सपा-बसपा से गठबंधन की उम्मीद खत्म होने के बाद कांग्रेस की नई रणनीति

By अजय कुमार | Jan 18, 2019

लोकसभा चुनावों को लेकर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का भटकाव जारी है। हालात यह है कि बसपा−सपा से दुत्कारे जाने के बाद भी कांग्रेस यह तय नहीं कर पाई है कि वह इन दोनों दलों के खिलाफ क्या रूख अख्तियार करें। यह स्थिति तब है जबकि बसपा और सपा नेता लगातार कांग्रेस पर हमलवार हैं। ऐसा लगता है कि कांग्रेस चुनाव जीतने से पहले ही सरकार कैसे बनेगी, इस पर ज्यादा मंथन कर रही है। कांग्रेस आलाकमान का यह रवैया कार्यकर्ताओं और नेताओं में निराशा का भाव पैदा कर रहा है। बात आगे बढ़ाई जाए तो समस्या इसी मोर्चे तक सीमित नहीं है। एक ओर जहां अन्य दल चुनाव के लिए बिसात बिछा रहे हैं, वहीं कांग्रेस संगठन को कैसे मजबूत किया जाए इसमें उलझी हुई है। ऐन चुनाव से पहले पिछड़ों को लुभाने के लिए उसके द्वारा पिछड़ा वर्ग विभाग संगठन में विस्तार के साथ बदलाव भी किया जा रहा है। दावा यह है कि एक सप्ताह के भीतर विभाग के प्रदेश संयोजक की नियुक्ति के साथ कमेटी गठित कर ली जाएगी। जिला व ब्लाक इकाइयों के गठन की औपचारिकता 31 जनवरी तक पूरी कर ली जाएगी। प्रदेश के एक लाख से अधिक गांवों में कमेटियां गठित होंगी और प्रधान नामित किया जाएगा। कांग्रेस के रणनीतिकारों द्वारा पिछड़ा वर्ग विभाग संगठन के माध्यम से सैनी, निषाद, कुर्मी कश्यप, कुशवाहा व लोधी जैसी जातियों को जोडने पर फोकस किए जाने की बात कही जा रही है।

पिछड़ों को लुभाने के लिये ही कांग्रेस पिछड़ा वर्ग समाज की महारैली मार्च के प्रथम सप्ताह में कराई जा रही है। महारैली से पहले जिला स्तर पर भी सम्मेलन कराए जाएंगे। उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी की रैलियां कामयाब बनाने में पिछड़ा वर्ग विभाग अहम भूमिका निभाए, इसके लिये जिला व ब्लाक इकाइयों के कामकाज की नियमित समीक्षा होगी। पिछड़ा वर्ग के वोटरों को लुभाने के लिए कांग्रेस ने नए सिरे से तैयारी शुरू की है। योजना है कि प्रदेश के सभी गांवों में पिछड़ा वर्ग का एक प्रतिनिधि तैनात किया जाएगा। उसे 'ग्राम प्रधान' नाम दिया जाएगा। एक महीने तक गांवों में पिछड़ों के बीच काम करने के बाद मार्च में फीडबैक के लिए सम्मेलन किया जाएगा। सपा−बसपा से गठबंधन के रास्ते बंद होते ही कांग्रेस पूरी ताकत से चुनावी तैयारी में जुट गई है। उसके द्वारा सभी 80 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की बात की जा रही है। इसी क्रम में पिछड़ा वर्ग को जोडने के लिए संगठनात्मक ढांचे में बड़े बदलाव की तैयारी है। ग्रामों में भी पिछड़ा वर्ग विभाग की कमेटी गठित करके प्रधान तैनात किया जाएगा। विधानसभा चुनाव के बाद से पस्त पड़े संगठन की सक्रियता लोकसभा चुनाव की आहट होते ही बढ़ी है। पिछड़ा वर्ग को कांग्रेस से जोडने के अभियान की निगरानी राष्ट्रीय कोआर्डिनेटर अनिल सैनी संभाले हुए हैं। सैनी का दावा है कि राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के चुनाव नतीजों से सिद्ध हुआ पिछड़ा वर्ग तेजी से कांग्रेस की ओर लौट रहा है।

