Yes Milord: केंद्र सरकार,चुनाव आयोग और दिल्ली पुलिस...सबको एक लाइन से नोटिस, सुप्रीम कोर्ट ने किसी को भी नहीं बख्शा

By अभिनय आकाश | Oct 17, 2026

दिल्ली की सड़कों पर 10 अक्तूबर को हुआ प्रदर्शन सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने राजधानी को छावनी में तब्दील करने, इंटरनेट और मेट्रो बंद करने और पत्रकारों व प्रदर्शनकारियों के ताबड़तोड़ डिटेंशन जैसे गंभीर सवाल खड़े कर दिए। अब 15 अक्तूबर को इसी पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सीधे दखल देते हुए केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और दिल्ली पुलिस को एक साथ नोटिस जारी कर दिया है। अदालत जानना चाहती है कि धारा 163 का चाबुक क्यों चला और क्या विरोध की आवाज दबाने के लिए नियमों की सीमाएं लांघी गईं? जानिए इस पूरे मामले का सच और सुप्रीम कोर्ट के उन नोटिसों की पूरी इनसाइड स्टोरी।

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राहुल, खरगे समेत कई विपक्षी नेता याचिकाकर्ता


इसमें एक रिट पिटीशन राहुल गांधी समेत इंडिया ब्लॉक के नेताओं ने भी दाखिल की थी। याचिका दाखिल करने वालों में राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे आदि शामिल है। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से जुड़ी अन्य याचिकाओं पर भी नोटिस जारी किए। इनमें असदुद्दीन ओवैसी की याचिका भी शामिल है। अदालत ने जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर भी विचार करने की सहमति दी।  याचिका में एसआईआर के दौरान मतदाताओं के नाम बड़े पैमाने पर हटाए जाने और चुनाव आयोग की प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं का आरोप लगाया गया था। वहीं जंतर मंतर को प्रोटेस्ट साइट से हटाने पर दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की सहमति जताई थी। इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा कि क्या यह फैसला कोर्ट की कुछ मौखिक टिप्पणियों की वजह से लिया गया था या फिर इसे एक आम प्रदर्शन स्थल के रूप में इस्तेमाल करने की उपयोगिता पर विचार करने के बाद लिया गया था। एसजी मेहता ने कोर्ट को बताया कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस निर्णय का आधार नहीं है। इस मसले पर कमेटी का गठन बहुत पहले ही कर दिया गया था। कमेटी ने एक विस्तृत रिपोर्ट भी दी है। 

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जंतर मंतर को प्रोटेस्ट साइट की लिस्ट से हटा दिया गया


वहीं याचिकाकर्ता और वकील स्वाति मलिक की ओर से पेश होते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश और सीनियर वकील मुक्ता गुप्ता ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व फैसले के अनुसार विरोध प्रदर्शन स्थल ऐसी जगहें होनी चाहिए जहां प्रदर्शनकारियों की बात सत्ता में बैठे लोगों तक पहुंच सके। दरअसल 12 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस ने एक नोटिस के जरिए जंतर मंतर को प्रोटेस्ट साइट की लिस्ट से हटा दिया था। इस फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सरकार के अपने हलफनामों में कहा गया था कि यह कदम 9 अक्टूबर के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के परिणाम स्वरूप उठाया गया था। जब याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने इस पर आपत्ति जताई तो जस्टिस जयमालो बाची ने कहा कि कोर्ट को यह जांचने की आवश्यकता है कि क्या मौखिक टिप्पणियों को कानून के रूप में माना जा सकता है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने विरोध प्रदर्शनों के दौरान महिला पत्रकारों के साथ कथित मारपीट और दुर्व्यवहार के मामलों पर भी सख्त रुख अपनाया। अदालत ने संकेत दिया कि इन आरोपों की सुनवाई और जांच के लिए एक समिति गठित की जा सकती है। सीजेआई ने सीनियर वकील इंदिरा जय सिंह से दो सीलबंद लिफाफों में दस्तावेज जमा करने को कहा है। पहले लिफाफे में उन महिला पत्रकारों के नाम देने होंगे जिन्होंने पुलिस पर हमले या दुर्व्यवहार के आरोप लगाए हैं। दूसरे लिफाफे में उन सेवानिवृत्त महिला न्यायाधीशों और पुलिस अधिकारियों के नाम मांगे गए हैं जिन्हें संभावित जांच समिति में शामिल किया जा सकता है।

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सुप्रीम कोर्ट तक मार्च को लेकर भी नोटिस


एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी से जुड़ी याचिका भी एसआईआर से संबंधित है। इस पर भी नोटिस जारी हुआ और इसे दूसरे लंबित मामलों के साथ जोड़ने को कहा गया। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि नोटिस जारी होने का मतलब यह नहीं है कि कोर्ट ने याचिकाकर्ता के आरोप सही मान लिए हैं। अभी संबंधित पक्षों के जवाब आने हैं और उसके बाद ही फैसला दिया जाएगा। इसके अलावा दिल्ली में हुए प्रोटेस्ट के बाद राहुल गांधी, अखिलेश यादव और दूसरे नेताओं के सुप्रीम कोर्ट तक मार्च से जुड़ा मामला भी सामने आया। इस मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका पर दबाव बनाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। इस मामले में भी संबंधित पक्षों से जवाब मांगा गया है। 

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