सत्ता की कुर्सी, जनता की फ़ाइल (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | Aug 13, 2025

पुराने समय की बात नहीं है, बल्कि उस समय की है जब ‘समय’ फ़ोन पर नहीं, सरकारी कार्यालयों की घड़ियों में अटका पड़ा था। यह कहानी है राम-राज्य-नगर के पंचायत भवन की, जो किसी कबाड़खाने से कम नहीं था। जहाँ की दीवारों पर लगे जालें खुद को ऐतिहासिक मानती थीं, और कोने में बैठा बूढ़ा, लठमार, और ज़िद्दी इंसान, श्री ज्ञानप्रकाश उपाध्याय, खुद को इतिहास का रक्षक मानता था। ज्ञानप्रकाश की कुर्सी नहीं थी, बल्कि एक टूटा हुआ तख़्त था, जिस पर वो ऐसे विराजमान थे, जैसे कोई राजा अपनी प्रजा को देखता हो। उनकी दाढ़ी का एक-एक बाल इस तरह उनके पेट में जा समाया था, जैसे किसी सरकारी योजना का पैसा। उनके लिए विकास का मतलब था 'विकास' शब्द को अपनी फ़ाइल पर लिखना, और फिर उस पर बैठकर कुंडली मार लेना। “अरे ओए! ज़रा सुन, आज के नौजवानों,” वे अपनी खाँसती हुई आवाज़ में कहते, “हमारे जमाने में तो हम फ़ाइल को खुद लाते थे, उसे खुद ही ले जाते थे, और तब भी 25 साल बाद रिटायर होते थे। और तुम हो कि एक फ़ाइल के लिए दिन-रात मिमियाते रहते हो।” उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जो सिर्फ़ किसी युवा की उम्मीद को तोड़ कर ही पैदा होती थी। उनकी मेज पर धूल की मोटी चादर थी, जिस पर 'सौर-ऊर्जा सिंचाई योजना' नाम की एक फ़ाइल रखी थी। वो उस पर इस तरह आसन जमाए बैठे थे, मानो किसी पुराने, बुज़ुर्ग ने किसी ख़जाने को छिपा रखा हो। उन्हें उस योजना की न तो ज़रूरत थी और न ही वे उसमें लिखी किसी बात को समझते थे। उन्हें तो बस उस फ़ाइल पर बैठकर अपनी सत्ता का प्रदर्शन करना था। “आज का युवा तो बस सोशल मीडिया पर ही क्रांति करता है, और यहाँ आ कर तो उसकी बोलती ही बंद हो जाती है,” वो अपनी पुरानी, धूल भरी लालटेन को साफ करते हुए कहते, जिसका शीशा उनकी सोच की तरह ही धुँधला था।

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एक दिन सुरेश ने हिम्मत की और सीधे ज्ञानप्रकाश के सामने जाकर बोला, “ज्ञानप्रकाश जी, हम सब इतने पढ़े-लिखे हैं। इंजीनियरिंग, एम.ए., और खेती की पूरी जानकारी भी रखते हैं। अगर ये ‘सौर-ऊर्जा योजना’ की फाइल आगे बढ़ जाए, तो हमारे गाँव की खेती में क्रांति आ सकती है।” सुरेश की बात सुनकर ज्ञानप्रकाश ने अपनी आधी खुली आँखें पूरी तरह खोलीं, जैसे कोई पुराना, ज़ंग लगा दरवाज़ा खुला हो। उनका चेहरा ऐसे भावों से भर गया मानो सुरेश ने उन्हें कोई राज़ बता दिया हो। “ओह! तो तुम सब पढ़े-लिखे हो? मुझे क्या मालूम? तुम तो बस यहाँ आकर टाइम पास करते हो। तुम्हारी शिक्षा का क्या फायदा? मेरी शिक्षा तो सिर्फ़ अक्षर ज्ञान की थी, पर मुझे तो सारे दुनियादारी के काम आते थे। तुम तो बस किताबी कीड़े हो,” वो कटाक्ष करते हुए कहते। “अब तुम क्या करोगे इस फाइल का? ये तो सरकार की फाइल है, इसका क्या करोगे?” वो इस तरह से पूछते मानो वो कोई निजी ज़मीन हो, जिसे उन्होंने अपने पुश्तैनी अधिकार से हासिल किया हो। उनके लिए वो फाइल सिर्फ एक ‘सिंबल’ था, उनकी ताकत का, उनके रुतबे का, उनके ‘होने’ का। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं था कि फाइल के अंदर क्या लिखा है, किस योजना के बारे में बताया गया है। उनके लिए तो बस इतना काफ़ी था कि वो फाइल उनके पास है और कोई और उसे नहीं पा सकता। उनकी आँखों में वही शैतानी चमक थी, जो किसी बच्चे की आँख में होती है जब वो अपनी गुल्लक को किसी से छुपाकर रखता है, भले ही उसमें एक भी पैसा न हो। ज्ञानप्रकाश के इस रवैये ने धीरे-धीरे उन युवकों के सपनों की गुल्लक को फोड़ दिया था, जिसमें सिर्फ़ हवा भरी थी, पर अब वो हवा भी बाहर निकल रही थी।

