Ghooskhor Pandat Web Series के खिलाफ ब्राह्मणों का प्रदर्शन, Yogi ने लिया सख्त एक्शन, निर्माता-निर्देशक पर करवाई FIR

By नीरज कुमार दुबे | Feb 06, 2026

वेब सीरीज घूसखोर पंडत को लेकर बढ़ते विवाद के बीच लखनऊ के हजरतगंज थाने में एक प्राथमिकी दर्ज की गयी है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर इस वेब सीरीज के निर्देशक और निर्माण दल के कई सदस्यों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज की गयी है। शिकायत में कहा गया है कि वेब सीरीज की विषयवस्तु और विशेषकर उसका नाम जन भावनाओं को आहत करता है और सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ सकता है। प्रशासन ने सीधे कानूनी कदम उठाकर साफ कर दिया है कि जन असंतोष को नजरअंदाज नहीं किया जायेगा।

हम आपको बता दें कि इस मामले ने तब और जोर पकड़ा जब यह जानकारी सामने आयी कि मुख्यमंत्री ने खुद कानून व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों को शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई के निर्देश दिये। शासन का संदेश साफ है कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर समाज को भड़काने की छूट नहीं दी जा सकती।

उधर, विवाद बढ़ने पर निर्देशक नीरज पांडे ने बयान जारी किया। उन्होंने कहा कि यह एक काल्पनिक पुलिस कथा है और पंडत शब्द केवल एक काल्पनिक चरित्र का बोली में प्रचलित नाम है। उनका दावा है कि कहानी किसी जाति, धर्म या समुदाय पर टिप्पणी नहीं करती, बल्कि एक व्यक्ति के कर्म पर केंद्रित है। उन्होंने यह भी कहा कि एक रचनाकार के रूप में वह जिम्मेदारी और सम्मान का ध्यान रखते हैं।

इस बीच, लगातार बढ़ते विरोध के बीच निर्माण दल ने फिलहाल सारी प्रचार सामग्री हटा लेने का निर्णय लिया है। उनका कहना है कि वेब सीरीज को पूरी कहानी के संदर्भ में समझा जाना चाहिये, न कि छोटी झलक के आधार पर परखा जाना चाहिये। उन्होंने भरोसा जताया कि शीघ्र ही दर्शकों के सामने पूरी वेब सीरीज पेश की जायेगी। इस बीच वेब सीरिज निर्माता संघ ने भी आपत्ति जताते हुए सूचना जारी की है कि शीर्षक के लिये जरूरी अनुमति नहीं ली गयी। संघ के अनुसार उद्योग के नियमों के तहत नाम की स्वीकृति अनिवार्य है और उसका पालन नहीं किया गया।

हम आपको बता दें कि यह वेब सीरीज अभिनेता मनोज बाजपेयी को अजय दीक्षित नाम के एक भ्रष्ट और नैतिक रूप से गिर चुके पुलिस अधिकारी के रूप में दिखाता है, जिसे उपनाम पंडत से पुकारा जाता है। यह कहानी एक ही रात में घटती घटनाओं पर आधारित है। इसमें नुसरत भरुचा और साकिब सलीम भी प्रमुख भूमिका में हैं।

बहरहाल, देखा जाये तो यह प्रकरण केवल एक वेब सीरीज का विवाद नहीं, बल्कि हमारे समय का आईना है। रचनाकार जब समाज से विषय लेते हैं तो उन्हें यह भी समझना होगा कि शब्दों की चोट तलवार से गहरी होती है। यदि नाम ही ऐसा हो जो किसी समुदाय को कटघरे में खड़ा कर दे, तो रोष स्वाभाविक है। कला को आजादी चाहिये, पर आजादी का अर्थ बेलगाम उकसावा नहीं हो सकता।

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