विपक्षी एकता के लिए कांग्रेस ने कर दिया दिल्ली, पंजाब और बंगाल में अपनी पार्टी के हितों का बलिदान

By संतोष पाठक | Jul 18, 2023

पटना में विपक्षी दलों की बैठक में किए गए अपने वायदे को पूरा करते हुए बेंगलुरु में होने वाली विपक्षी दलों की दूसरी बैठक से पहले ही कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने विपक्षी दलों की एकता के लिए दिल्ली, पंजाब और पश्चिम बंगाल में कांग्रेस पार्टी के हितों का बलिदान कर दिया है, लेकिन अब बड़ा सवाल यही खड़ा हो रहा है कि क्या आम आदमी पार्टी सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस यानी राहुल गांधी के हितों का खयाल रखेंगे या नहीं ? सवाल यह भी खड़ा हो रहा है कि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को लगातार पीछे हटने की राय देने वाली ममता बनर्जी क्या अब अपने राज्य में कांग्रेस के हितों का ख्याल रखेंगी ? सवाल यह भी खड़ा हो रहा है कि क्या ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल विपक्षी दलों की एकता के बाद बनने वाले गठबंधन का नेतृत्व करने के मामले में कांग्रेस और राहुल गांधी के हितों का ख्याल रखेंगे ? क्या इनके बलिदान का मान रखेंगे ?


दरअसल, कांग्रेस के दिल्ली, पंजाब और पश्चिम बंगाल में बलिदान का यह मुद्दा इसलिए खड़ा हुआ क्योंकि कांग्रेस के दिल्ली प्रदेश के नेता यह कतई नहीं चाहते थे कि कांग्रेस आम आदमी पार्टी के साथ खड़ी नजर आए। भले ही वह मुद्दा दिल्ली सरकार के अधिकारों से जुड़े अध्यादेश का ही क्यों ना हो। यहां तक कि पंजाब में पिछले चुनाव में हार कर सत्ता से बाहर होने के बावजूद कांग्रेस के स्थानीय नेता पंजाब में पुरजोर ताकत से आम आदमी पार्टी की भगवंत मान सरकार के खिलाफ लड़ने का दावा कर रहे थे और इसलिए पंजाब कांग्रेस इकाई का भी यही कहना था कि मुद्दा चाहे कोई भी हो कांग्रेस को आम आदमी पार्टी का साथ नहीं देना चाहिए, अरविंद केजरीवाल का साथ नहीं देना चाहिए और कतई नहीं देना चाहिए। लेकिन अपने नेताओं की मांग और आम आदमी पार्टी के प्रति विरोध की भावना को दरकिनार करते हुए विपक्षी एकता के नाम पर कांग्रेस आलाकमान ने दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस के हितों के विपरीत जाकर दिल्ली सरकार के अधिकारों को लेकर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा लाए गए अध्यादेश का विरोध करने यानी अरविंद केजरीवाल का साथ देने का ऐलान कर दिया।

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वहीं पश्चिम बंगाल में भी कांग्रेस के बड़े नेता अधीर रंजन चौधरी ने लगातार तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। अधीर रंजन चौधरी भी लगातार यही कहते रहे हैं कि ममता बनर्जी के साथ समझौता करने का कोई सवाल नहीं उठता। लेकिन चूंकि मसला विपक्षी एकता का है इसलिए कांग्रेस ने अपने ही वरिष्ठ नेताओं और खासकर उन नेता की बात को नकार दिया जिन्हें कांग्रेस ने लोकसभा में अपने संसदीय दल का नेता बना रखा है। अधीर रंजन चौधरी के कड़े रुख के बावजूद कांग्रेस आलाकमान ने ममता बनर्जी के साथ खड़े होने का फैसला कर लिया है और शायद यही वजह है कि पश्चिम बंगाल में हाल ही में हुए पंचायत चुनाव के दौरान मारे गए कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मुद्दा राहुल गांधी द्वारा नहीं उठाए जाने पर भाजपा लगातार कांग्रेस आलाकमान को घेर रही है।


यह फैसला कर अब सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने गेंद अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी के पाले में डाल दी है। कांग्रेस 2019 के पिछले लोकसभा चुनाव में लोक सभा की 543 सीटों में से 421 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। कांग्रेस आलाकमान इस बार भी 400 सीटों के आसपास चुनाव लड़ने का मन बनाए हुए है, लेकिन विपक्षी एकता के नाम पर अगर उसे कुछ सीटें कुर्बान भी करनी पड़े तो कांग्रेस ऐसा करने को तैयार है। हालांकि इसके बावजूद पार्टी यह कतई नहीं चाहेगी कि वह किसी भी सूरत में 370 सीट से कम पर चुनाव लड़े। ऐसे में जाहिर है कि अब कांग्रेस यह उम्मीद करेगी कि अरविंद केजरीवाल दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस को लोकसभा की अच्छी-खासी सीटें दें और यही उम्मीद पार्टी पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी से भी रखेगी।


अगर विपक्षी दल सीट शेयरिंग के आधार पर भाजपा के खिलाफ एकजुट होकर चुनाव लड़ने का फैसला करती है तो कांग्रेस यह चाहेगी कि केजरीवाल राज्य संभाले लेकिन लोकसभा में उन्हें ज्यादा सीटें दें। कांग्रेस यह चाहेगी कि दिल्ली की सात लोकसभा सीटों में पार्टी के खाते में कम से कम 4 सीटें जरूर आएं। पंजाब में भी लोक सभा की कुल 13 सीटों में से कांग्रेस 7-9 से कम सीटों पर लड़ने को तैयार नहीं होगी। पश्चिम बंगाल में भले ही कांग्रेस के लोक सभा सांसदों की संख्या वर्तमान में 2 ही हो लेकिन अगर ममता बनर्जी मिल कर चुनाव लड़ने का फैसला करती हैं तो पार्टी राज्य की कुल 42 लोकसभा सीटों में से 7-10 सीटों पर चुनाव जरूर लड़ना चाहेगी। 


कांग्रेस अगर दिल्ली, पंजाब और पश्चिम बंगाल में गठबंधन की गुत्थी सुलझा पाने में कामयाब हो जाती है तो फिर पार्टी इसी आधार पर उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव और बिहार में नीतीश कुमार-लालू यादव से भी ज्यादा से ज्यादा सीटें लेने की कोशिश करेगी। हालांकि क्षेत्रीय क्षत्रपों के रवैये को देखते हुए सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे की त्रिमूर्ति के लिए यह बहुत चैलेंजिंग टॉस्क रहने जा रहा है।


-संतोष पाठक

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।)

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