प्रकृति का संरक्षण-सुरक्षित भविष्य, धरती की हरियाली, हमारी जिम्मेदारी: मगनभाई पटेल

By प्रेस विज्ञप्ति | Jun 16, 2026

हाल ही मे गुजरात के जानेमाने उद्योगपति, समाजसेवी एव ऑल इण्डिया MSME फेडरेशन के अध्यक्ष मगनभाई पटेल ने अपना जन्मदिन अहमदाबाद के चांगोदर इलाके में स्थित श्रीमती एन.एम्.पाडलिया फार्मसी कॉलेज में अपने परिवारजनो एव कॉलेज के छात्रों के साथ कॉलेज में वृक्षारोपण कर के मनाया। इस अवसर पर मगनभाई पटेल की धर्मपत्नी शांताबेन मगनभाई पटेल, बहु दिप्तीबेन जतिनभाई पटेल और उनकी बेटी ज्योत्सनाबेन पटेल विशेष उपस्थित रहे थे। इस कॉलेज के चेरमेन एव मेनेजिंग ट्रस्टी है मगनभाई पटेलने विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्रभाई यादव को एक पत्र द्वारा भूमि प्रदूषण, वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण की वर्तमान परिस्थिति के ऊपर अपने महत्त्वपूर्ण सुझाव भी दिए।

इस गंभीर समस्या के प्रति दुनिया भर के लोगों को जागरूक करने के लिए हर साल 5 जून को 'विश्व पर्यावरण दिवस' मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ (United Nations) द्वारा वर्ष 1972 में स्वीडन के स्टॉकहोम शहर में मानव पर्यावरण विषय पर पहला वैश्विक सम्मेलन आयोजित किया गया था। इस सम्मेलन में पर्यावरण के संरक्षण को लेकर महत्वपूर्ण चर्चाएँ हुईं, जिसके बाद संयुक्त राष्ट्रसंघ ने 5 जून को 'विश्व पर्यावरण दिवस' के रूप में मनाने का निर्णय लिया। वर्ष 1974 से विश्व पर्यावरण दिवस को आधिकारिक तौर पर मनाना शुरू किया गया। आज दुनिया के 150 से अधिक देश विभिन्न कार्यक्रमों, अभियानों और जागरूकता गतिविधियों के माध्यम से इस दिन को मनाते हैं। विश्व अब ग्रीन युग और ग्रीन फ्यूचर की ओर बढ़ने के लिए बहुत सतर्क है और धीरे-धीरे कदम उठाने का प्रयास कर रहा है। भारत भी ग्रीन ग्रोथ पर व्यापक रूप से काम कर रहा है और गुजरात ने कई साल पहले इस दिशा में तेजी से कदम उठाए हैं।

मगनभाई पटेल ने आगे कहा की आज पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाले विभिन्न प्रदूषणों में वाहनों का धुआँ, फैक्ट्रियों से निकलनेवाली जहरीली गैस और कचरा जलाने जैसी गतिविधियों से वातावरण बहुत अधिक प्रदूषित हो गया है। साथ ही, उद्योगों का केमिकल युक्त पानी नदियों में छोड़ने से और प्लास्टिक के कचरे से जलाशय, समुद्र, नदियाँ और तालाब भी दूषित हुए हैं, जबकि खेती में रासायनिक खाद,कीटनाशक दवाइया और पेस्टिसाइड्स एव प्लास्टिक के अत्यधिक उपयोग से भूमि प्रदूषित हुई है। 

1.क्लाइमेट चेंज, ग्लोबल वार्मिंग और वायु प्रदूषण:

