पुल, बाढ़ और इंसान (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Sep 02, 2024

अब चाहे पुल स्वत गिर जाने का कार्यक्रम अगले साल प्रायोजित होना हो लेकिन पुल, बाढ़ और इंसान का रिश्ता अटूट है। पुल का कर्तव्य है विकास का हिस्सा बनना, बाढ़ का कर्तव्य है किसी भी तरह पुल को नुकसान पहुंचाना और इंसान रुपी पत्थर का कर्तव्य है देखते रह जाना । हमारे देश के पुल गिरू राज्य में कई पुल अभी भी निर्माणाधीन हैं। फोरलेन सड़क पर पुल बनाना हो तो समय लगता है। बड़ा, लंबा और बढ़िया पुल बनाने में ज्यादा समय लगता है। अगर बजट मिलता रहे तो पुल बनता रहता है और निरंतर बनता रहे तो एक न एक दिन पूरा होने के आसार भी बने रहते हैं। 

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पड़ोसी गांव के बच्चे और बड़े, अचरज से इस महान पुल को दिन रात देखते होंगे। उन्हें आशंका तो लग रही होगी कहीं चौथी बार न गिर जाए। इस बीच प्रशासन ने संतुष्टि भरा बयान दिया, चाहे पुल तीन बार गिर गया लेकिन कोई इंसान हताहत नहीं हुआ यह सकारात्मक स्थिति है। आम लोग कभी संतुष्ट नहीं होते, उन्हें अभी तक पता नहीं चला कि निष्पक्ष जांच करना और करवाना बहुत मश्किल होती है। छोटे मोटे नेता तो आरोप लगाते रहते हैं लेकिन अब यह परवाह करने की बात नहीं रह गई है। वैसे भी पुल गिरू राज्य में कुछ दिन बाद पुल गिरने की खबर सुनने की रिवायत बन गई है। उधर कुछ लोग खुश हैं कि पुल खुद ही तीसरी बार गिर गया है। गलत ढंग से बने पुल को गिराने का काम इंसान करने लगते तो कितना समय और पैसा पानी की तरह बहाना पड़ता।  

इस खास मामले में हमें बाढ़ का शुक्रगुजार होना चाहिए कि लोगों की जानें बच गई जो आराम जा भी सकती थी। बताते हैं पुल पर ज़्यादा नहीं 1700 करोड़ खर्च हो चुके हैं लेकिन पुल तीन बार गिर जाने के बाद भी काफी  करोड़ रूपए बच गए और एक भी इंसान नहीं मरा यह सकारात्मक परिणाम है। इससे पुल, बाढ़ और इंसान खुश हैं और उनका अटूट रिश्ता सलामत है। 

- संतोष उत्सुक

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