By शुभा दुबे | Oct 25, 2025
छठ पर्व भारतीय संस्कृति के उन विरल पर्वों में से एक है, जिसमें लोक आस्था, प्रकृति और पर्यावरण के प्रति कृतज्ञता का अद्भुत संगम दिखाई देता है। यह पर्व मुख्यतः बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है, किन्तु आज इसकी महिमा सम्पूर्ण भारत और विदेशों तक फैल चुकी है।
छठ पर्व के दौरान व्रती अत्यंत कठिन नियमों का पालन करते हैं। जैसे— जमीन पर सोना, बिना नमक का भोजन, पूर्ण शुचिता और संयम। छठ पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह मानव और प्रकृति के सह-अस्तित्व का प्रतीक है। इसमें सूर्य, जल और मृदा की पूजा के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का संदेश निहित है। साथ ही, इसमें कोई भेदभाव नहीं होता— स्त्री-पुरुष, जाति, वर्ग या धर्म सभी एक साथ घाटों पर एकत्र होकर सूर्य को अर्घ्य देते हैं। यह सामाजिक समरसता और सामूहिकता का अनुपम उदाहरण है।
आज जब जीवन की भागदौड़ में मनुष्य प्रकृति और अपनी जड़ों से दूर होता जा रहा है, छठ पर्व हमें सादगी, अनुशासन और आत्मसंयम का पाठ पढ़ाता है। यह पर्व हमें यह भी याद दिलाता है कि हमारी संस्कृति में हर त्यौहार केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है। छठ पर्व भारतीय लोक जीवन का वह उज्ज्वल अध्याय है जिसमें आस्था, परंपरा और पर्यावरण का अद्भुत संगम होता है। यह न केवल सूर्यदेव की आराधना है, बल्कि उस समग्र जीवनशक्ति का उत्सव है जो हम सभी को जोड़ती है।
मान्यता है कि इस पर्व की शुरुआत द्वापर काल में हुई थी। बिहार के औरंगाबाद जिले में स्थापित प्राचीन सूर्य मंदिर में छठ पर्व के दौरान वृदह सूर्य मेले का आयोजन किया जाता है। इस व्रत के दौरान सूर्य पुत्र अंगराज कर्ण को विशेष रूप से याद किया जाता है जोकि सूर्य के बड़े उपासक थे और वह नदी के जल में खड़े होकर भगवान सूर्य की पूजा करते थे। पूजा के पश्चात कर्ण किसी याचक को कभी खाली हाथ नहीं लौटाते थे।
यह पर्व मुख्य रूप से बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के साथ ही नेपाल के कुछ इलाकों में धूमधाम से मनाया जाता है लेकिन अब इस पर्व का विस्तार देश के अन्य हिस्सों में भी हो गया है। दिल्ली में यमुना नदी और इंडिया गेट तथा मुंबई में चौपाटी पर उमड़ने वाली छठ व्रतियों की भीड़ इस बात को साबित करती है कि बड़े महानगरों में भी अब इस पर्व को लेकर जागरूकता बढ़ी है।
राजा प्रियवद को कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ परंतु वह मृत पैदा हुआ। प्रियवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त भगवान की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुईं और कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूं। राजन तुम मेरा पूजन करो तथा और लोगों को भी प्रेरित करो। राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी।
शुभा दुबे