गन्ना किसानों को मोदी सरकार की ओर से दिये गये तोहफे का गणित समझिये

By अजय कुमार | Aug 30, 2019

उत्तर प्रदेश के गन्ना किसान मोदी सरकार के उस फैसले के बाद फूले नहीं समा रहे हैं जिसके तहत केन्द्र सरकार ने गन्ना किसानों को तोहफे के रूप में 60 लाख मीट्रिक टन चीनी निर्यात पर सब्सिडी का ऐलान किया है। सब्सिडी सीधे किसानों के खाते में आएगी। मोदी सरकार के इस फैसले से उत्तर प्रदेश के 233.25 लाख गन्ना किसानों को सब्सिडी का फायदा मिलेगा। जल्द ही होने वाले चार राज्यों के विधान सभा और कुछ विधान सभा सीटों के लिए उप−चुनाव से पूर्व गन्ना किसानों को चीनी निर्यात पर सब्सिडी देने के फैसले को मोदी सरकार का मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा है।

 

मोदी सरकार ने 60 लाख मीट्रिक टन चीनी के निर्यात पर 6 हजार 268 करोड़ रुपये की सब्सिडी को मंजूरी दी है। बता दें कि गन्ना किसान समय−समय पर अपनी समस्याएं सरकार के सामने रखते रहे हैं। जिसके बाद सरकार ने गन्ना किसानों को राहत देते हुए सब्सिडी का फैसला किया है। केन्द्र सरकार के इस फैसले का उत्तर प्रदेश सहित महाराष्ट्र और कर्नाटक के लाखों गन्ना किसानों को लाभ मिलेगा। चालू वित्तीय वर्ष 2018−19 में भी सरकार ने 50 लाख टन चीनी के निर्यात के लिए सब्सिडी दी है।

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गौरतलब है कि भारत के पास कुल 162 लाख टन चीनी का स्टॉक है, जिसमें से 40 लाख टन चीनी बफर स्टॉक में है और 60 लाख टन चीनी का निर्यात किया जाएगा। चीनी निर्यात पर मिलने वाली सब्सिडी किसानों को उनके अतिरिक्त स्टॉक को कम करने में मदद करेगी। इतना ही नहीं चीनी निर्यात पर मिलने वाली इस सब्सिडी को सीधे किसानों के खाते में जमा किया जाएगा, जिससे उन्हें फायदा होगा।

 

निजी चीनी मिलों के संगठन इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन ¼ISMA½ के महानिदेशक के मुताबिक सरकार द्वारा एक्सपोर्ट सब्सिडी की घोषणा से न सिर्फ चीनी के भंडार में कमी आएगी बल्कि इससे सब्सिडी समेत तकरीबन 18,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त नकदी प्रवाह बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि इससे मिलों को लागत और ब्याज का बोझ कम करने में मदद मिलेगी और वे किसानों को समय पर गन्ने के दाम का भुगतान कर पाएंगे। उन्होंने कहा कि अगले साल दुनियाभर में चीनी की सप्लाई में करीब 40 लाख टन की कमी आने की उम्मीद है और भारत सरकार द्वारा डब्ल्यूटीओ के प्रावधानों के अनुरूप 10,448 रुपये प्रति टन की दर से निर्यात सब्सिडी की घोषणा समय पर किए जाने से भारतीय चीनी मिलें 60 लाख टन चीनी का निर्यात करने में सक्षम होंगी।

 

बताते चलें कि वर्ष 2014−15 के आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में लगभग 165.98 लाख हैक्टेयर (68.7 प्रतिशत) क्षेत्र में खेती की जाती है। कृषि गणना वर्ष 2010−11 के अनुसार उत्तर प्रदेश में 233.25 लाख कृषक हैं। उत्तर प्रदेश में गन्ने की फसल 2.17 लाख हेक्टेयर के क्षेत्र में बोई जाती है, जोकि पूरे देश में होने वाली गन्ने की खेती का 43.79 प्रतिशत है। प्रदेश में कुल 119 चीनी मिलें चल रही हैं। इनमें से 94 प्राइवेट चीनी मिले हैं। निजी चीनी मिलों का प्रभुत्व बहुत ज्यादा होने के कारण यह लोग मनमानी भी खूब करते हैं।

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एक समय था जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बाद सबसे ज्यादा गन्ना उत्पादन पूर्वांचल में होता था, लेकिन गन्ने का सही समय पर भुगतान न मिलने पर किसानों ने गन्ने की खेती कम कर दी है, चीनी का कटोरा कहे जाने वाले पूर्वांचल के कई जिलों की मिट्टी गन्ने की खेती के लिए एकदम सही है, तभी तो यहां पर कई चीनी मिलें भी लगाई गईं थीं। ये चीनी मिलें किसानों का गन्ना लेती थीं, उन्हें समय पर पैसे देती थीं और किसान आगे की फसल की तैयारी करता था। यह क्रम करीब पचास दशक तक बना रहा।

 

गन्ने का सियासी कनेक्शन

 

2019 के लोकसभा चुनाव के सयम उत्तर प्रदेश में किसान नेताओं और विपक्ष ने भले ही गन्ना भुगतान को मुद्दा बनाया लेकिन सत्ता पक्ष ने गन्ना किसानों को कई वर्षों का भुगतान कर उनके मतों को जीत लिया। नतीजा यह रहा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ना उत्पादक क्षेत्रों की करीब 28 सीटों और पूर्वी उत्तर प्रदेश में गन्ना उत्पादन वाली कुल 8 से 9 सीटों पर भाजपा का वर्चस्व बना रहा। पश्चिमी यूपी में कुल 28 सीटें ऐसी थीं, जिन पर गन्ना किसानों का मत सीट की हार−जीत को प्रभावित करता है। चुनाव के वक्त पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रधानमंत्री ने किसानों के 1,000 करोड़ रुपए बकाया भुगतान का वादा किया था। वहीं, राज्य सरकार ने इसका आधा भुगतान 5 अप्रैल, 2019 तक गन्ना किसानों को कर दिया था। इतना ही नहीं पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर−बस्ती मंडल में कुल 7 से 8 जिले हैं, जहां चुनावों के दौरान गन्ना किसानों को रिझाने के लिए ट्रॉयल के तौर पर वर्षों से बंद पड़ी दो निगम की चीनी मिलों को खोल भी दिया गया।

 

-अजय कुमार

 

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