वायु प्रदूषण आज के समय की सबसे गंभीर समस्याओं में से एक है। पहले के समय की तुलना में अब हवा की गुणवत्ता में बहुत बड़ा अंतर देखने को मिलता है। एक अनुमान के अनुसार, वर्ष 1950 से 1980 के दौरान भारत का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 20 से 50 के आसपास रहता था, जिसे बेहद स्वच्छ और स्वास्थ्यवर्धक माना जाता था। उस समय रात के समय हजारों की संख्या में तारे नग्न आँखों से देखे जा सकते थे, साथ ही पूर्णिमा के दिन जब चंद्रमा अपने पूर्ण रूप में होता था, तब सुई में धागा भी पिरोया जा सकता था। इसका कारण यह था कि वाहन और उद्योगों के सीमित होने से हवा में सूक्ष्म कण की मात्रा नगण्य थी। जबकि आज अधिकांश भारतीय शहरों में AQI 300 से 500 तक बढ़ गया है, जो कि बेहद चिंताजनक और खतरनाक है। दिल्ली जैसे मेट्रो शहरों में तो यह अक्सर 500 या उससे भी अधिक हो जाता है, जिसका नागरिकों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ता है, परिणामस्वरूप सांस से संबंधित बीमारियों में भी बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। एक आंकड़े के अनुसार, वर्ष 1998 से 2021 के दौरान भारत में वायु प्रदूषण में लगभग 67% से भी अधिक की वृद्धि हुई है। वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), मीथेन (CH4) और नाइट्रस ऑक्साइड की मात्रा बढ़ने से पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ रहा है,जिसके परिणामस्वरूप उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों पर बर्फ पिघल रही है। इसके कारण समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है और ऋतुचक्र (मौसम चक्र) में अनियमितता आने लगी है। इसके अलावा, वाहनों की संख्या में हुई विस्फोटक वृद्धि वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण है, जो नाइट्रोजन ऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी जहरीली गैसें छोड़ते हैं। औद्योगिक इकाइयों की फैक्ट्रियों और पावर प्लांट्स से निकलने वाला धुआं और रासायनिक कण हवा में मिल जाते हैं। उत्तर भारत में सर्दियों के दौरान कृषि अवशेष यानी पराली (Stubble) जलाने से प्रदूषण करीब 60% तक बढ़ जाता है, साथ ही शहरों में चल रहे निरंतर निर्माण कार्य (कन्स्ट्रक्शन) के कारण हवा में PM 2.5 और PM 10 जैसे अति सूक्ष्म कणों की मात्रा बढ़ गई है।

वायु प्रदूषण रोकने के उपाय :

वायु प्रदूषण रोकने के लिए देश के नागरिकों को जहाँ तक संभव हो पब्लिक ट्रांसपोर्ट (सार्वजनिक परिवहन), साइकिल या इलेक्ट्रिक वाहनों का उपयोग करना चाहिए। जब बाहर प्रदूषण अधिक हो, तब मास्क (N95) पहनना चाहिए और आँखों की सुरक्षा के लिए सनग्लासेस का उपयोग करना चाहिए। घर के आसपास अधिक से अधिक पेड़ लगाने चाहिए, जो प्राकृतिक एयर प्यूरीफायर के रूप में काम करते हैं। सामूहिक और सरकारी स्तर पर मिशन LiFE जैसे अभियानों से जुड़कर पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली अपनानी चाहिए। खुले में कचरा जलाने से बचना चाहिए, साथ ही ऊर्जा के लिए सोलर या विंड एनर्जी जैसे स्वच्छ विकल्पों को अपनाना चाहिए।

2. भूमि प्रदूषण:

भूमि प्रदूषण पृथ्वी की उर्वरता (उपजाऊपन) और मानव स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाली एक गंभीर समस्या है। समय के साथ मिट्टी की गुणवत्ता में आया बदलाव चिंताजनक है। वर्ष 1960-70 के दशक से पहले देश में 90% से अधिक खेती ऑर्गेनिक (जैविक), गोबर की खाद और प्राकृतिक तरीके से होती थी,जबकि आज भारत में हर साल 500 लाख टन से अधिक रासायनिक खादों का उपयोग होता है। पहले के समय में प्लास्टिक का उपयोग नगण्य था,जबकि आज भारत में प्रतिवर्ष लगभग 34 लाख टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है, जिसका बड़ा हिस्सा जमीन में दफन हो जाता है। पहले के समय में प्राकृतिक वनस्पतियों के कारण मिट्टी का कटाव (अपरदन) नियंत्रित था, जबकि आज भारत में लगभग 147 मिलियन हेक्टेयर भूमि विभिन्न प्रकार के कटाव और प्रदूषण से प्रभावित है। आज भारत के शहरों से हर दिन 1.50 लाख टन ठोस कचरा (सॉलिड वेस्ट) निकलता है, जो लैंडफिल साइटों पर जाकर जमीन को खराब करता है। यूरिया जैसे खतरनाक केमिकल फर्टिलाइजर्स (रासायनिक उर्वरकों) और अन्य कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी 'एसिडिक' (अम्लीय) या 'अल्कलाइन' (क्षारीय) हो जाती है। इसके कारण मिट्टी में रहने वाले केंचुए जैसे किसान-मित्र जीव नष्ट हो जाते हैं। केमिकल, टेक्सटाइल और फार्मास्युटिकल कंपनियों का ठोस कचरा जमीन में सीसा (Lead), पारा (Mercury) और आर्सेनिक जैसे जहरीले तत्व मिलाता है, जबकि ई-वेस्ट (E-Waste) यानी कि स्मार्टफोन, लैपटॉप और बैटरियों का कचरा भूमि प्रदूषण का एक बहुत बड़ा कारण बन रहा है। इनमें से निकलनेवाले केमिकल्स जमीन में रिसकर भूमिगत जल (भूगर्भ जल) को भी प्रदूषित करते हैं। इसके अलावा, जमीन में मिलनेवाले प्लास्टिक को विघटित (Decompose) होने में लगभग 400-500 वर्ष लगते हैं। इस अवधि के दौरान यह जमीन में पानी रिसने की प्रक्रिया को रोकता है। साथ ही, पेड़ कटने से मिट्टी की ऊपरी परत (Topsoil), जो सबसे अधिक उपजाऊ होती है, वह हवा और पानी के साथ बह जाती है।

भूमि प्रदूषण रोकने के उपाय :

रासायनिक खादों के स्थान पर 'गाय आधारित खेती' या प्राकृतिक खेती (ऑर्गेनिक फार्मिंग) अपनानी चाहिए अथवा एग्रोवेस्ट का उपयोग बढ़ाना चाहिए। एग्रोवेस्ट (कृषि अपशिष्ट) यानी किसानी खेती और पशुपालन जैसी गतिविधियों के दौरान उत्पन्न होनेवाला अतिरिक्त या अनुपयोगी पदार्थ। मुख्य फसल लेने के बाद खेत में या प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) के दौरान जो कचरा बचता है, उसे एग्रोवेस्ट कहा जाता है। एग्रोवेस्ट मुख्य रूप से खेती और कटाई के दौरान (क्रॉप रेजिड्यूज) फसल की कटाई या मड़ाई के बाद खेत में जो अवशेष बचते हैं, वे एग्रोवेस्ट का मुख्य हिस्सा होते हैं। गेहूँ, धान या मक्के के दाने निकालने के बाद बची हुई भूसी, पुआल या पराली, साथ ही कपास या तुवर जैसी फसलें काटने के बाद बचे हुए सूखे डंठल या टहनियाँ, मूँगफली, बाजरा या अन्य तिलहनों के दानों से अलग हुए छिलके,पशुओं का मलमूत्र,मिट्टी और गोबर से तैयार होनेवाली खाद एग्रोवेस्ट मानी जाती है। इसके अलावा वर्मी कम्पोस्ट (केंचुए की खाद) या हरी खाद (ग्रीन मैन्योर) का उपयोग बढ़ाना चाहिए। गोबर की खाद और जीवामृत का उपयोग मिट्टी को फिर से जीवित कर सकता है।

