जानिये बच्चों के चहेते चाचा नेहरू खुद बचपन में किस तरह रहते थे

By अमृता गोस्वामी | Nov 13, 2018

चाचा नेहरू का बच्चों से प्रेम उनकी फितरत में था, बच्चों को वे गुलाब के फूल की पंखुडि़यों की तरह कोमल मानते थे, वे चाहते थे कि वे बच्चे हमेशा उनके आसपास रहें, ठीक उसी तरह जैसे उनकी शेरवानी पर गुलाब का फूल हमेशा रहता था।

 

बच्चों, तुम्हारे प्यारे चाचा नेहरू जो तुमसे इतना प्यार करते थे उनका बचपन कैसा था यह जिज्ञासा भी आपको जरूर होती होगी। आइये जानते हैं बचपन में वे स्वयं कैसे थे।

 

बचपन में चाचा नेहरू भी आपकी तरह ऊंची उड़ती रंग−बिरंगी पतंगों को देखकर बहुत खुश होते थे। पिता के साथ पतंग उड़ाने का खूब मज़ा लेते थे वे। उनके पिता जब पतंग को ऊंची उड़ाकर उसकी डोर नन्हें जवाहर के हाथ में थमा देते तो वे श्वास रोककर पतंग थामे रहते। आपके प्यारे चाचा यानि पंडित जवाहरलाल नेहरू के पिता मोतीलाल जो पेशे से इलाहाबाद के प्रख्यात वकील थे, एक शौकीन मिजाज इंसान थे। घर में ऐशो आराम की कोई कमी न थी। राजकुमारों की तरह पालन पोषण हुआ था बचपन में चाचा नेहरू का। अपने जीवन में धन की कमी न होने के बावजूद गरीबों के दर्द का अहसास था उनमें। गरीबी देखकर वे बहुत दुःखी होते थे। कई बार वे कहते थे− 'यदि मेरे पास अलादीन का चिराग होता तो मैं एक फूंक मारकर दुनिया से गरीबी दूर कर देता।' 

 

जवाहर लाल के जन्मदिन पर पिता मोतीलाल नेहरू उन्हें हर साल कभी गेंहू, चावल, कभी कपड़ों और कभी मिठाइयों से तौलते और फिर उन कपड़ों, मिठाइयों आदि को गरीबों में बांट दिया जाता था। यह देखकर जवाहर बहुत खुश होते। वे अपने पिता से पूछते कि क्या जन्मदिन साल में कई बार नहीं मनाया जा सकता? 

 

पिता के पास पैसों की कोई कमी तो थी नहीं अतः वे अपने बेटे को उच्च से उच्च शिक्षा दिलवाना चाहते थे, इसलिए बेटे जवाहर लाल का उन्होंने शिक्षा के लिए लंदन के एक प्राइवेट बोर्डिंग स्कूल 'हैरो' में दाखिला कराया। हैरो लंदन के प्रसिद्ध स्कूलों में था। जिसके निकले कई छात्र प्रधानमंत्री के पद तक पहुंचे। यही स्कूल था जहां से पिट, बॉल्डविन, विंस्टन चर्चिल, पामरस्टन और फिर पंडित जवाहर लाल नेहरू भी प्रधानमंत्री के पद तक पहुंचे।

 

पंडित जवाहर लाल नेहरू भारत के प्रथम प्रधानमंत्री थे। वह बचपन में कुछ एकाकी, शर्मीले पर जिज्ञासु प्रकृति के थे और दोस्तों के साथ खेलने की जगह वे अपने पिता या भाई बन्धुओं के साथ खेलना ज्यादा पसंद करते थे। उनके पिता बहुत ही स्पष्ट और खुले विचारों के व्यक्ति थे। बालक जवाहर के सभी अनसुलझे सवालों को उसके सामने स्पष्ट करने में वे कोई भी कसर नहीं छोड़ते थे। बोर्डिंग स्कूल में रहते हुए अपनी बातों, जिज्ञासाओं को भी जवाहर लाल पत्रों द्वारा अपने पिता से शेयर करते और पिता मोतीलाल नेहरू उनकी जिज्ञासाओं का समाधान भी अपने भेजे पत्रों से करते। स्कूल में होने वाले सभी खेलों में वे भाग तो लेते पर उनके पसंदीदा खेल थे घुड़सवारी और निशानेबाजी जिसमें उन्हें महारत हासिल थी। जवाहर लाल नेहरू को ब्रिटिश अखबारों में दिलचस्पी नहीं थी क्योंकि उनमें भारत की खबरें बहुत कम होती थीं इसलिए वे अपने पिता से डाक द्वारा भारतीय अखबार मंगवाते। मोतीलाल नेहरू अखबारों के साथ उनकी विशेष खबरों पर अपनी राय भी भेजा करते थे। आपसी विचार−विमर्श में भारतीय राजनीति में बेटे की रूचि स्पष्ट झलकती थी

 

-अमृता गोस्वामी

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