By उमेश चतुर्वेदी | Apr 07, 2026
पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आती जा रही है, चुनावी घमासान बढ़ता जा रहा है। देश की सबसे पुरानी पार्टी का दांव चूंकि दो राज्यों में ही सबसे ज्यादा है, इसलिए उसका सारा ध्यान इन्हीं दो राज्यों पर है। असम और केरल के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की स्थिति अलग-अलग है। इसलिए दोनों ही राज्यों में उसकी चुनौतियां अलग हैं, इसलिए उसकी लड़ाई के रूप और तरीके अलग-अलग हैं। हरियाली और समुद्री किनारे के चलते केरल को खूबसूरत राज्यों में शुमार किया जाता है। इस खूबसूरती की ही वजह से केरल को ‘भगवान का देश’ कहा जाता है। बारह साल से केंद्रीय सत्ता से दूर कांग्रेस को उम्मीद भगवान के इसी देश से ही ज्यादा है। पिछले लोकसभा चुनावों में जिस तरह इस राज्य से उसे समर्थन मिला था, उसकी वजह से उसकी उम्मीदों का परवान चढ़ना स्वाभाविक है। लेकिन यहां उसकी चुनौती भगवान को न मानने वाली विचारधारा से है। केरल की सत्ता पर काबिज जिस वाममोर्चा से विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का मुकाबला है, राष्ट्रीय स्तर पर मोदी के खिलाफ बने विपक्षी मोर्चे में कांग्रेस उसी वाममोर्चे के साथ है। स्थानीय स्तर पर विरोध और राष्ट्रीय स्तर पर सहयोग का विरोधाभास अगर सर्वाधिक शिक्षित राज्य में भारी पड़ सकता है। हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में राजधानी तिरूअनंतपुरम् में जीत हासिल कर चुकी बीजेपी इस विरोधाभास को खूब उछाल रही है। वैसे तो बीजेपी का दावा है कि इस बार भगवान के देश में भगवा ध्वज फहरने जा रहा है, हालांकि अब तक चुनावी अभियान से साफ है कि बीजेपी को वैसी सफलता मिलती नजर नहीं आ रही। लेकिन बीजेपी का मौजूदा जीन आखिरी दम तक हार नहीं मानने का है। इसलिए पार्टी की कोशिश सीपीएम की अगुआई वाले वाममोर्चे और कांग्रेस की अगुआई वाले संयुक्त मोर्चे के विरोधाभास को उजागर करने पर है। पार्टी को लगता है कि देश के इस सर्वाधिक साक्षर राज्य में अगर जनता ने इस विरोधाभास को समझ लिया तो राज्य के चुनावी नतीजे 2017 के उत्तर प्रदेश के परिणामों की तरह आश्चर्यजनक रूप से अपने पक्ष में किए जा सकते है। 2017 में किसने सोचा था कि भारतीय जनता पार्टी प्रचंड बहुमत हासिल करेगी। इसी कोशिश के तहत अमित शाह केरल की करीब 19 प्रतिशत जनसंख्या वाले ईसाई समुदाय से लगातार संपर्क कर रहे हैं। साल 2011 की जनगणना के अनुसार, केरल के कुल 3.34 करोड़ निवासियों में से लगभग 61.41 लाख ईसाई हैं, जो मुख्य रूप से मध्य केरल में केंद्रित हैं। पारंपरिक रूप से केरल में यह समुदाय कांग्रेस का सहयोग करता रहा है, लेकिन बीजेपी की कोशिश इस समुदाय को कांग्रेस से तोड़ने की रही है। हालिया अतीत के कुछ चुनावों में यह समुदाय बीजेपी के साथ खड़ा होता नजर आया है। इसकी वजह यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित लव जेहाद का शिकार केरल में यह समुदाय भी होता रहा है। इससे स्थानीय स्तर पर इस समुदाय में भी कुछ वैसा ही गुस्सा है, जैसा उत्तर भारत में हिंदू समाज में ऐसा नजर आता है। कांग्रेस का संकट है कि वह वाममोर्चा का विरोध और समर्थन की उलटबांसी की सटीक काट नहीं खोज पा रही है। इस वजह से राज्य का चुनावी मुकाबला लगातार दिलचस्प होता जा रहा है। वैसे बीजेपी जिस तरह की कोशिश करती नजर आ रही है, उससे सबसे ज्यादा संकट में कांग्रेस की संभावनाएँ ही नजर आ रही है। ऐसा लगता है कि बीजेपी की रणनीति कांग्रेस को इस राज्य की सत्ता से दूर रखने की ही है।
असम से सटे पश्चिम बंगाल में भी विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। वहां तो वह लड़ती भी नहीं दिख रही। राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी कभी कांग्रेस की सिपाही रहीं। केरल की तरह पश्चिम बंगाल में भी कांग्रेस विरोधाभास से जूझ रही है। राष्ट्रीय स्तर पर वह ममता के साथ है, लेकिन राज्य में उसकी पूरी कोशिश ममता को हिमंत की तरह सबक सिखाने की ही लग रही है। दरअसल राज्य में कांग्रेस का एक भी विधायक नहीं है। हालांकि 2023 में मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद जिले की सगरदीघी सीट के उपचुनाव में कांग्रेस तृणमूल कांग्रेस को हराकर विधानसभा में अपना खाता खोलने में सफल रही थी। मुस्लिम बहुल विधानसभा में कांग्रेस की जीत से ममता की नींद उड़ गई थी। राज्य के करीब पैंतीस फीसद मुस्लिम वोट बैंक में सेंध का डर उन्हें सताने लगा। इसके लिए उन्होंने ऑपरेशन सगरदीघी शुरू किया और यहां से जीते कांग्रेसी विधायक बायरन विश्वास को तृणमूल कांग्रेस में शामिल करा दिया। कांग्रेस ने इसे विश्वासघात माना और लगता ऐसा है कि वह ममता को इन चुनावों में सबक सिखाने की कोशिश कर रही है। वैसे पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान राज्य की ग्यारह मुस्लिम बहुल विधानसभा सीटों पर उसके प्रत्याशी पहले नंबर पर रहे थे। इसलिए कांग्रेस यह मानकर चल रही है कि विधानसभा चुनावों में उसे मुस्लिम वोटरों का साथ मिल सकता है। उसकी पूरी रणनीति इसी लिहाज से आगे बढ़ रही है।
साफ है कि इस बार के चुनावों में कांग्रेस जहां अपने पुराने सिपाहियों को सिखाने की कोशिश में है, वहीं खुद की संभावनाएं बेहतर करने का भी प्रयास कर रही है।
- उमेश चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं