जांच कमेटी की क्लीन चिट (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Jun 26, 2026

गहन जांच करने के बाद क्लीन चिट देने वाले ज़िम्मेदार लोग होते हैं। जब भी प्रसिद्ध, महान और धनवान लोगों की जांच करनी पड़ती है तो जांच करने वालों की जिम्मेवारी बहुत बढ़ जाती है। उन्हें पहले से ही पता रहता है कि किस व्यक्ति को ज़िम्मेदार ठहराया जाना है। इसको फंसाने की कोशिश करनी होगी, उसको पूरा डुबोना पड़ेगा। जांच कमेटी का एक नायक होता है। उसकी भूमिका भी गज़ब होती है। वह नायक तो होता है लेकिन उसे नायकत्व का सिर्फ अभिनय करना होता है। वह प्राकृतिक अभिनय करता है और सचाई को सार्वजनिक होने से बचाते हुए क्लीन चिट उपहार में देता है। बेचारी सचाई उसी खोल में सुरक्षित पड़ी रहती है जहां उसे व्यवस्थाजी की इच्छा के अनुसार होना होता है।  

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सुदृढ़ व्यवस्था ही जांच कमेटी से गहन जांच करवा सकती है और क्लीन चिट देने वाली जांच कमेटी ही शानदार व्यवस्था पर सवाल उठा सकती है। अब सब कुछ नया डिजिटल है फिर भी लोकतान्त्रिक परम्पराओं की बात होती है जैसे प्रबंधन में व्यवस्था की कमी, रिकॉर्ड में उचित रखरखाव न होना, गलत कम्पनी को ठेका देना, नालायक सीसीटीवी कैमरे, बेचारी संदिग्ध भूमिकाएं, बढ़ती भीड़। हर जांच कमेटी सिफारिश ज़रूर करती है कि संस्था का पुनर्गठन हो, प्रबंधन के लिए पेशेवर लोगों को लाएं, हर सप्ताह ईमानदार ऑडिट किया जाए, सीसीटीवी की मरम्मत करवाते रहें। इसमें कुछ काम तो असंभव ही होते हैं फिर भी करने को कहा जाता है। क्लीन चिट देनी होती है मज़ाक नहीं है।  

गड़बड़ी, हेराफेरी और बदमाशी बहुत समझदारी और चालाकी से की जाती है। इसलिए जांच करने वाले इंसानों का नैतिक कर्तव्य बहुत लम्बा चौड़ा हो जाता है तभी जांच कमेटी बार बार पंद्रह दिन का समय मांगती रहती है। नकली बुद्धि गलती कर सकती है इसलिए उसे महत्त्वपूर्ण जांच की ज़िम्मेदारी नहीं दे सकते। क्लीन चिट ऐसे ही किसी कुपात्र को नहीं दे सकते। यह तो सुपात्र को ही मिलती है इसलिए इसकी महिमा बरकरार रहती है।

- संतोष उत्सुक

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