वेस्ट-टू-वेल्थ (Waste to Wealth) : शहरी कचरे से खाद बनाने की प्रक्रिया (कंपोस्टिंग) हर स्तर पर शुरू की जानी चाहिए। घर और फैक्ट्री के 'गीले' और 'सूखे' कचरे को अलग-अलग रखा जाना चाहिए। गीले कचरे से खाद बनाई जा सकती है और सूखे कचरे को रीसायकल (पुनर्चक्रण) कर दोबारा उपयोग में लाया जा सकता है। उद्योगों को अपना कचरा जमीन में डालने से पहले उसे शुद्ध (न्यूट्रलाइज) करना चाहिए ताकि जहरीले तत्व जमीन में न मिलें।

प्लास्टिक रीसाइक्लिंग : प्लास्टिक को जमीन में दफनाने के बजाय उसे रीसायकल करके सड़कें बनाने में या अन्य उद्योगों में इस्तेमाल किया जाना चाहिए। साथ ही, मिट्टी में मिल जानेवाले (बायोडिग्रेडेबल) पदार्थों के उपयोग पर जोर दिया जाना चाहिए।

फॉरेस्ट बफर जोन : नदी के किनारों और खेतों के चारों ओर पेड़ लगाए जाने चाहिए ताकि मिट्टी का कटाव (अपरदन) रुक सके। उद्योगों के लिए 'पोल्यूटर पेज़' (प्रदूषण फैलाने वाला जुर्माना भरे) सिद्धांत को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।

वृक्षारोपण : पेड़ों की जड़ें मिट्टी को जकड़ कर रखती हैं और मिट्टी के कटाव को रोकती हैं। भूमि की उर्वरता बढ़ाने के लिए घास और छोटे पौधे भी महत्वपूर्ण हैं। यदि भूमि प्रदूषण इसी गति से बढ़ता रहा, तो वर्ष 2050 तक पृथ्वी पर कृषि योग्य (खेतीलायक) भूमि में लगभग 50% तक की कमी हो सकती है।

3. जल प्रदूषण:

आज मानवीय गतिविधियों के कारण पृथ्वी पर मौजूद जल स्रोत दूषित हो गए हैं, जो जलचरों (जलीय जीवों) और मानव स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक हैं। समय बीतने के साथ भारत में पानी की गुणवत्ता में चिंताजनक बदलाव आया है।

वर्ष 1950-60 के दशक में प्रति व्यक्ति वार्षिक पानी की उपलब्धता लगभग 5,177 क्यूबिक मीटर थी। नदियों का पानी शुद्ध था और वह सीधे पीने योग्य माना जाता था। पानी इतना पारदर्शी था कि उसमें ₹1 का सिक्का डालने पर भी साफ दिखाई देता था। इसके अलावा, नदियों की मछलियाँ और अन्य जलीय जीव पानी के हानिकारक तत्वों को खा जाते थे, जिससे पानी की गुणवत्ता बहुत शुद्ध और पीने लायक बनी रहती थी। उस समय जल प्रदूषण केवल कुछ औद्योगिक क्षेत्रों तक ही सीमित था। आज वर्ष 2021 तक प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता घटकर लगभग 1,486 क्यूबिक मीटर हो गई है, यानी इसमें लगभग 71% की गिरावट दर्ज की गई है। भारत की सतह का लगभग 70% पानी उपयोग के लिए असुरक्षित है। सीपीसीबी (CPCB) की वर्ष 2022-23 की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग 296 से 311 नदी क्षेत्र (रिवर स्ट्रेच) प्रदूषित हैं। देश के शहरों में हर दिन लगभग 72,368 मिलियन लीटर (MLD) गंदा पानी पैदा होता है, जिसमें से केवल 44% को ही साफ (ट्रीट) किया जाता है।

शहरी क्षेत्रों में उत्पन्न होनेवाले गंदे पानी का लगभग 60% से अधिक हिस्सा बिना किसी ट्रीटमेंट (उपचार) के सीधे नदियों में बहा दिया जाता है। रासायनिक इकाइयों द्वारा सीसा (Lead), पारा (Mercury) और क्रोमियम जैसे जहरीले तत्व पानी में छोड़े जाते हैं। खेती में उपयोग होने वाले रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक बारिश के पानी के साथ मिलकर नदियों और तालाबों से होते हुए समुद्र में चले जाते हैं, जिससे समुद्री जीव-जंतु नष्ट हो जाते हैं। इसके अलावा, नदियों में कचरा फेंकने, मूर्ति विसर्जन और प्लास्टिक के उचित निपटान (Disposal) के अभाव के कारण भी जल प्रदूषण में लगातार बढ़ोतरी देखने को मिली है।

