Antelope Reef पर China ने चली नई सैन्य चाल, South China Sea में सबसे बड़ा सैन्य अड्डा बना रहा है ड्रैगन!

By नीरज कुमार दुबे | Aug 26, 2026

दक्षिण चीन सागर में चीन एक बार फिर अपनी विस्तारवादी रणनीति को जमीन, समुद्र और आसमान, तीनों दिशाओं में आगे बढ़ाता दिखाई दे रहा है। हम आपको बता दें कि विवादित पैरासेल द्वीपसमूह के एंटीलोप रीफ के निकट स्थित छोटे से यागोंग द्वीप पर नई निर्माण गतिविधियों की सैटेलाइट तस्वीरों ने क्षेत्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। संकेत साफ हैं कि बीजिंग केवल छोटे-छोटे ढांचे खड़े नहीं कर रहा, बल्कि दक्षिण चीन सागर के उत्तरी हिस्से में एक ऐसी सैन्य निगरानी और नियंत्रण व्यवस्था तैयार कर सकता है, जो भविष्य में ताइवान संकट से लेकर अमेरिका और उसके सहयोगियों के साथ संभावित टकराव तक निर्णायक साबित हो।

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यहीं इस पूरी गतिविधि का असली रणनीतिक महत्व छिपा है। एंटीलोप रीफ पर चीन ने कृत्रिम द्वीप के निर्माण का पहला चरण पूरा कर लिया है। सैटेलाइट तस्वीरों में यह संरचना लगभग 6 किलोमीटर लंबी दिखाई देती है और इसकी सीधी तटरेखा 3 किलोमीटर से अधिक है। कई विशेषज्ञ इसे संभावित रनवे के रूप में देख रहे हैं। यदि वहां भविष्य में लड़ाकू विमान, समुद्री गश्ती विमान, ड्रोन और अन्य सैन्य संसाधन तैनात किए जाते हैं, तो यागोंग पर संभावित रडार स्टेशन उस पूरी सैन्य संरचना की आंख और कान बन सकता है।

हम आपको बता दें कि यागोंग, एंटीलोप रीफ से लगभग 14 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में स्थित है और दोनों पैरासेल्स के पश्चिमी हिस्से के क्रिसेंट समूह में आते हैं। क्षेत्रफल में छोटा होने के बावजूद यागोंग का सामरिक मूल्य बहुत बड़ा हो सकता है। अलग स्थान पर स्थापित रडार या निगरानी प्रणाली दुश्मन की गतिविधियों पर पहले से नजर रखने, समुद्री और हवाई यातायात की निगरानी करने तथा एंटीलोप पर भविष्य में तैनात सैन्य बलों को शुरुआती चेतावनी देने में उपयोगी हो सकती है।

वहीं चीन ने अभी तक किसी नए सैन्य अड्डे के निर्माण को सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं किया है। सरकारी मीडिया का दावा है कि एंटीलोप रीफ का विकास मौसम पूर्वानुमान, मत्स्य संरक्षण और वैज्ञानिक अनुसंधान जैसी नागरिक जरूरतों के लिए किया जा रहा है। लेकिन दक्षिण चीन सागर में बीजिंग का पुराना रिकॉर्ड इस दावे पर सवाल खड़े करता है। नागरिक सुविधाओं के नाम पर विकसित किए गए ढांचों के बाद सैन्यीकरण की आशंका इस क्षेत्र में कोई नई बात नहीं है।

हम आपको बता दें कि पैरासेल्स पर चीन का नियंत्रण 1974 से है, जब उसने तत्कालीन दक्षिण वियतनाम की नौसेना से इन्हें छीन लिया था। वियतनाम आज भी पूरे द्वीपसमूह पर दावा करता है। दक्षिण में स्थित स्प्रैटली द्वीपसमूह और उसके आसपास के जलक्षेत्रों पर वियतनाम, फिलीपींस, मलेशिया, ताइवान और ब्रुनेई भी अलग-अलग दावे करते हैं। ऐसे में चीन की हर नई संरचना केवल निर्माण परियोजना नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन को बदलने की कोशिश के रूप में देखी जाती है।

इस बीच तनाव को और बढ़ाने वाला घटनाक्रम चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की दक्षिणी थिएटर कमांड का बयान है। कमांड ने शुक्रवार से मंगलवार तक दक्षिण चीन सागर में नौसैनिक और वायुसेना बलों के साथ नियमित गश्त करने की बात कही है। चीन ने फिलीपींस पर क्षेत्र के बाहर के देशों को दक्षिण चीन सागर विवाद में हस्तक्षेप के लिए बुलाने और तथाकथित संयुक्त गश्त आयोजित करने का आरोप लगाया है। बीजिंग का कहना है कि उसकी सेना चीन की क्षेत्रीय संप्रभुता और समुद्री अधिकारों की रक्षा के लिए दृढ़ता से कार्रवाई करती रहेगी।

यही वह बिंदु है जहां चीन का निर्माण अभियान और उसकी सैन्य गश्त एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। एक तरफ बीजिंग समुद्र में अपनी स्थायी उपस्थिति मजबूत करने के लिए नए ठिकाने, कृत्रिम द्वीप और संभावित रडार नेटवर्क तैयार कर रहा है, दूसरी तरफ फिलीपींस और अमेरिका सहित बाहरी शक्तियों की बढ़ती सैन्य मौजूदगी को चुनौती दे रहा है। देखा जाये तो यह केवल क्षेत्रीय विवाद नहीं, बल्कि हिंद-प्रशांत में प्रभाव और नियंत्रण की सीधी लड़ाई बन चुका है।

दूसरी ओर, भारत के लिए भी इसके गंभीर रणनीतिक निहितार्थ हैं। दक्षिण चीन सागर वैश्विक व्यापार का अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है और इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती सैन्य क्षमता समुद्री शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकती है। यदि बीजिंग एंटीलोप रीफ को एक बड़े सैन्य केंद्र और यागोंग को उससे जुड़े प्रारंभिक चेतावनी या निगरानी नेटवर्क में बदलने में सफल होता है, तो उसकी समुद्री निगरानी क्षमता और रणनीतिक पहुंच दोनों बढ़ेंगी। ताइवान को लेकर भविष्य में किसी संघर्ष की स्थिति में दक्षिण चीन सागर का यह सैन्य नेटवर्क अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

बहरहाल, चीन दक्षिण चीन सागर में केवल दावे नहीं कर रहा, बल्कि उन दावों को कंक्रीट, रनवे, रडार और सैन्य गश्त के जरिए स्थायी शक्ति में बदलने की कोशिश कर रहा है। यागोंग का छोटा-सा निर्माण आज मामूली दिखाई दे सकता है, लेकिन एंटीलोप रीफ के विशाल विस्तार के साथ इसे जोड़कर देखा जाए तो तस्वीर कहीं अधिक गंभीर है। दक्षिण चीन सागर में चीन की यह नई चाल आने वाले वर्षों में केवल क्षेत्रीय विवाद नहीं, बल्कि हिंद-प्रशांत की अगली बड़ी सामरिक टकराव रेखा बन सकती है।

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