Brexit के 10वें साल में ब्रिटेन को 7वां झटका! लेबर पार्टी के 'चाणक्य' कीर स्टार्मर खुद अपनी ही बिछाई बिसात में कैसे मात खा गए?

By अभिनय आकाश | Jun 23, 2026

आखिरकार सभी अटकलों पर विराम लगाते हुए ब्रिटेन के 63 साल के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने इस्तीफे का ऐलान कर दिया। उन्होंने सत्ताधारी लेबर पार्टी का नेता पद भी छोड़ने की घोषणा की। इसके साथ ही स्टार्मर 10 साल में ऐसे छठे प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने कार्यकाल पूरा होने से पहले पद छोड़ा है। आधिकारिक निवास 10 डाउनिंग स्ट्रीट से स्टार्मर ने कहा कि मेरी लेबर पार्टी को नहीं लगता कि मैं अगले चुनाव में अगुआई करने के लिए सही व्यक्ति हूं। मेरे लिए देश पहले है और मैंने देश हित में इस्तीफे का यह फैसला लिया है। भावुक भाषण में स्टार्मर ने कहा कि दो साल पहले पीएम का पद संभालना सबसे गर्व का पल था। 14 वर्षों बाद देश में लेबर पार्टी की सरकार सत्ता में आई। लेकिन यहां तक पहुंचने का सफर आसान नहीं था। भावी पीएम को पूरा सपोर्ट करूंगा। 2024 में स्टार्मर ने लेबर पार्टी को बंपर जीत दिलाई थी। अब उनका इस्तीफा ऐसे समय आया है, जब लेबर पार्टी में उनके नेतृत्व को लेकर असंतोष बढ़ रहा था। पार्टी के 100 से ज्यादा सांसदों ने अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था।

शुरुआती 100 दिन

उनकी सरकार के शुरुआती 100 दिनों में ही जिन्हें अक्सर नए नेताओं के लिए 'हनीमून पीरियड' माना जाता है स्टार्मर की मुश्किलें शुरू हो गईं। उन पर और उनके कैबिनेट के अन्य मंत्रियों पर हज़ारों पाउंड कीमत के फ़ुटबॉल मैच और कॉन्सर्ट के टिकट और तोहफ़े लेने के आरोप लगे। फ्रीबीज़ गेट (मुफ़्त तोहफ़ों का मामला) कहे जाने वाले इस विवाद के कारण स्टारमर को जनता की भारी नाराज़गी का सामना करना पड़ा, जिससे उनकी लोकप्रियता रेटिंग गिर गई। हालाँकि उन्होंने तोहफ़ों और टिकटों का खर्च वापस कर दिया और चंदे के लिए कड़े नियम लागू किए, लेकिन तब तक काफ़ी नुकसान हो चुका था। पद संभालने के दो महीने के भीतर ही, 43% वोटर उन्हें एक बुरा प्रधानमंत्री मानने लगे थे। 15 जून, 2026 तक यह आँकड़ा बढ़कर 73% हो गया। लगभग 1 करोड़ पेंशनभोगियों के लिए सर्दियों में ईंधन पर मिलने वाली सब्सिडी में कटौती करके नेशनल हेल्थ सर्विस को मज़बूत करने की उनकी कोशिशें, सज़ा पूरी होने से पहले 1,700 कैदियों को रिहा करने का फ़ैसला, चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ के तौर पर सू ग्रे को बहुत ज़्यादा पैसे देने से जुड़ा विवाद और अगले फाइनेंशियल ईयर के लिए लगभग 8 अरब डॉलर की खर्च में कटौती का वादा—इन सभी बातों को जनता और पार्टी के सदस्यों ने पसंद नहीं किया। एक और बात जिसकी वजह से उनकी अपनी पार्टी के सांसदों के साथ उनका टकराव हुआ, वह थी "दो-बच्चों तक ही बेनिफ़िट की सीमा" वाली नीति को जारी रखने का उनका फ़ैसला। यह नीति 2017 में कंज़र्वेटिव पार्टी ने शुरू की थी और तब से लेबर पार्टी इसका ज़ोरदार विरोध करती आ रही थी। इस विवादित नीति का मकसद माता-पिता को मिलने वाली चाइल्ड सपोर्ट (यूनिवर्सल क्रेडिट या चाइल्ड टैक्स क्रेडिट के तौर पर) को सिर्फ़ पहले दो बच्चों तक सीमित करना था। ब्रिटेन में यह नीति बहुत अलोकप्रिय थी और स्टारमर ने इसे इसी साल अप्रैल में खत्म किया।

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क्या 17 जुलाई तक मिलेगा नया पीएम ?

