कैंडी क्रश की फूटी किस्मत (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | Jul 06, 2022

सुनसान पड़े जूम की भेंट एक दिन आभासी दुनिया के सिरताज कैंडी क्रश से हो गई। दोनों ने पहले फोर जी, फाई जी का रोना रोया और फिर एक-दूसरे की आँखें पोंछी। बातचीत का क्रम आगे बढ़ा। 

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कैंडी क्रशः भैया बात तो सही है। लेकिन बच्चे तो बच्चे हैं! जो तुम्हारी गोद में रहकर नहीं सुधरे वे खाक मुझसे सुधरेंगे। इनकी शैतानियों से तंग आ गया हूँ। 

जूमः ऐसा न कहो भाई। दुनिया में बच्चे ही बचे हैं जो दुनियादारी से दूर हैं। दुनियादारी इंसान से पहले उसकी मासूमियत छीनता है बदले में धूर्तता, झूठ बोलने के नुस्खे और रिश्तों से दूर रहने का हुनर सिखाता है।

कैंडी क्रशः फिर भी भैया इन बच्चों से मैं तंग आ गया हूँ। मैं रंग-बिरंगी कैंडियों का ऐसा क्रश हूँ, जो सबके सिर पर चढ़कर बोलता हूँ। किंतु इन उत्पाती, उपद्रवी और शरारती बच्चों ने मेरा मजाक बनाकर रख दिया है। कभी मुझे आधा-अधूरा खेलकर बिस्तर के नीचे छिपा देते हैं, कभी बाथरूम में ले जाकर मुझे खेलना छोड़कर सब काम करते हैं। चलो माना कि ऐसा घर के सदस्यों के भय से कर रहे हैं, लेकिन जब घर में कोई नहीं होता तो वे कुछ और करते हैं। बैटरी लाख ड्रेन हो जाए, आँखें खराब हो जाए, कानों पर जूँ तक नहीं रेंगता। 

जूमः बस इतनी सी बात के लिए बच्चों से चिढ़ गए। उछलने-कूदने, उत्पात मचाने का दूसरा नाम ही तो बच्चे हैं। ये नहीं उत्पात मचायेंगे तो हम-तुम उत्पात मचायेंगे! मैं तो बच्चों की कमी के चलते कमजोर हो गई हूँ। दिखने में तो सॉफ्टवेयर हूँ लेकिन मेरे भीतर बच्चों का दिल धडकता है। उनके न रहने से मुझे घुटन सी हो रही है। मेरे बच्चों से मिले अरसा हो गया। वे तो हमेशा ऑनलाइन खेलों में लगे रहते हैं। विशेषकर तुम से। ऑनलाइन क्लास के प्लाटफार्म से बच्चे काफूर हो गए हैं।

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कैंडी क्रशः बस भी करो भैया! आप इन्हें ठीक से नहीं जानते। ये जानबूझकर मुझे छोड़कर गंगी-गंदी साइटें देखते हैं। कभी चादर ओढ़कर तो कभी छज्जे पर जाकर चोरी-चोरी चुपके-चुपके अनाप-शनाप देखते हैं। पढ़ने का नाटक करते हैं। मुझे छोड़कर न जाने दिमाग खराब खेल खेलते हैं। मेरे नाम पर रिसेंट एप्स खोलकर दुनिया भर के गेम खेलते हैं, वीडियो देखते हैं। मटरगस्ती करते हैं।

जूमः कैंडी भैया आप भी...! आपको क्या लगता है कि बच्चे मेरे यहाँ ऐसा नहीं करते? यहाँ पर भी वे हमारे नाम पर कुछ और करते हैं। कुछ पूछो तो ऑनलाइन दोस्त इशारों-इशारों में बहुत कुछ गलत करने के लिए प्रेरित करते हैं।। आँखें मिचियाते हैं। पढ़ाई के नाम पर शैतानी करते हैं। चुपके-चुपके बातें करते हैं। एक-दूसरे को गंदी-गंदी तस्वीरे-वीडियो भेजते हैं। इसी की तो जूम कहते हैं। जूम में बच्चों की आवाज़ें अब नहीं गूँजती हैं। उनकी गूँज की कमी से जूम की झूम खत्म हो गई है। सॉफ्टवेयर के नाम पर एकदम सॉफ्ट पड़ गया हूँ।

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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