ज्ञानप्रकाश के इस अजीबोगरीब व्यवहार के पीछे कोई तर्क या कारण नहीं था। यह बस उनकी जीवन शैली का एक हिस्सा था। एक हिस्सा जो उन्हें हर बात पर ‘नहीं’ कहना सिखाता था। उन्हें इस बात से बड़ा सुकून मिलता था कि कोई उनकी बात सुन रहा है, कोई उनके आगे हाथ जोड़ रहा है। उनकी नजरों में वो युवा, जो उनसे अपनी रोजी-रोटी का रास्ता पूछ रहे थे, एक तरह से उनके जीवन के ‘साइड-हीरो’ थे। उन्हें यह पसंद था कि उनकी कहानी का ‘हीरो’ वही हैं, और बाकी सब 'फालतू' हैं। “ये फाइल तो मैं अपने पोते के लिए रख रहा हूँ,” उन्होंने एक दिन रमेश से कहा, जो हाल ही में एक नए मोबाइल फ़ोन के साथ आया था। “जब मेरा पोता बड़ा होगा, तो वो इस फ़ाइल को पढ़कर जानेगा कि हमारी सरकारें क्या-क्या योजनाएँ बनाती हैं।” असल में उनके पोते ने तो अभी तक दुनिया में आँख भी नहीं खोली थी। और वो इस बात को जानते थे। मगर उनका झूठ, उनके अहंकारी शब्दों को एक शक्ति देता था। वो अपनी काल्पनिक दुनिया में ही खुश थे। जहाँ वो राजा थे और बाकी सब उनकी प्रजा। वो एक ऐसे साम्राज्य के मालिक थे जहाँ ‘सर्कल ऑफ़ लाइफ’ नहीं था, बल्कि ‘सर्कल ऑफ़ रुतबा’ था। इस रुतबे को बनाए रखने के लिए वो किसी भी हद तक जा सकते थे। “क्यों चाहिए तुम्हें ये नौकरी? कोई काम-धाम करो, मजदूरी करो, खेती करो। ये सब फाइल-वाइन कुछ नहीं देती,” वो ज्ञान देते। वो भूल चुके थे कि उनके पोते भी एक दिन ऐसी ही फाइलों के लिए दर-दर भटकेंगे, और तब शायद कोई उनके जैसा ही ज्ञानप्रकाश उनके पोते को भी भटकाएगा। पर उन्हें यह बात समझनी नहीं थी, क्योंकि उन्हें तो बस अपनी सत्ता, अपने अहंकार और अपने ‘पेट में दाढ़ी’ का रुतबा पसंद था।

