By डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा | May 06, 2026
पांच राज्यों के 4 मई के चुनाव परिणाम देश में बड़े बदलाव का संकेत लेकर आये हैं। एक और जहां पश्चिम बंगाल में पिछले 15 साल का ममता बनर्जी सरकार की करारी हार हुई है तो केरलम् में एलडीएफ की करारी हार के साथ ही देश में एक मात्र वामपंथी सरकार का भी अंत हो गया है। असम में हिमंता सरकार की हेटट्रिक, पुडुचेरी में एनडीए की वापसी और तमिलनाडू में डीएमके-एआईडीएमके की 57 साल की राजनीति का अंत और अभिनेता से नेता बने विजयन का उदय बहुत कुछ कहता है। जनता ने अपना मेंडेट दे दिया है तो चुनाव आयोग ने भी अपना कार्य बखूबी निभा दिया है भले ही अब हारने वाले लाख आरोप-प्रत्यारोप लगायें पर इन चुनावों की एक खास विशेषता यह रही कि मतदान प्रतिशत में उल्लेखनीय बढ़ोतरी और हिंसा भी लगभग नहीं के बराबर रही है। प.बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की जीत के साथ भाजपा का वर्षों पुराना सपना पूरा हो गया है वहीं सबसे अधिक चिंतनीय व गंभीर परिणाम यह रहा है कि केरलम् में वामपंथी सरकार की हार के साथ ही देश में वामपंथ हाशिये में चला गया है। मजे की बात यह है कि 1956 में त्रावणकोर, कोचिन और मालाबार को मिलाकर बने केरलम् की 1957 की पहली चुनी हुई सरकार कम्युनिस्ट पार्टी ईएमएस नंबूदरीपाद की बनी। ठीक 70 साल बाद केरलम् में वामपंथियों की हार के साथ ही देश में वामपंथियों की एकमात्र राज्य की अंतिम सरकार का भी अंत हो गया है। सवाल यह उठने लगा है कि प. बंगाल और त्रिपुरा की तरह केरलम् में भी क्या अब वामपंथी सरकार आने वाले सालों में वापसी नहीं कर पायेगी ? इतिहास तो यही बता रहा है कि 34 साल के लगातार शासन के बावजूद 2011 के बाद से प. बंगाल में कम्यूनिस्ट सरकार की वापसी नहीं हो पायी है तो 25 साल से सरकार के बावजूद त्रिपुरा में भी 2018 के बाद से कम्युनिस्ट सरकार की वापसी नहीं हो पायी है। इससे लगता है कि वामपंथ या कम्युनिस्ट सरकारें अब इतिहास का हिस्सा बनती जा रही है। मजे की बात यह है कि लोकसभा में भी आज कम्युनिस्टों का प्रतिनिधित्व सिमट कर 4 की संख्या तक रह गया हैं हांलाकि यह गत लोकसभा से एक ज्यादा है। यह नहीं भूलना चाहिए कि 1977 के बाद जिस तरह से भारतीय राजनीति में कम्युनिस्ट पार्टियों का दबदबा बढ़ा वह 1990 के दशक में किंग मेकर की स्थिति में आ गया था यहां तक कि 2004 में लोकसभा में 59 सदस्यों के साथ कम्यूनिस्ट पार्टियों की सर्वाधिक भागीदारी रही और ज्योतिबसु को एक बार नहीं अपितु तीन बार देश का प्रधानमंत्री का पद ऑफर किया गया पर वामपंथियों में अहम् की लड़ाई के चलते यह अवसर खो दिया और इसके बाद तो कम्यूनिस्ट पार्टियां धीरे धीरे हाशिये में जाती रही जबकि सोमनाथ चटर्जी लोेकसभा अध्यक्ष रहे तो उस दौर में कम्यूनिस्ट पार्टियां किंग मेकर की भूमिका निभा रही थी। एक दौर था जब कम्युनिस्ट पार्टियों के बड़े बड़े नाम होते थे। समय ने पलटा खाया और धीरे धीरे पार्टिंयां पहचान खोने लगी।
वैसे उदारीकरण के दौर में कम्युनिस्ट पार्टियों के सामने नए तरह की चुनौतियां सामने आई और 1922 में रुस में बना यूएसएसआर तक 70 साल बाद ही 1991 आते आते बिखराव के दौर में आ गया। यूक्रेन सहित कई राज्य अलग हो गए और आज रुस और यूक्रेन का संघर्ष जगजाहिर है। चीन ने समयानुकूल सोच विकसित किया और आज औद्योगिक दुनिया में चीन का वर्चस्व है। अमेरिका जैसा शक्तिशाली देश चीन के वर्चस्व से चिंतित है और चीन की काट देखने लगा है। खैर यह विषयांतर होगा।
सौ टके का सवाल यह है कि केरलम् की विजयन सरकार की हार को देश में वामपंथी सरकारों का अंत माना जाना चाहिए या फिर वापसी की संभावना हो सकती है। सबसे बड़ी बात यह है कि जब केन्द्र में वामपंथियों का दखल बढ़ा तो वहीं वामपंथी पार्टिंयों के बिखराव का कारण बन गया। इगो के चलते ज्योतिबसु का विरोध हुआ तो सोमनाथ चटर्जी तक का विरोध किया गया। दरअसल समय के साथ बदलाव औैर समय की नब्ज को नहीं पहचानने से ही समस्याएं होती है। आज लगभग यही स्थिति स्थानीय दलों की होती जा रही है। समाजवादी पार्टी, बहुजनसमाज पार्टी, शिव सेना, एनसीपी, जेडीयू, जेडीएस, आप, शिरोमणी अकाली दल आदि धीरे धीरे जनाधार खोते जा रहे हैं और राज्यों तक ही सीमित होते जा रहे हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों को सोच, नीति और रणनीति में बदलाव लाना होगा नहीं तो भविष्य में रही सही पहचान भी खोने में देरी नहीं लगेगी।
- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा