Bangladesh से बजा चाइनीज अलार्म भारत के लिए कितना बड़ा खतरा? अब 'मुनरो डॉक्ट्रिन' लागू करने का टाइम आ गया

By अभिनय आकाश | Jul 01, 2026

बचपन में कछुए और खरगोश की रेस वाली कहानी तो हम सबने सुनी है? रफ्तार के घमंड में चूर खरगोश पेड़ की छांव में सोता रह गया और कछुआ धीरे-धीरे बाजी मार ले गया। आज दक्षिण एशिया के समंदर में भारत और चीन के बीच ठीक यही कहानी दोहराई जा रही है, और इसका सबसे ताजा व खतरनाक गवाह बांग्लादेश का मोंगला पोर्ट बना है। कहानी की शुरुआत में बाजी भारत के हाथ में थी। नई दिल्ली ने बीजिंग को सीधी शिकस्त देकर इस रणनीतिक पोर्ट के अपग्रेडेशन का प्रोजेक्ट अपने नाम किया था। लगा कि रेस जीत ली गई है, लेकिन कछुए की चाल चल रहे चीन ने हार नहीं मानी, वो चुपचाप अपनी गोटियां फिट करता रहा। देखते ही देखते 10 साल बीत गए! ढाका बीजिंग से हाथ मिला चुका था और जो डील भारत की मुट्ठी में थी, वह चीन की झोली में जा गिरी थी। तो बांग्लादेश का मोंगला पोर्ट हाथ से जाना भारत के लिए कितना बड़ा झटका है? क्या चीन एक और छोर से भारत को घेरने की कोशिश कर रहा है। अब भारत क्या कर सकता है? इन तमाम सवालों का एमआरआई स्कैन करेंगे। 

मोंगला पोर्ट के पास 110 एकड़ जमीन भी भारत को दी गई

दोनों देशों के बीच कनेक्टिविटी बढ़ाने की दिशा में इसे एक बड़ी सफलता माना गया। इसी योजना के तहत मोंगला पोर्ट के पास 110 एकड़ जमीन भी भारत को दी गई ताकि वहां एक स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन बनाया जा सके। प्लान था कि भारत वहां फैक्ट्रियां लगाएगा, गोदाम बनाएगा और एक इंडस्ट्रियल हब तैयार करेगा। इससे भारतीय कंपनियों को फायदा होता। बांग्लादेश में रोजगार पैदा होता और दोनों देशों के आर्थिक रिश्ते और मजबूत होते। साथ ही उस इलाके में भारत की मौजूदगी भी बढ़ाता। जहां चीन भी अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा था। 2018 में भारत ने इस प्रोजेक्ट के लिए हीरानं ग्रुप को डेवलपर चुना। बाद में उसकी सहयोगी कंपनी एविटा कंस्ट्रक्शंस प्राइवेट लिमिटेड ने मार्च 2022 में बांग्लादेश इकोनॉमिक जोन अथॉरिटी बेजा के साथ एक नया समझौता भी किया। डील पर डील होती रही, योजनाएं बनती रही लेकिन काम कभी शुरू भी नहीं हुआ। 2 साल की तय समय सीमा भी निकल गई लेकिन जमीन पर एक फावड़ा तक नहीं चला। फिर आया 204 जुलाई और अगस्त में बांग्लादेश में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन शुरू हो गए। शुरुआत सरकारी नौकरियों में आरक्षण के खिलाफ छात्र आंदोलन से हुई। उस समय सरकार नौकरियों का करीब 1/3 हिस्सा 1971 के मुक्ति संग्राम के सेनानियों के परिवारों के लिए आरक्षित कर रही थी। प्रदर्शनकारियों  का आरोप था कि इस व्यवस्था का इस्तेमाल शेख हसीना अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने के लिए कर रही हैं। लेकिन देखते ही देखते बात बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और लंबे समय से चले आ रहे सत्तावादी शासन से नाराज हजारों युवा सड़कों पर उतर आए। आखिरकार 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दिया और बांग्लादेश छोड़कर भारत आ गई। तब से लेकर अब तक भारत में ही वह रह रही हैं। इसके बाद नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के लीडरशिप में अंतरिम सरकार बांग्लादेश में बनी। यहीं से भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में बड़ा मोड़ आया। 

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देरी की कीमत

पिछले 15 साल में जो भरोसा और साझेदारी बनी थी उसमें दरार पड़नी शुरू हो गई। दोनों देशों के बीच सीमा पर तनाव बढ़ा। व्यापार को लेकर जवाबी कदम उठाए गए एक दूसरे पर और नेताओं के बयान भी पहले से ज्यादा तल्ख हो गए। इसी दौरान बांग्लादेश ने पाकिस्तान के साथ भी अपने रिश्ते तेजी से बढ़ाने शुरू कर दिए। 1971 के बाद पहली बार ढाका और इस्लामाबाद के बीच सीधी कारगो शिपिंग सेवा और डायरेक्ट फ्लाइट्स का ऐलान किया गया। इन सारी डेवलपमेंट्स पर चीन की पैनी नजर थी। इस बीच मार्च 2025 में मोहम्मद यूनुस बीजिंग पहुंचे। बस तभी चीन ने अपना तुरुब का इक्का चला। उसने दो बड़े ऐलान किए। पहला मूंगला पोर्ट को एडवांस बनाने के लिए $40 करोड़ देने का वादा। दूसरा एक नए चीनी इंडस्ट्रियल इकोनॉमिक ज़ोन के लिए $35 करोड़ के निवेश का ऐलान। यानी चीन सिर्फ दिलचस्पी नहीं दिखा रहा था। बल्कि बड़े पैमाने पर निवेश करने के लिए तैयार था। 

