Chandrashekhar Azad Death Anniversary: Alfred Park में Chandrashekhar Azad ने British पुलिस को दिया था चकमा, जिंदा नहीं आए हाथ

By अनन्या मिश्रा | Feb 27, 2026

देश के लिए बलिदान देने वाले महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद का 27 फरवरी को निधन हो गया था। चंद्रशेखर आजाद ने 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के चौक में आत्मघाती हमला किया था। ब्रिटिश सरकार के सैन्य पर अभियोग लगाने के चलते चंद्रशेखर आजाद ने अपनी ही गोलियों से आत्महत्या कर ली थी। उनको भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायकों में से एक के रूप में याद किया जाता है। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर चंद्रशेखर आजाद के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...

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गांधीजी से मोहभंग

असहयोग आंदोलन के दौरान जब चौरीचौरा कांड की वजह से गांधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया। तो आजाद का महात्मा गांधी से मोहभंग हो गया था। इस दौरान उनकी मुलाकात राम प्रसाद बिस्मिल से हुई। यह मुलाकात आजाद के जीवन का एक अहम मोड़ साबित हुई। इसके बाद चंद्रशेखर आजाद 'हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' के सक्रिय सदस्य बन गए। वैसे तो पार्टी का नेतृत्व बिस्मिल के हाथों में था। लेकिन जल्द ही आजाद स्पष्ट और ओजस्वी विचारों से सभी साथियों की पसंद बन गए थे, जिसमें भगत सिंह भी शामिल थे।

ऐसे मिला आजाद नाम

साल 1921 में गांधीजी के असहयोग आंदोलन से जुड़ने के बाद चंद्रशेखर की गिरफ्तारी हुई। इस दौरान जब उनको जज के सामने पेश किया गया, तो चंद्रशेखर के जवाब ने सबके होश उड़ा दिए थे। जब उनसे नाम पूछा गया, तो उन्होंने अपना नाम आजाद और पिता का नाम स्वतंत्रता बताया। उनके इस जवाब से जज नाराज हो गया औऱ उसने चंद्रशेखर को 15 कोड़े मारने की सजा सुनाई थी।

काकोरी ट्रेन कांड

हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन दल के सदस्यों ने काकोरी ट्रेन लूट को अंजाम दिया था। इस दौरान सरकारी संपत्ति की लूट से क्रांतिकारी गतिविधियों के लिये अधिकांश धन संग्रह का काम किया जाता था। आजाद का मानना था कि वह लूटा गया धन भारतीयों का है। इस कांड को मुख्य रूप से बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद, अशफाकउल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी और मनमथनाथ गुप्ता ने अंजाम दिया था। इस घटना के बाद रामप्रसाद बिस्मिल, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह को ब्रिटिश हुकूमत ने फांसी की सजा सुनाई थी।

दिल्ली असेंबली में फेंका बम

साल 1929 में भगत सिंह ने अपने साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर दिल्ली के अलीपुर रोड स्थित ब्रिटिश सरकार की असेंबली हॉल में बम फेंक दिया। उन्होंने इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाए और खुद को गिरफ्तार करवा दिया। जिसके बाद भगत सिंह, सुखदेव और शिवराम को फांसी की सजा दी गई।

आखिरी जंग

इन घटनाओं के बाद ब्रिटिश हुकूमत ने इन क्रांतिकारियों को गिरफ्तार करने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। इस दल के सभी लोग गिरफ्तार हो चुके थे, लेकिन फिर भी काफी समय तक चंद्रशेखर आजाद ब्रिटिश सरकार को चकमा देते रहे। 27 फरवरी 1031 को आजाद इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्ट में अपने अन्य साथियों के साथ मिलकर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ योजना बना रहे थे।

अंग्रेजों को जानकारी मिली तो कई अंग्रेज सैनिकों ने मिलकर उन पर हमला कर दिया। लेकिन आजाद ने अपने साथियों को वहां से भगा दिया और वह अकेले ही अंग्रेजों से लोहा लेने लगे। इस मुठभेड़ में आजाद बुरी तरह से घायल हो गए थे। उन्होंने प्रण लिया था कि वह कभी पकड़े नहीं जाएंगे और ब्रिटिश हुकूमत उनको फांसी नहीं दे सकेगी। अपने इस प्रण को पूरा करने के लिए चंद्रशेखर आजाद ने आखिरी गोली खुद को मार ली और देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी।

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