कीर स्टार्मर ने कहा कि लेबर पार्टी का नया नेता और पीएम चुने जाने तक मै पद पर बना रहूंगा। लेबर पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारी समिति (NEC) नए नेता के चुनाव का कार्यक्रम तय करेगी, 9 जुलाई से नामाकन प्रक्रिया शुरू होगी और 17 जुलाई से पहले नए नेता का चुनाव करने की कोशिश होगी। अगर पार्टी किसी एक उम्मीदवार पर सहमत होती है तो नया पीएम जुलाई मध्य तक पद संभाल सकता है। अगर एक से ज्यादा उम्मीदवार हुए तो चुनाव होगा। तब 1 सितंबर से पहले नेता चुन लिया जाएगा।

ब्रेक्जिट का चक्रव्यूह: 10 साल बाद कहाँ खड़ा है ब्रिटेन?

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री की कुर्सी से स्टार्मर का इस्तीफा ठीक उस मोड़ पर आया है, जब पूरा देश यूरोपीय संघ (ईयू) से अलग होने यानी ब्रेक्जिट के ऐतिहासिक फैसले की दसवीं वर्षगांठ मनाने जा रहा है। लेकिन एक दशक बीत जाने के बाद, आज ब्रेक्जिट को लेकर ब्रिटेन की जनता का मूड पूरी तरह बदल चुका है। दस साल पहले, ब्रेक्जिट समर्थकों ने मुख्य रूप से तीन बड़े मुद्दों पर ईयू से अलग होने के लिए वोट किया था—संप्रभुता, प्रवासियों पर नियंत्रण और आर्थिक समृद्धि। लेकिन एक दशक लंबा वक्त गुजरने के बाद भी ब्रिटेन आज भी संघर्ष की आग में झुलस रहा है। ब्रिटिश सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 2 से 8 प्रतिशत तक की गिरावट का अनुमान है। घटता राजस्व, रिकॉर्ड कर्ज, टैक्स में भारी बढ़ोतरी और कमरतोड़ महंगाई। गैर-ईयू प्रवासियों को रोकने के मामले में सरकार को करारी नाकामी हाथ लगी है। कस्टम्स की पेचीदगियों और कागजी कार्रवाई ने स्थानीय बिजनेसेज का दम घोंट दिया है। यही वजह है कि आज कम से कम 57% ब्रिटिश नागरिक खुले तौर पर यह मानते हैं कि यूरोपीय संघ को छोड़ने का उनका फैसला एक बहुत बड़ी भूल थी। भले ही लेबर पार्टी ने शुरुआत में ब्रेक्जिट जनमत संग्रह का विरोध किया था और वह यूरोपीय संघ में बने रहने के पक्ष में थी, लेकिन सत्ता में आने के बाद स्टार्मर की रणनीति बिल्कुल अलग थी। वह ईयू में दोबारा शामिल हुए बिना 'यूके-ईयू रीसेट' यानी केवल रिश्तों को सुधारना चाहते थे। राजनीतिक रूप से उनके पास हाथ-पैर मारने की ज्यादा जगह नहीं थी, खासकर ऐसे समय में जब कोरोना महामारी, यूक्रेन युद्ध और ईरान संकट ने पहले से ही कराह रही ब्रिटिश अर्थव्यवस्था को आईसीयू (ICयू) में धकेल दिया। ब्रेक्जिट के पूरे 10 साल बाद भी, दोनों पक्षों के बीच व्यापार, कृषि निर्यात, युवाओं की आवाजाही, बॉर्डर कंट्रोल और ब्रिटिश सामानों पर लगने वाली गैर-टैरिफ पाबंदियों जैसे पेचीदा सवाल आज भी जस के तस बने हुए हैं। यही वो कांटे हैं जो 'यूके-ईयू रीसेट' की राह में सबसे बड़ा रोड़ा साबित हो रहे हैं।

विदेश में कामयाबियाँ, देश में मुश्किलें

घरेलू मोर्चे पर उनकी नाकामियाँ इतनी बड़ी थीं कि विदेश नीति में मिली कामयाबियाँ उनकी भरपाई नहीं कर सकीं। विदेश नीति में उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ अच्छे संबंध बनाए (कम से कम फरवरी 2026 में ईरान युद्ध शुरू होने तक), अपने यूरोपीय समकक्षों की तुलना में टैरिफ़ का बहुत फ़ायदेमंद समझौता किया, भारत के साथ एक बड़ा व्यापार समझौता किया और EU के साथ संबंधों को नए सिरे से बेहतर बनाने की अच्छी शुरुआत की। हालांकि उनकी शुरुआत पहले से ही कमज़ोर आधार से हुई थी, लेकिन "बदलाव" का उनका वादा कभी पूरा नहीं हो सका। उनके कार्यकाल में बार-बार इस्तीफ़े, काम में कमियां, नीतियों में अचानक बदलाव, पार्टी के अंदर झगड़े और नेतृत्व को लेकर खींचतान जैसी बातें देखने को मिलीं। वह एक ऐसा ठोस नीतिगत एजेंडा लागू करने में संघर्ष करते रहे जो गैर-EU देशों से बढ़ते आप्रवासन को नियंत्रित कर सके, ब्रिटेन के चरमराते स्वास्थ्य क्षेत्र को बेहतर बना सके और दक्षिणपंथी अतिवाद के उभार को रोक सके।

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