By संतोष उत्सुक | Jan 24, 2022
कई साल पहले हमारे मकान मालिक ने अपनी पुत्र वधु के लिए लड़का गर्भित कर देने वाली एक ख़ास बूटी की एक पुड़िया सिर्फ एक हज़ार रूपए में लाकर दी थी। दिलचस्प यह है कि वह पहले से एक लड़के के दादा थे लेकिन दूसरा बच्चा भी वह लड़का ही चाहते थे। लड़का पैदा होने का मोह जाता नहीं। इत्तफाक से अगली बार भी उनके यहां लड़का ही हुआ। उन्हें एक हज़ार रूपए खर्चने का दुःख नहीं हुआ। खैर, कुछ भी कर लो हमारे समाज में लड़का ज़रूर होने की एहमियत कम नहीं हुई हैं। हमारे यहां मंतव्य पूरा करने के लिए मंदिरों में रातों रात यज्ञ, अनुष्ठान, हवन करा दिए जाते हैं चाहे मंतव्य स्वार्थ भरे कितने ही कीचड़ में लिपटा हो। दैवीय शक्तियां भी उन्हें सफलता का आशीर्वाद देती ही होंगी।
मजेदार यह है कि इस शोधपत्र को एक बायोलोजिकल जर्नल में जगह मिली है। बताते हैं मानसिक तनाव भी जन्म में सहयोग देता है। इस शोध को प्रदूषण घटाने के लिए प्रेरक माना जा सकता है क्यूंकि इससे लिंगानुपात सुधारने की राह खुलेगी। हमारे यहां तो प्रदूषण घटाने के लिए कानून बनाने, कागज़ों पर नियम और अनुशासन लागू करने के सिवाए और ज़्यादा कुछ करने का समय किसी के पास नहीं होता। अगर शोध से प्रेरित होकर प्रदूषण जैसे कैसे कम करवा दिया जाए तो लड़कियां ज़्यादा पैदा होने लगेंगी लेकिन आम मातापिता की परेशानियां बढ़ जाएंगी। वे पूछेंगी हमें क्यूं पैदा किया।
लड़का तो आज के युग में भी महत्त्वपूर्ण संपत्ति होता है। वैसे शोधकर्ता यह भी कहते हैं कि लड़के के जन्म के पीछे प्रदूषणकारी तत्त्व वास्तव में क्या असर डालते हैं इस बारे पता नहीं लगाया है। जन्म के आंकड़े, वातावरण व हालात के आधार पर पकाया निष्कर्ष है। हमारे यहां भी तो आंकड़ों को, मन पसंद तेल में, पकौड़ों की तरह हल्का या गहरा तला जाता है और हालात के हिसाब से पेश कर दिया जाता है। सभी स्वाद ले लेकर पकाते, बांटते, खाते और पचाते हैं। बचाकर भी रख लेते हैं। माफ़ करें, बात कहीं से कहीं पहुच गई, लेकिन लड़का तो लड़का होता है जी।
- संतोष उत्सुक