युवकों का धैर्य अब टूटने की कगार पर था। वे अब तक ज्ञानप्रकाश को मनाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपना चुके थे। किसी ने उनके पैर छुए, किसी ने उनकी तारीफ में कसीदे पढ़े, और किसी ने उन्हें शहर के 'सुपरस्टार' का खिताब दिया। लेकिन ज्ञानप्रकाश का अहंकार किसी पुराने पत्थर की तरह था, जिस पर कोई असर नहीं हो रहा था। उनकी बातें किसी 'पुरानी फिल्मों' की तरह थीं, जिनका कोई 'कनेक्शन' आज के दौर से नहीं था। “आप तो हमारे पिता समान हैं, ज्ञानप्रकाश जी,” महेश ने एक दिन उनकी चरण वंदना करते हुए कहा। “आप हमें आशीर्वाद दीजिए ताकि हम अपने पैरों पर खड़े हो सकें।” ज्ञानप्रकाश ने तुरंत उसे रोक दिया, “ये सब फ़िल्मी डायलॉग मुझसे मत मारो। हम ‘बाप’ नहीं, हम तो सरकार के नुमाइंदे हैं। और मैं तुम्हें आशीर्वाद नहीं, बल्कि ‘अधिकार’ दे रहा हूँ, ताकि तुम यहाँ आ-जा सको।” उनका यह कटाक्ष किसी तलवार की धार से कम नहीं था। उनकी हर बात में एक व्यंग्य होता था, एक मजाक होता था, जो सामने वाले की हँसी नहीं, आँसू निकाल देता था। “मैं तो सिर्फ इस फाइल की निगरानी कर रहा हूँ, कोई भी चोर उचक्का इसे न उठा ले जाए,” वो कहते। उनकी ये बात सुनकर रमेश ने अपना सिर दीवार से टिका दिया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि एक आदमी किस तरह खुद को इतना धोखा दे सकता है। वो फाइल तो किसी खजाने से कम नहीं थी, जिसमें न सिर्फ उन युवकों के सपने दफन थे, बल्कि उनके परिवार की उम्मीदें, उनकी बूढ़ी माँ की दवाइयां और उनके छोटे भाई-बहनों की फीस भी दफन थी। पर ज्ञानप्रकाश को इन सब से कोई मतलब नहीं था। उन्हें तो बस अपनी कुर्सी से, अपनी मेज से और अपनी धूल भरी फ़ाइल से प्यार था।

धीरे-धीरे, इस निराशा का एक गहरा असर उन युवकों पर पड़ने लगा। जिस सुरेश ने किसान बनने का सपना देखा था, जिसने गाँव में क्रांति लाने की बात की थी, अब वो शहर की एक कंस्ट्रक्शन साइट पर दिहाड़ी मजदूर बन गया था। उसका दिमाग, उसका ज्ञान, उसकी मेहनत, अब सिर्फ ईंटें ढोने और सीमेंट की बोरियाँ उठाने तक ही सीमित हो गया था। एक दिन जब वो काम कर रहा था, तब उसके पुराने दोस्त ने पूछा, “सुरेश, तेरी खेती की पढ़ाई का क्या हुआ?” सुरेश ने बस मुस्कुरा दिया। उसकी मुस्कान में दर्द, निराशा, और एक गहरी हार थी। वो सिर्फ हँस रहा था, क्योंकि उसके पास अब रोने के लिए भी कोई कारण नहीं बचा था। दूसरी ओर, महेश, जो कलाकार था, अब अपनी कला को शराब में डुबोने लगा था। उसकी कला में अब रंगों की जगह, एक गहरा कालापन आ गया था। “एक फाइल ने कई सपनों को दफ़न कर दिया, एक ज्ञानप्रकाश ने कई जिंदगियां बर्बाद कर दीं,” उसकी यह कला शहर भर में मशहूर हो गई, पर कोई उसे समझने वाला नहीं था। कोई उसकी कला की सराहना नहीं करता था, कोई उसके दर्द को नहीं समझता था। ये सब घटनाएँ ज्ञानप्रकाश के सामने घट रही थीं, पर उन्हें इसका कोई पता नहीं था। वो तो अब भी अपनी कुर्सी पर बैठे, उस धूल भरी फ़ाइल को देखते और अपने आप से बातें करते रहते, “आज का युवा तो बड़ा नादान है, सब कुछ रेडीमेड चाहिए इनको।”