समुद्र में बढ़त

चीन इससे पहले बांग्लादेश के चटगांव नौसैनिक बंदरगाह के निकट पेकुआ पनडुब्बी अड्डा बनाने का काम भी कर रहा है। इससे बांग्लादेश की नौसेना भी पूरी तरह चीन की मुट्ठी में होगी। इसी बहाने बांग्लादेश के समुद्र तटों पर, जो भारत के समुद्री इलाके में ही हैं, चीन ने अपनी पनडुब्बियों और युद्धपोतों को भी तैनात करने की सुविधा हासिल कर ली है। सीमाओं के पास चीन अपने खुफिया एजेंटों व सैनिकों को तैनात कर सकता है। CPEC की तरह ही चीन ने बांग्लादेश से चीन-म्यांमार-बांग्लादेश आर्थिक गलियारा (CMEC) में शामिल होने को कहा है। पाकिस्तान के ग्वादर, बांग्लादेश के चटगांव और श्रीलंका के हम्बनटोटा बंदरगाह को चीन म्यांमार से होकर गुजरने वाला प्रस्तावित राजमार्ग बना लेगा तो उसके लिए यह सामरिक तौर पर उपयोगी होगा। भारत के चारों ओर 'मोतियों का हार' डाल कर सामरिक दबाव बढ़ाने की जिस रणनीति पर काम चीन ने इस सदी में शुरू किया था, वह लागू होता दिख रहा है।

नई दिल्ली को  'मुनरो डॉक्ट्रिन' की सख्त जरूरत

इतिहास उन देशों के प्रति कभी उदार नहीं रहा जो रणनीतिक सुस्ती या अत्यधिक संकोच को 'गंभीर संयम' समझने की भूल कर बैठते हैं, और भारत आज बिल्कुल इसी संवेदनशील मोड़ पर खड़ा है। जहाँ नई दिल्ली अब भी पड़ोसियों के साथ पुरानी सद्भावना और सहयोग की भाषा बोल रही है, वहीं चीन चुपचाप केवल ताक़त और कड़े आर्थिक प्रभाव की भाषा में बात कर रहा है। क्योंकि महाशक्तियां अपना दबदबा रातों-रात नहीं, बल्कि एक-एक कर दी गई ढील, रणनीतिक चूक और गलतफहमियों की किस्तों में खोती हैं। अब बांग्लादेश को ही देख लीजिए। संप्रभुता के अधिकार का हवाला देकर उसने एक बार फिर चीन का हाथ थाम लिया है और भले ही कागज़ पर ढाका को अपने आर्थिक साझीदार चुनने का पूरा हक हो, लेकिन भू-राजनीति कभी किसी शून्य में काम नहीं करती जहाँ आपके फैसलों से पड़ोसी की सुरक्षा ही खतरे में पड़ जाए। अगर भारत ने अब भी अपनी इस रणनीतिक संतुष्टि को छोड़कर अपने पड़ोस में एक ऐसी स्पष्ट 'लक्ष्मण रेखा' नहीं खींची जिसे पार करने की कोई जुर्रत न कर सके, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत खुद को चारों तरफ से रणनीतिक रूप से घिरा हुआ पाएगा। सुरक्षा की 'लक्ष्मण रेखा' खींचना कोई भारत की खोजी हुई कूटनीति नहीं है, बल्कि यह भू-राजनीति का सबसे पुराना और बुनियादी नियम है! महाशक्तियां अपने पड़ोस में किसी दुश्मन की आहट तक बर्दाश्त नहीं करतीं। अमेरिका ने अपने पड़ोस में रूस या चीन की नौसैनिक मौजूदगी को कभी पनपने नहीं दिया। याद कीजिए वेनेजुएला के निकोलस मादुरो का क्या हश्र हुआ था? रूस ने यूक्रेन के साथ ठीक यही किया, भले ही मॉस्को से इससे बेहतर तरीके की उम्मीद थी। और खुद चीन? ताइवान या दक्षिण चीन सागर में मामूली सी सैन्य हलचल पर भी बीजिंग युद्ध की धमकी देने लगता है। तो फिर बड़ा सवाल यह है कि आखिर दुनिया में सिर्फ भारत ही क्यों यह नाटक करता रहे कि उसके ठीक पड़ोस में खड़ा हो रहा दुश्मन का खतरनाक रणनीतिक ढांचा, कोई सैन्य चक्रव्यूह नहीं बल्कि सिर्फ एक 'साधारण व्यापारिक निवेश' है? जब दुनिया का हर ताकतवर मुल्क अपने आंगन की सुरक्षा के लिए आंखें लाल कर सकता है, तो यही वजह है कि आज नई दिल्ली को अपनी खुद की 'मुनरो डॉक्ट्रिन' यानी भारत की अपनी 'लक्ष्मण रेखा' खींचने की सख्त जरूरत है। जब साल 1823 में अमेरिकी राष्ट्रपति जेम्स मुनरो ने यह ऐलान किया था कि कोई भी बाहरी ताकत पश्चिमी गोलार्ध  में दखल नहीं देगी, तब अमेरिका कोई वैश्विक महाशक्ति नहीं था। उसके पास कोई बहुत बड़ी सैन्य ताकत नहीं थी। लेकिन इसके बावजूद उन्होंने एक कड़क लक्ष्मण रेखा खींचने का हौसला दिखाया—कि अमेरिका का पड़ोस किसी भी दुश्मन महाशक्ति की रणनीतिक घुसपैठ के लिए खुला नहीं है।

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