हिन्दी महीने में प्रतियोगिता की याद (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Sep 25, 2020

आज जब कोरोनाजी अधिकांश हिंदी प्रतियोगिताएं वर्चुअल करवा रहे हैं तो पुरानी घटनाओं की याद आनी स्वाभाविक है। उदासी के दिनों में वैसे भी सुख के दिन चाहे कम रहे हों, याद ज़रूर आते हैं। क्या दिन होते थे हिन्दी को पूरी तरह से मनाने के लिए कुछ लोग पूरे महीने कार्यक्रम आयोजित करते थे। किसी समय की बात है सरकारी कर्मचारी, भाषा कार्यान्वन समितियों के कार्यक्रमों में पुरस्कार पाने के लिए तैयारी करते थे। बड़ी मुश्किल से मेहनत कर हिन्दी को बढ़ाने, फैलाने व समझाने के लिए जिन्होंने अपने कार्यालयों में पिछली बार प्रतियोगिता करवाई थी, बारबार प्रेरणा देकर तीन या तेरह प्रतियोगी इकठ्ठे किए थे, यह देखने को आतुर थे कि नया आयोजक कौन सा तीर मारेगा। कर्मचारी व अधिकारी, दर्जनों सालों से अंग्रेजी मारमार कर हिन्दी को भगा चुके थे। कार्यालयों में हिन्दी पर कार्यक्रम संचालन के लिए कोई साहित्य प्रेमी कर्मचारी, बहुत मेहनत व अथक प्रेरणा से बीस बार ‘यू कैन ओनली डू इट’ कहने पर ही तैयार होता था। बहुतों को पता नहीं चलता था कि आयोजन कैसे करें, ठीक जैसे किसी युग में स्कूल अध्यापकों को पल्ले नहीं पड़ता था कि भाषण, वादविवाद या पत्रपाठन प्रतियोगिता में सचमुच अंतर है।

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आयोजक ने हिन्दी में मुस्कुराकर कहा, ‘अपनी प्रिय सितम्बर भाषा, सौरी, माफ कीजिए राजभाषा हिन्दी को प्रोमोट करने के लिए हम आपको आज की प्रतियोगिता में पांच फोटोज़ देंगे। इनमें से किसी एक को वौच कर आपने लिखना है। शरारती प्रतियोगी ने कहा प्रतियोगिता तो एक फोटो बारे लिखकर होनी चाहिए। जवाब मिला कि प्रतियोगिता में नोवेलिटी लाने व इंट्रस्टिंग बनाने के लिए फाइव दिए गए हैं। आपको पता है हिन्दी में कुछ भी करना कितना टफ होता है। प्रतियोगिता के दौरान ही ठंडे गुलाबजामुन, बासी समोसा और काढ़ा नुमा चाय हाथ में पकड़ा दी। आयोजक कार्यालय के बंदे हिन्दी मास में कुछ नया करने पर संतुष्ट दिख रहे थे।

- संतोष उत्सुक

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