कर्नाटक में अपने वोटबैंक की उपेक्षा का खामियाजा भुगतना पड़ा है कांग्रेस को

By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Jul 03, 2019

दक्षिण भारत में, विशेषकर कर्नाटक कांग्रेस 1999 के दौरान और उस अवधि से पहले बहुत मजबूत थी। उस समय कोई भी कांग्रेस को चुनौती नहीं दे सकता था क्योंकि कर्नाटक में एससी / एसटी तथा पिछड़े वर्ग के अन्य समुदायों के साथ-साथ अल्पसंख्यक कांग्रेस समर्थक थे, या हम कह सकते हैं कि उपरोक्त समुदायों को कांग्रेस का वोट बैंक कहा जाता था। इसके पीछे कारण यह है कि वे हमेशा कांग्रेस समर्थक रहे और उन्होंने केवल कांग्रेस को वोट दिया।

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2009 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 19 सीटें जीतीं, बाद में 2014 में भगवा पार्टी ने एक लोकसभा सीट घटाई। 2014 में भाजपा को 28 लोकसभा सीटों में से 18 सीटें मिलीं और 2019 में तो कमाल हो गया जब भाजपा ने 25 सीटें जीत लीं और मांड्या लोकसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार सुमालता अंबरीश भाजपा के समर्थन से निर्वाचित हुईं। कर्नाटक में भाजपा का जो राजनीतिक विकास हुआ है, वह स्पष्ट रूप से दिखाता है कि दलित समुदायों, पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यकों सहित मुसलमानों और ईसाइयों को भी भाजपा का समर्थन था। अब, कांग्रेस ने अपना वोट बैंक खो दिया है जो 1947 से उनके हाथ में था। (जब 1952 में लोकसभा का पहला चुनाव हुआ था)। अब, भाजपा ने अपनी राजनीतिक रणनीति भी बदल दी है और दलितों तथा अल्पसंख्यकों का मन जीतने के बाद इन पर और ध्यान दे रही है।

दिलचस्प तथ्य यह है कि कांग्रेस के बड़े नेता जैसे मल्लिकार्जुन खड़गे जो लोकसभा में कांग्रेस पार्टी के नेता थे, पूर्व केंद्रीय मंत्री के.एच. मुनियप्पा और वीरप्पा मोइली को भी भाजपा के नए उम्मीदवारों ने हरा दिया। एससी / एसटी, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों की लापरवाही के कारण कांग्रेस के पतन की शुरुआत हुई। यहां तक कि अब कांग्रेस पार्टी से निलंबित हुए विधायक और पूर्व मंत्री रोशन बेग जैसे मुस्लिम समुदाय के सबसे वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं ने भी भाजपा का समर्थन किया। हाल ही में उन्होंने अलपसंख्यक मामलों के केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी के साथ मुलाकात की। साथ ही पूर्व विदेश मंत्री और वरिष्ठ पत्रकार एम.जे. अकबर के साथ अपने नये राजनीतिक जीवन और भविष्य के लिए मुलाकात की।

यह स्पष्ट करता है कि कर्नाटक में ओबीसी, उच्च जाति के हिंदू और एससी / एसटी तथा अल्पसंख्यक भी भाजपा को स्वीकार कर रहे हैं जो पहले कांग्रेस का वोट बैंक था। हम कह सकते हैं कि कांग्रेस नेतृत्व अपने पुराने और पारंपरिक वोट बैंक की रक्षा करने में विफल रहा है।

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