गौरतलब हो, बसपा−सपा से गठबंधन की उम्मीद खत्म होने के बाद कांग्रेस ने राहुल गांधी की रैलियों के कार्यक्रम को नए सिरे से बनाया है। राहुल की प्रदेश में प्रस्तावित एक दर्जन रैलियों की शुरुआत लखनऊ से होगी। जल्द ही रैली की तारीख फाइनल कर ली जाएगी। यूपी कांग्रेस के लिये योंहि नहीं महत्वपूर्ण है। कांग्रेस ने यहां से देश को भारत और पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के रूप में तीन−तीन प्रधानमंत्री दिए थे। यूपी की फूलपुर संसदीस सीट से 1952, 1957 और 1962 में जवाहरलाल नेहरू ने लोकसभा चुनाव जीता था। नेहरू का 1964 में अपनी मृत्यु तक इस सीट पर कब्जा रहा। 1967 में उनकी बहन विजयलक्ष्मी पंडित इस सीट पर काबिज रहीं। वहीं रायबरेली सीट से इंदिरा गांधी के पति फिरोज गांधी सांसद बने थे। बाद में उनकी बहू और राजीव गांधी की पत्नी सोनिया गांधी ने 2004 में यह सीट जीती। 2009 और वर्तमान में 2014 के चुनावों के बाद भी यह सीट उन्हीं के पास है। अमेठी सीट भी नेहरू−गांधी परिवार के पास है।

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1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए लोकसभा चुनाव में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस को यूपी से भारी बहुमत मिला था। उस वक्त 85 सीटों (तब उत्तराखंड यूपी का ही हिस्सा था) पर लड़ने वाली देश की इस सबसे पुरानी पार्टी को 83 सीटें मिली थीं। तब कांग्रेस को सबसे ज्यादा लोकसभा सीटें वाले इस राज्य में 51.03 फीसद वोट मिले थे। 1984 के बाद उत्तर प्रदेश में लगातार कांग्रेस का जनाधार गिरा है। 2014 के लोकसभा चुनावों में इसका वोट 07 प्रतिशत पर सिमट कर रह गया था। सबसे खराब प्रदर्शन करते हुए कांग्रेस सोनिया और राहुल की ही लोकसभा सीट बचा पाई थी। प्रदेश में सपा−बसपा की ताकत बढ़ने के बाद पिछले तीन दशकों में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार नहीं बन पाई है। एक समय था जब उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की पकड़ बहुत मजबूत थी। लेकिन राम मनोहर लोहिया आंदोलन, मंडल आयोग और भाजपा र्की हिंदुत्व नीति ने राज्य में इस पार्टी का जनाधार खत्म कर दिया। राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी को उत्तर प्रदेश में खोई हुई साख वापस लौटाने की है तो दूसरी तरफ कई जिलों में कोई कमेटी नहीं होने से पार्टी तंत्र खस्ताहाल है। मतदाताओं−कार्यकर्ताओं पर समान रूप से पार्टी की पकड़ ढीली है।

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वैसे कुछ जानकार कांग्रेस के अकेले चुनाव लड़ने को उसकी आगे की सेहत में सुधार के लिए अच्छा बता रहे हैं। ऐसे लोगों का दावा है कि उत्तर प्रदेश में अगर कांग्रेस अकेले चुनाव मैदान में उतरती है तो वह करीब दो दर्जन सीटों पर सीधे जीत दर्ज करने का दमखम रखती है। इसकी वजह 2009 के लोकसभा चुनाव के नतीजे हैं। तब कांग्रेस ने जोरदार प्रदर्शन करते हुए अकेले दम पर 21 सीटें तो सपा ने 23 और बसपा ने 20 सीटें हासिल की थीं, जबकि बीजेपी को 10 सीटें मिली थीं, लेकिन 2014 लोकसभा चुनावों में मोदी लहर ने बीजेपी को 71 के जादुई आंकड़े तक उठाकर ला खड़ा किया। बसपा एक सीट न जीत सकी, वहीं समाजवादी पार्टी महज 5 और कांग्रेस दो सीटों पर सिमट गई। आंकड़े बताते हैं कि 2014 में मोदी लहर में भी कांग्रेस ने प्रदेश की दो दर्जन सीटों पर वोटिंग प्रतिशत में सम्मानजनक स्थित हिासिल की थी। इसमें भी करीब 6 सीटों पर पार्टी ने जोरदार प्रदर्शन करते हुए बीजेपी को तगड़ी चुनौती दी, हालांकि जीत उसे नसीब न हो सकी। अब तीन राज्यों में मिली जीत के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं को नई संजीवनी तो मिली है, लेकिन 2017 की यादें भी उन्हें डराती रहती हैं। परंतु फिर उसमें 2009 के लोकसभा चुनाव में मिली जीत विश्वास पैदा कर देती है जब राहुल की रहनुमाई में वह 23 सीटें जीती थी।

- अजय कुमार

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