भाजपा के लिए बडी चुनौती होगी टीएमटी नेटवर्क को तोड़ना

By अशोक मधुप | May 05, 2026

भाजपा ने पश्चिम बंगाल में पूर्ण बहुमत से भी कहीं ज्यादा सीट पाकर सत्ता तो कब्जा ली, भारी बहुमत भी हासिल कर लिया, किंतु उसे यहां टीएमटी की बड़ी चुनौती का लगातार सामना करना होगा। टीएमटी उसके सामने लगातार चुनौती खड़ी करती रहेगी। पश्चिम बंगाल की राजनीति वह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक अत्यंत जटिल और चुनौतीपूर्ण अध्याय है। यह केवल सत्ता के हस्तांतरण का मामला नहीं है, बल्कि एक गहरी जड़ें जमा चुके राजनीतिक तंत्र को उखाड़कर नया तंत्र स्थापित करने की प्रक्रिया है। बूथ लेबिल तक अपना नेटवर्क बनाना है। जड़ तक पंहुचे भ्रष्टाचार को खत्म कर यहां विकास के रास्ते खोलना एक बड़ी चुनौती होगी। भर्ती घोटालों के लिए बदनाम बंगाल को गंगा सागर के जल से पवित्र करना होगा। इस सबके  लिए उसे कड़ी मेहनत करनी होगी।

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बंगाल की राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता इसका कैडर-आधारित ढांचा है। पहले यह केडर बेस ढांचा पहले वामपंथियों के पास था। इसे  ममता बनर्जी ने एक लंबे और हिंसक संघर्ष के बाद अपने पाले में किया। आज टीएमसी का संगठन केवल एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि एक सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा तंत्र बन चुका है। ग्रामीण इलाकों में एक साधारण ग्रामीण के लिए टीएमसी का स्थानीय नेता ही कानून है, वही रोजगार दिलाने वाला है। वही सामाजिक विवादों का निपटारा करने वाला 'दादा' है। भाजपा के लिए सबसे पहली और बड़ी बाधा इसी 'बूथ-स्तर' के संगठन को तोड़ना है। भाजपा ने पिछले कुछ वर्षों में बंगाल में अपना आधार तो बढ़ाया है, लेकिन उसका ढांचा अभी भी कई जगहों पर 'ऊपर से नीचे' की ओर है। टीएमसी की जगह लेने के लिए भाजपा को ऐसे कार्यकर्ताओं की फौज खड़ी करनी होगी जो केवल चुनाव के समय सक्रिय न हों, बल्कि साल के 365 दिन जनता के सुख-दुख में साथ खड़े रहें।

टीएमसी की दादागिरी और गुंडागर्दी बंगाल की राजनीतिक संस्कृति का एक दुखद हिस्सा बन चुकी है। यहाँ 'मसल पावर' और 'मनी पावर' का ऐसा गठजोड़ है जो विपक्षी कार्यकर्ताओं को पनपने नहीं देता। भाजपा यदि सरकार बना भी लेती है, तो उसे एक ऐसी पुलिस व्यवस्था और प्रशासन को पुनर्जीवित करना होगा जो दशकों से राजनीतिक इशारों पर नाचने का आदी हो चुका है। टीएमसी के कार्यकर्ता जो स्थानीय स्तर पर ठेकेदारी, सिंडिकेट और वसूली के तंत्र से जुड़े हैं, वे आसानी से अपनी जमीन नहीं छोड़ेंगे। भाजपा को यहाँ 'कानून के राज' को बहाल करने के लिए कठोर कदम उठाने होंगे। साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि वह स्वयं उसी हिंसा के चक्र में न फंस जाए। जनता को यह विश्वास दिलाना होगा कि भाजपा की सरकार में किसी भी व्यक्ति को अपनी राजनीतिक विचारधारा के कारण जान का जोखिम नहीं उठाना पड़ेगा।