एक दिन, जब सब्र का बाँध टूट गया, तो रमेश ने अपनी पूरी ताकत लगाकर ज्ञानप्रकाश से कहा, “ज्ञानप्रकाश जी, आप क्यों ऐसा कर रहे हैं? आप इस फाइल को आगे क्यों नहीं बढ़ने देते? हम सब भूखे मर रहे हैं, हमारे परिवार भूखे मर रहे हैं।” रमेश की आँखों में आँसू थे, पर ज्ञानप्रकाश ने उसे नज़रअंदाज करते हुए कहा, “ये सब ड्रामेबाज़ी मेरे सामने मत करो। मैंने हजारों ऐसे ‘फिल्मी हीरो’ देखे हैं, जो पहले खूब रोते हैं, और बाद में अपने स्वार्थ के लिए कुछ भी कर जाते हैं।” ज्ञानप्रकाश की यह बात सुनकर रमेश के आँसू सूख गए। उसकी जगह उसकी आँखों में एक अजीब-सी आग थी, जो किसी ज्वालामुखी के फूटने से पहले दिखती है। “आप तो वो कुत्ता हैं, जो नाद में बैठ कर घोड़ों को घास नहीं खाने देता,” रमेश ने कहा। ज्ञानप्रकाश ने इस बात को गंभीरता से नहीं लिया। उन्हें लगा कि ये कोई नया, अजीब सा मुहावरा है, जो आज के बच्चों ने बनाया है। “ये क्या ‘डॉग’ ‘डॉग’ कर रहा है? मुझे कोई कुत्ता कहता है? मैं कुत्ता हूँ? मैं तो सरकार का एक सम्मानित नागरिक हूँ। और ये जो फाइल है, ये मेरी निजी संपत्ति है,” ज्ञानप्रकाश गुस्से से लाल हो गए, उनका चेहरा किसी उबले हुए टमाटर जैसा दिख रहा था। उन्होंने फ़ाइल को जोर से अपनी छाती से लगा लिया, जैसे किसी बच्चे ने अपनी प्रिय खिलौना छिपा रखा हो। “अरे ओ! तुम सब निकल जाओ यहाँ से, और मुझे अपनी शांति से जीने दो।” उनकी इस बात ने उन युवकों के दिल को इस तरह तोड़ा, जैसे कोई शीशा टूट कर बिखर गया हो। उनकी सारी उम्मीदें, सारे सपने, सब उसी पल में टूट गए। वे सब चुपचाप वहाँ से चले गए, उनकी आँखों में अब कोई आँसू नहीं थे, बस एक गहरी, भयानक, और दर्दनाक ख़ामोशी थी।

उस दिन के बाद पंचायत भवन में सन्नाटा छा गया। सुरेश का किसान पिता फसल खराब होने के बाद आत्महत्या कर बैठा। रमेश ने गाँव को हमेशा के लिए छोड़ दिया। महेश एक रात शराब के नशे में अपनी ही बनाई हुई एक दर्दनाक पेंटिंग के पास मरा हुआ पाया गया। गाँव में सौर-ऊर्जा योजना की कोई बात नहीं हुई। ज्ञानप्रकाश अब भी अपनी कुर्सी पर बैठे थे, उस धूल भरी फ़ाइल को अपनी गोद में लिए। वो ख़ुश थे। उन्हें लगता था कि उन्होंने इन 'अयोग्य' युवाओं को उनकी जगह दिखा दी। अब कोई शोर नहीं था, कोई हंगामा नहीं था, कोई भी उनसे कुछ नहीं मांगता था। पंचायत भवन में शांति थी। उस फाइल का नाम 'सौर-ऊर्जा योजना' से 'स्वच्छ ग्राम अभियान' हो गया था। असल में वो फाइल एक कूड़ा निस्तारण योजना की थी, जिससे उन युवकों को नौकरी मिल सकती थी और पूरे गाँव का कचरा साफ हो सकता था। पर ज्ञानप्रकाश के 'बैठे रहने' की वजह से न तो कचरा साफ़ हुआ, न किसी को नौकरी मिली, और न ही उन युवकों की जिंदगियां बच पाईं। ज्ञानप्रकाश आज भी उस फ़ाइल पर बैठे हैं। उनके पेट की दाढ़ी और बढ़ गई है, पर उन्हें इसका कोई गम नहीं। उनकी आँखों में वही शैतानी चमक है, जो एक ऐसे व्यक्ति की आँखों में होती है, जिसने खुद कुछ न किया हो, और दूसरों को भी कुछ न करने दिया हो। और सबसे दुखद बात यह है कि उनके जैसे कई ज्ञानप्रकाश, आज भी ऐसी ही फाइलों पर बैठकर, दुनिया को बर्बाद कर रहे हैं। इस बात को सोचकर सिर्फ आँखें ही नहीं, बल्कि आत्मा भी रोती है।

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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