काफी धीमा कर देते हैं।

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बॉर्डर 2: एक प्रारंभिक समीक्षा और विश्लेषण

नॉस्टैल्जिया और देशभक्ति का संगम

'बॉर्डर' केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि भारतीयों के लिए एक भावना है। 'बॉर्डर 2' उसी विरासत को आगे बढ़ाने का वादा करती है। जे.पी. दत्ता की जगह इस बार निर्देशन की कमान अनुराग सिंह (केसरी फेम) संभाल रहे हैं, जो युद्ध की बारीकियों को पर्दे पर उतारने में माहिर माने जाते हैं।

स्टार कास्ट: पुराना जोश, नया खून

फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसकी कास्टिंग है: सनी देओल 'तारा सिंह' की सफलता के बाद सनी पाजी एक बार फिर फौजी वर्दी में दहाड़ने के लिए तैयार हैं। उनके बिना 'बॉर्डर' की कल्पना करना मुश्किल है। वरुण धवन और दिलजीत दोसांझ, इन दो सितारों के जुड़ने से फिल्म को युवाओं के बीच जबरदस्त अपील मिली है। दिलजीत का जुड़ाव पंजाब के बेल्ट में फिल्म की पहुंच को दोगुना कर देगा। फिल्म में नए चेहरों को भी जगह दी गई है जैसे अहान शेट्टी, ताकि कहानी में ताजगी बनी रहे।

कहानी और पृष्ठभूमि (Battle of Longewala Continued?)

जहाँ पहली फिल्म 1971 के लोंगेवाला युद्ध पर आधारित थी, वहीं चर्चा है कि सीक्वल में उसी युद्ध के उन पहलुओं को दिखाया जा सकता है जिन्हें पहली फिल्म में जगह नहीं मिली थी, या फिर किसी अन्य ऐतिहासिक वीरता की कहानी को पेश किया जाएगा।

तकनीकी पक्ष (VFX और संगीत)

VFX: 1997 के मुकाबले आज की तकनीक बहुत उन्नत है। 'बॉर्डर 2' में युद्ध के दृश्यों (War Sequences) को अधिक वास्तविक और भव्य बनाने की उम्मीद है।

संगीत: 'संदेशे आते हैं' जैसा जादू दोबारा पैदा करना एक बड़ी चुनौती होगी। हालांकि, देशभक्ति के गीतों के लिए मेकर्स फिर से कुछ आइकोनिक धुनों का सहारा ले सकते हैं।

शक्तिशाली पक्ष (Strengths)

फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष इसका 'ब्रांड नेम' और सनी देओल की वापसी है। 'गदर 2' की ऐतिहासिक सफलता ने यह साबित कर दिया है कि दर्शक सनी देओल को उनके पुराने कड़क अंदाज और देशभक्ति वाली भूमिकाओं में देखने के लिए आज भी उतने ही उत्साहित हैं। इसके अलावा, फिल्म की स्टार कास्ट में वरुण धवन और दिलजीत दोसांझ जैसे सितारों को शामिल करना एक मास्टरस्ट्रोक है; यह न केवल फिल्म को 'यूथ अपील' देता है, बल्कि उत्तर भारत और पंजाब के बाजारों में इसकी पकड़ को बेहद मजबूत बनाता है। आधुनिक तकनीक और बेहतर बजट होने के कारण, इस बार युद्ध के दृश्यों (War Sequences) का स्तर अंतरराष्ट्रीय फिल्मों जैसा होने की उम्मीद है, जो दर्शकों को एक भव्य सिनेमाई अनुभव प्रदान करेगा।

कमजोर पक्ष (Weaknesses)

इस फिल्म के लिए सबसे बड़ी चुनौती 'तुलना का बोझ' है। 1997 की 'बॉर्डर' एक क्लासिक फिल्म है, जिसके गाने, संवाद और जज्बात आज भी लोगों के दिलों में बसे हैं। उस जादू को दोबारा पैदा करना और दर्शकों की भारी उम्मीदों पर खरा उतरना मेकर्स के लिए एक कठिन काम होगा।

एक और जोखिम कहानी के 'दोहराव' (Repetition) का है; अगर फिल्म में केवल वही पुराने फॉर्मूले और अत्यधिक मेलोड्रामा का इस्तेमाल किया गया, तो आधुनिक दर्शक इसे नकार भी सकते हैं। साथ ही, निर्देशक अनुराग सिंह के लिए जे.पी. दत्ता की उस सिग्नेचर स्टाइल और इमोशनल गहराई को बनाए रखना एक बड़ी परीक्षा होगी, जिसने 'बॉर्डर' को अमर बना दिया था।

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