विश्वास बहाली की इस प्रक्रिया में 'अस्मिता' और 'विकास' का संतुलन सबसे महत्वपूर्ण है। टीएमसी ने हमेशा भाजपा को 'बाहरी' (बोहिरागोतो) दल के रूप में चित्रित किया है। इस नैरेटिव को काटने के लिए भाजपा को बंगाली संस्कृति, भाषा और परंपराओं के प्रति अपनी निष्ठा को और अधिक प्रखरता से साबित करना होगा। केवल जय श्री राम के नारे से बंगाल नहीं जीता जा सकता। यहाँ के लोगों के मन में महाप्रभु चैतन्य, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद और रबींद्रनाथ टैगोर के प्रति जो अगाध श्रद्धा है। सुभाष चंद्र बोस उनके आदर्श हैं। इन सब को उन्हें  अपने राजनीतिक विमर्श का केंद्र बनाना होगा। जब तक बंगाल का सामान्य नागरिक यह महसूस नहीं करेगा कि भाजपा उसकी संस्कृति की संरक्षक है, तब तक पूर्ण विश्वास हासिल करना असंभव है।

घुंसपेठियों के लिए महफूज पश्चिमी बंगाल से बाहरी देशों के अवैध प्रवासियों को रोकना भी एक चुनौती होगी। हालांकि चुनाव आयोग की सख्ती और बंगाल में केंद्रीय बलों की तैनाती से इस अवैध घुसपैंठियों के हौसले काफी कमजोर हैं। इन्हें पूरी तरह तोड़ना होगा। अच्छा यह है कि कभी सत्ताकाकेंद्र बिदूं रही माकपा अब पूरी तरह हाशिंए पर चली गई  वरन कभी  उसकी पश्चिमी बंगाल में वही हालत थी तो वहां आज टीएमसी की हैं।

आर्थिक मोर्चे पर बंगाल आज एक बड़े संकट से गुजर रहा है। उद्योगों का पलायन और युवाओं का रोजगार के लिए दूसरे राज्यों की ओर रुख करना एक कड़वी सच्चाई है। भाजपा को 'सोनार बांग्ला' के सपने को हकीकत में बदलने के लिए एक स्पष्ट रोडमैप देना होगा। सिंडिकेट राज को खत्म करना केवल पुलिसिया कार्रवाई से संभव नहीं है, इसके लिए वैकल्पिक रोजगार के अवसर पैदा करने होंगे। यदि भाजपा बंगाल में बड़े निवेश लाने में सफल रहती है और आईटी से लेकर विनिर्माण क्षेत्र तक में नौकरियां पैदा करती है, तो टीएमसी का कैडर जो आज केवल मजबूरी या लालच में सत्ता से चिपका है, वह धीरे-धीरे बिखरने लगेगा।

भाजपा के लिए एक और बड़ी चुनौती राज्य के जनसांख्यिकीय समीकरण हैं। बंगाल की राजनीति में ध्रुवीकरण एक सच्चाई है, लेकिन एक स्थिर सरकार चलाने के लिए उसे समाज के सभी वर्गों का विश्वास जीतना होगा। टीएमसी का आधार केवल गुंडागर्दी नहीं, बल्कि उनकी विभिन्न कल्याणकारी योजनाएं भी हैं, जैसे 'लक्ष्मी भंडार' या 'कन्याश्री'। इन योजनाओं ने महिलाओं के एक बड़े वर्ग को ममता बनर्जी के साथ जोड़ा है। भाजपा को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह न केवल इन योजनाओं का बेहतर विकल्प दे, बल्कि प्रशासन में पारदर्शिता लाकर भ्रष्टाचार को पूरी तरह समाप्त करे।

पश्चिम बंगाल में भाजपा की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह टीएमसी के 'भय के तंत्र' को 'भरोसे के तंत्र' में कितनी जल्दी बदल पाती है। संगठन बनाना ईंट-पत्थर जोड़ने जैसा नहीं है, बल्कि यह लोगों के दिलों में जगह बनाने जैसा है। टीएमसी के घर पर कब्जा करने का मतलब उनके कार्यालयों पर झंडा फहराना नहीं है, बल्कि उस आम बंगाली के मन से डर निकालना है जो आज अपनी राय जाहिर करने से कतराता है। भाजपा को एक ऐसी समावेशी राजनीति का परिचय देना होगा जहाँ विकास का लाभ कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे, बिना किसी कट-मनी या राजनीतिक भेदभाव के। यदि भाजपा इस परीक्षा में सफल होती है, तभी वह बंगाल में एक स्थायी और सार्थक परिवर्तन ला पाएगी, अन्यथा सत्ता का परिवर्तन केवल चेहरों का बदलाव बनकर रह जाएगा, व्यवस्था का नहीं। बंगाल की मिट्टी को शांति और प्रगति की प्यास है, और जो दल इस प्यास को बुझाएगा, वही सही मायने में बंगाल का भाग्य विधाता बनेगा।

- अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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