By अभिनय आकाश | May 09, 2026
पश्चिम बंगाल में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक बदलाव के तहत, शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, जिससे तृणमूल कांग्रेस के 15 साल के शासन का अंत हो गया। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 294 सदस्यीय विधानसभा में 207 सीटें जीतकर मजबूत जनादेश दिया, जबकि टीएमसी 80 सीटों तक सिमट गई। जीत के बाद, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की उपस्थिति में हुई एक बैठक में अधिकारी को सर्वसम्मति से भाजपा विधायक दल का नेता चुना गया।
अक्टूबर 2020 का वह समय बंगाल की राजनीति में एक बड़े बदलाव की आहट दे रहा था। विधानसभा चुनावों की दहलीज पर खड़ी तृणमूल कांग्रेस ऊपर से शांत दिख रही थी, लेकिन भीतर ही भीतर एक शक्तिशाली तूफान आकार ले रहा था। पूर्वी मेदिनीपुर के बेताज बादशाह और टीएमसी के सबसे कद्दावर चेहरों में से एक, शुभेंदु अधिकारी अब ममता बनर्जी के खेमे में घुटन महसूस कर रहे थे। शुभेंदु वही नेता थे जिन्होंने 2007 के ऐतिहासिक नंदीग्राम आंदोलन की कमान संभाली थी, जिसके दम पर ममता बनर्जी ने 34 साल के वामपंथी किले को ढहाकर सत्ता हासिल की थी। शुभेंदु केवल एक मंत्री नहीं थे, बल्कि ममता बनर्जी उन्हें अपने परिवार का हिस्सा मानती थीं। उनके पास परिवहन, सिंचाई और जलमार्ग जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों के साथ-साथ हुगली नदी पुल आयोग की जिम्मेदारी भी थी। सत्ता के समीकरण तब बिगड़े जब पार्टी संगठन में अभिषेक बनर्जी का प्रभाव बढ़ने लगा। शुभेंदु को अभिषेक का नेतृत्व स्वीकार नहीं था, जिसके कारण दोनों के बीच दरार गहरी होती गई। अक्टूबर 2020 तक यह आंतरिक कलह सड़कों और अखबारों की सुर्खियों तक पहुँच गई। 'शुभेंदु बनाम अभिषेक' की इस जंग ने साफ़ कर दिया था कि बंगाल की राजनीति का सबसे भरोसेमंद साथी अब अपनी नई जमीन तलाश रहा है।
शुभेंदु अधिकारी की नाराजगी दूर करने के लिए ममता बनर्जी ने अपनी पूरी राजनीतिक ताकत लगा दी थी, जिसके तहत उन्होंने सौगत राय और रणनीतिकार प्रशांत किशोर जैसे अपने सबसे खास दूतों को उन्हें मनाने के लिए भेजा। हालांकि, मान-मनौव्वल की ये तमाम कोशिशें नाकाम रहीं क्योंकि शुभेंदु अपने फैसले पर अडिग थे। सौगत राय के अनुसार, 1 दिसंबर को हुई सकारात्मक चर्चा के बाद ऐसा लगा था कि सुलह की गुंजाइश है, लेकिन अगले ही दिन 2 दिसंबर को शुभेंदु ने एक व्हाट्सएप संदेश के जरिए साफ कर दिया कि अब साथ काम करना संभव नहीं है। इसके बाद पार्टी ने आधिकारिक तौर पर उनसे बातचीत के सभी रास्ते बंद करने की घोषणा कर दी।
दिसंबर 2020 में, 2021 के विधानसभा चुनावों से कुछ ही महीने पहले, अधिकारी ने टीएमसी छोड़ दी और भाजपा में शामिल हो गए। उनके इस कदम ने बंगाल में एक बड़ा राजनीतिक उलटफेर पैदा कर दिया। हालांकि भाजपा 2021 में सरकार नहीं बना पाई, लेकिन अधिकारी विपक्ष के नेता के रूप में उभरे और राज्य में पार्टी की सबसे सशक्त आवाज बन गए। इस दौरान टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी के साथ उनकी प्रतिद्वंद्विता और भी तीव्र हो गई, जिसने बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य को काफी हद तक प्रभावित किया। 2021 में नंदीग्राम के हाई-प्रोफाइल चुनाव में ममता बनर्जी पर उनकी नाटकीय जीत के बाद अधिकारी का राजनीतिक कद तेजी से बढ़ा। वर्षों बाद, उन्होंने भाबनीपुर में एक और बड़ी चुनावी जीत के साथ अपनी स्थिति को और मजबूत किया। इन जीतों ने बंगाल में भाजपा के सबसे शक्तिशाली नेता के रूप में उनकी छवि को मजबूत किया और पार्टी की भारी जीत के बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद के लिए स्वाभाविक पसंद बना दिया।
अब, वर्षों के राजनीतिक संघर्ष, बदलते गठबंधनों और भीषण चुनावी लड़ाइयों के बाद, सुवेंदु अधिकारी बंगाल की राजनीति के केंद्र में खड़े हैं। एक युवा जमीनी नेता से लेकर वाम-विरोधी आंदोलनों के प्रमुख व्यक्ति और बाद में ममता बनर्जी के वर्चस्व को चुनौती देने वाले के रूप में उनका सफर राज्य के सबसे नाटकीय राजनीतिक परिवर्तनों में से एक को दर्शाता है।