Prajatantra: कांग्रेस ने MP चुनाव में चला Bihar और Karnataka वाला दांव, क्या मिल पाएगी सत्ता?

By अंकित सिंह | Aug 22, 2023

मध्य प्रदेश में इस साल विधानसभा के चुनाव होने हैं। मध्यप्रदेश में कांग्रेस और भाजपा के बीच जबरदस्त भिड़ंत देखने को मिलेगी। दोनों दलों की ओर से जनता को अपने पक्ष में करने की कोशिश की जा रही है। इन सब के बीच कांग्रेस लगातार मध्यप्रदेश में कर्नाटक वाली दांव खेल रही है। साथ ही साथ मध्यप्रदेश में उसने जातिगत जनगणना का भी मुद्दा उठा दिया है। 

 

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खडगे ने क्या कहा

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने मंगलवार को कहा कि राज्य में विधानसभा चुनाव जीतने के बाद पार्टी मध्य प्रदेश में जाति जनगणना कराएगी। वह एमपी के बुंदेलखंड क्षेत्र के सागर में एक सार्वजनिक रैली को संबोधित कर रहे थे। चुनावी राज्य मध्य प्रदेश में खड़गे का संबोधन कांग्रेस के लिए कई मायनों में महत्व रखता है। इसके अलावा खड़गे ने कहा कि मैं वादा करता हूं कि जब कांग्रेस सत्ता में आएगी तो किसानों को कर्ज से मुक्ति मिलेगी। LPG गैस सिलेंडर 500 रुपए में मिलेगा। महिलाओं को 1500 रुपए प्रति माह मिलेंगे। सरकारी कर्मियों के लिए पुरानी पेंशन योजना लागू की जाएगी। 100 यूनिट तक बिजली बिल माफ होगा। इसके साथ ही खड़गे ने आगामी मध्य प्रदेश चुनाव में पार्टी के सत्ता में आने पर संत रविदास के नाम पर एक कॉलेज बनाने की घोषणा की।


केंद्र में दलित

मध्यप्रदेश में दलितों को लेकर राजनीति जबरदस्त तरीके से जारी है। केंद्र में संत रविदास भी है। दलितों के लिए कवि संत रविदास भगवान का दर्जा रखते हैं। हाल में ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सागर जिले में संत रविदास के 100 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाले मंदिर सह स्मारक के निर्माण के लिए भूमि पूजन किया था। अब यही कारण है कि कांग्रेस ने दलितों को साधने के लिए संत रविदास के नाम पर कॉलेज बनाने की घोषणा की। कांग्रेस ने तो यह भी कह दिया कि बीजेपी मध्यप्रदेश में रविदास मंदिर बनाने का वादा करती है और दिल्ली में 2019 में संत रविदास जी का मंदिर बुलडोजर लगाकर तोड़ देती है। कुल मिलाकर देखें तो रविदास के बहाने दोनों राजनीतिक दलों के लिए केंद्र में दलित मतदाता है। देश में मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा दलित और आदिवासी वोटर हैं। यहां सबसे ज्यादा आरक्षित सीटें हैं। 84 विधानसभा सीटें आदिवासी बाहुल्य हैं। यहीं कारण है कि कांग्रेस उन्हें साधने में जुटी हुई हैं। 


जाति जनगणना की बात क्यों

मध्यप्रदेश की बात करें तो 61 सीटों पर चुनाव के दौरान ओबीसी काफी मायने रखते हैं। मध्यप्रदेश में पिछले 4 साल से ओबीसी आरक्षण को 14 फ़ीसदी से बढ़ाकर 27 फ़ीसदी किया गया है। हालंकि, इसका श्रेय बीजेपी और कांग्रेस दोनों लेना चाहती है। कर्नाटक चुनाव के दौरान राहुल गांधी ने जातीय गणना की बात की थी। कर्नाटक में कांग्रेस को इससे फायदा भी हुआ था। यही कारण है कि अब मध्यप्रदेश में यह मामला मुद्दा बनता दिखाई दे रहा है। मध्यप्रदेश में देखा जाए तो आदिवासी और दलित वोट कांग्रेस को मिलता रहा है। लेकिन ओबीसी का वर्ग भाजपा के साथ खड़ा रहा है। अब तक मध्य प्रदेश में भाजपा के चेहरे रहे बाबूलाल गौर, उमा भारती और अब शिवराज सिंह चौहान ओबीसी वर्ग से ही आते हैं। मध्यप्रदेश में 2018 में कांग्रेस ने सामान्य सीटों पर 40 फ़ीसदी उम्मीदवार ओबीसी उतारे थे जबकि बीजेपी ने 39 फ़ीसदी उम्मीदवारों को उतारा था। मुरैना, भिंड, दतिया, शिवपुरी, अशोकनगर, सागर, छतरपुर, टीकमगढ़, निवाड़ी, पन्ना, सतना, रीवा और सिंगरौली ऐसे जिले हैं जहां ओबीसी आबादी सबसे ज्यादा है। ओबीसी का 61 सीटों पर सीधा असर रहता है जिनमें से 40 पर भाजपा का कब्जा है वही 19 सीटें कांग्रेस की झोली में है। 


अब वादों की बात

चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस की ओर से गारंटी तो दी जा रही है। लेकिन कांग्रेस ने कर्नाटक में जिस तरीके की परिस्थितियां उत्पन्न हुई, उससे सबक नहीं लिया। दरअसल, कर्नाटक में सत्ता में आने के बाद उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने एक ऐसा बयान दिया जिसके बाद कांग्रेस की गारंटी पर चर्चा तेज हो गई थी। डीके शिवकुमार ने साफ तौर पर कहा था कि कांग्रेस सरकार इस साल ज्यादा विकास नहीं कर सकती। डीके शिवकुमार का मकसद नाराज नेताओं को 5 गारंटियों को लागू करने में आ रही वित्तीय बाधाओं को समझाना था। उन्होंने साफ तौर पर कह दिया कि अगले साल चुनाव होने हैं। ऐसे में कांग्रेस द्वारा दी गई 5 गारंटियों को पूरा करना है। इसलिए 1 साल तक विधायक अनुदान की मांग ना करें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे मुद्दा बनाते हुए लोगों को इन गारंटिों से सावधान रहने को कहा। हालांकि, कांग्रेस लगातार मध्यप्रदेश में इस बात का ऐलान कर रही है। 

 

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नेता राजनीति में खुद को जीवंत रखने और सत्ता में आने के लिए तरह-तरह के वादे करते रहते हैं। उन वादों को वह कैसे पूरा करेंगे और इससे राज्य के विकास पर कितना असर पड़ेंगा, इसके बारे में उनकी ओर से कुछ भी नहीं बताया जाता। कई बार वर्तमान की राहत भविष्य को अंधकार में ले जाता है। जनता इस बात को अच्छी तरीके से समझती हैं और शायद उसी के आधार पर अपना फैसला भी लेती है। यही तो प्रजातंत्र है।

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