कांग्रेस ने पंजाब में जो दाँव चला, अब वह राज्य की अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ने लगा है

By राकेश सैन | Oct 30, 2020

मुल्ला जी ने नदी में तैरते हुए रीछ को कंबल समझ कर बगलों में भर लिया, अब मुल्ला जी तो छोड़े पर मुआ रीछ न छोड़े। यही हालत है पंजाब सरकार की, राजनीतिक लाभ के लिए केंद्र में कृषि सुधार कानूनों के खिलाफ किसान आंदोलन को खाद पानी देने वाली मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार फंसी-फंसी-सी नजर आने लगी है। पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय जहां राज्य सरकार को फटकार पर फटकार लगा रहा है वहीं राज्य में कृषि, व्यापार, उद्योग, छोटे दुकानदारों, दिहाड़ी दारों, मजदूरों का बुरा हाल हो रहा है। आम उपभोग की वस्तुओं के दाम आसमान छूते जा रहे हैं।

सबसे रोचक बात तो यह है कि किसान आंदोलन का सबसे बुरा असर खुद किसानों पर ही पड़ता दिख रहा है। पंजाब के गुरदासपुर व अमृतसर सहित कई जिलों में किसान बासमती का प्रमुखता से उत्पादन करते हैं। पिछली बार राज्य में 25 लाख टन बासमती की पैदावार हुई जिसकी कीमत 6500 करोड़ रूपये बनती है। राज्य के निर्यातक बासमती को विदेशों में निर्यात करते हैं। अबकी बार मालगाड़ियां रुकने से निर्यात का यह काम बिल्कुल बंद पड़ा है। बासमती की जो किस्में आरएस-10, सगोधा, सरबती, सोना मसूरी आदि पंजाब में पैदा नहीं होतीं निर्यातक उन्हें पड़ोसी राज्यों से मंगवाते हैं और उसके बाद यहां से निर्यात करते हैं। अबकी बार बाहर से आ रही बासमती को यह कह कर रोका जा रहा है कि पड़ोसी राज्यों के किसान व व्यापारी वहां से सस्ता धान खरीद कर पंजाब में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान बेच रहे हैं। पंजाब के बासमती निर्यातकों ने इसके खिलाफ हड़ताल भी शुरू कर दी है। मालगाड़ियां यूं ही बंद रहीं तो तापघरों में कोयला खत्म होने की स्थिति आ सकती है और कई तापघरों में तो कुछ दिनों का ही कोयले का भंडार शेष बचा है। राज्य सरकार किसी न किसी तरह सैंट्रल ग्रिड से बिजली लेकर काम चला रही है परंतु इस व्यवस्था को लंबे समय तक नहीं चलाया जा सकता।

किसानों के आंदोलन के चलते उद्योग जगत की रीढ़ टूटती जा रही है। कच्चे माल की आपूर्ति में देरी से उद्यमियों पर भारी जुर्माने का संकट मंडरा रहा है। आयातित कच्चे माल पर आधारित उद्योगों में उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। चैंबर आफ इंडस्ट्रियल एंड कमर्शियल अंडरटेकिंग्स की बैठक में यह मुद्दा प्रमुखता से उठा। उद्यमियों ने साफ किया कि उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। आयात-निर्यात बंद हो गया है। कच्चे माल की भारी कमी हो रही है। इकाइयां बंद होने की कगार पर हैं। दूसरी तरफ शिपिंग कंपनियां भी उद्यमियों पर शिकंजा कसने की तैयारी में हैं। मालगाड़ियां न चलने से कंटेनर डिपो में कामकाज नहीं हो रहा है। उद्यमी गुजरात व मुंबई पोर्ट तक सड़क मार्ग से माल भेजने को मजबूर हैं। ढुलाई की लागत दोगुना हो रही है। रेलें बंद होने के कारण जालंधर में आयात-निर्यात ठप होने से औद्योगिक उत्पादन 50 प्रतिशत कम हो गया है। जालंधर में लगभग तीन हजार कंटेनर फंसे हैं। इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के डिप्टी रीजनल डायरेक्टर उपिंदर सिंह कहते हैं कि पहले कोरोना की वजह से इंडस्ट्री बंद रही और अब रेल रोको आंदोलन की वजह से कच्चा माल नहीं आ रहा है। व्यापारियों पर दोहरी मार पड़ रही है। चमड़ा उद्योग पूरी तरह बंद है। हैंड टूल निर्यात का भी सारा माल अटक गया है।

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किसानों के भड़का कर राजनीतिक लाभ लेने का कांग्रेस सरकार का दांव उलटा पड़ना शुरू हो चुका है। मुख्यमंत्री को उम्मीद थी कि वे राजनीतिक तिकड़मबाजी कर मौके का लाभ उठा लेंगे। उन्होंने इसका भरपूर प्रयास भी किया, कांग्रेस पार्टी ने किसानों के बंद का न केवल पूरा समर्थन किया बल्कि इसके लिए सरकारी ताकत भी झोंक दी। इसके लिए विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया गया और केंद्रीय कृषि कानूनों में संशोधन पेश कर नए कानूनों के प्रस्ताव पास करवाए गए। मुख्यमंत्री को उम्मीद थी कि इसके बाद धरनों पर बैठे किसान अपने घरों को लौट जाएंगे परंतु ऐसा नहीं हुआ। राज्य में अभी भी किसानों का धरना व कई स्थानों पर रेल रोको आंदोलन जारी है। इससे राज्य की आर्थिकी चरमराने की ओर बढ़ने लगी है।

दूसरी ओर किसान आंदलोनों में जुटने वाले चेहरों को लेकर राज्य की जनता के भी कान खड़े होते जा रहे हैं और इस आंदोलन को जनसमर्थन निरंतर कम हो रहा है। किसान आंदोलनों के दौरान कई स्थानों पर खालिस्तानी झंडे फहराने व खालिस्तान के पक्ष में भाषणबाजी के भी समाचार मिल रहे हैं। केवल इतना ही नहीं आंदोलनों के मंचों पर जुटने वाले नक्सलवादी नेताओं से जनता सतर्क होती जा रही है। लोग मानने लगे हैं कि किसानों की आड़ में उग्र वामपंथ अपनी जड़ें तलाशता दिख रहा है। रोज-रोज बढ़ रही परेशानियों ने आम लोगों में आंदोलन के प्रति आक्रोश बढ़ता दिख रहा है जिसका खमियाजा सत्तारुढ़ कांग्रेस पार्टी को उठाना पड़ सकता है। ऐसा नहीं है कि मुख्यमंत्री इस खतरे को पहचानते नहीं, अगर ऐसा न होता तो वे किसानों को आंदोलन वापिस लेने की अपील न कर रहे होते परंतु बात वहीं आकर खत्म होती है कि मुल्ला जी तो छोड़ना चाहें पर रीछ न छोड़े।

-राकेश सैन

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