जल प्रदूषण रोकने के उपाय:

एसटीपी (Sewage Treatment Plant) की स्थापना: प्रत्येक शहर में गंदे पानी को शुद्ध करके नदियों में छोड़ने के लिए ट्रीटमेंट प्लांट होना अनिवार्य है। प्लास्टिक, तेल या अन्य रसायनों को सीधे गटर या जलाशयों में नहीं डालना चाहिए। रसोई या स्नान के पानी का उपयोग बगीचे में किया जा सके, ऐसा प्रबंध किया जाना चाहिए। भूमिगत जल स्तर को बढ़ाने के लिए वर्षा जल का संचयन (Rainwater Harvesting) किया जाना चाहिए। उद्योगों द्वारा होनेवाले प्रदूषण पर पीसीबी (प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड) जैसी संस्थाओं द्वारा सख्त निगरानी रखी जानी चाहिए।

हमारे आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्रभाई मोदीने हाल ही में गुजरात में आयोजित एक कार्यक्रम में विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर कहा कि गुजरात एक ऐसा राज्य है जिसकी सरकारने इस शताब्दी की शुरुआत में ही क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) के लिए एक अलग विभाग बनाया था। गुजरात देश का पहला राज्य था जिसने ऐसी व्यवस्था बनाई थी और गुजरात के पाटन के अपने चारणका गाँव में, भारत का पहला सोलर पार्क भी बनाया गया था। उस समय, यह एक प्रकार का तीर्थस्थल बन गया था और लोग दूर-दूर तक दिखने वाले इस विशाल सोलर प्लांट को देखने के लिए आते थे। उस समय गुजरात में जो कुछ भी हुआ,उससे पूरे देश को प्रेरणा मिली। आज भारत प्रकृति के साथ प्रगति के मंत्र 'अर्थव्यवस्था (Economy) और पर्यावरण (Ecology)' के साथ विकास कर रहा है।

श्री मगनभाई पटेलने बताया की आज हमारे देश में शहरों के गंदे पानी को ट्रीट (साफ) करके उद्योगों को प्रदान किया जाता है। जो लोग इस गंदे पानी का प्रबंधन (मैनेजमेंट) करते हैं, वे इस पानी से कमाई भी कर रहे हैं। पिछले 12 वर्षों से देश में कचरे से कंचन (वेस्ट टू वेल्थ) की दिशा में बड़े पैमाने पर गतिविधियाँ चल रही हैं। यह हमारे शहरों की स्वच्छता में और उन्हें हरा-भरा तथा स्वच्छ बनाने में बहुत मदद कर रहा है। हमारे देश में ग्रीन ग्रोथ के अन्य माध्यमों का विस्तार भी अभूतपूर्व गति से हो रहा है। देश के कुछ औद्योगिक क्षेत्र ग्रीन स्टील के उत्पादन के लिए भी जाने जाएंगे, यानी स्टील उत्पादन में ग्रीन एनर्जी (हरित ऊर्जा) का उपयोग किया जाएगा।

आज दुनिया अभूतपूर्व चुनौतियों के दौर से गुजर रही है। यह दशक दुनिया के लिए आपदाओं का दशक साबित हो रहा है। पहले कोरोना का बड़ा वैश्विक संकट आया, उसके बाद खाड़ी देशों की युद्ध जैसी स्थिति के कारण पैदा हुए बड़े ऊर्जा संकट ने पूरी दुनिया को अशांति में डाल दिया है। परिणामस्वरूप, दुनिया भर में पेट्रोल और अन्य ईंधनों की कीमतें लगातार घट-बढ़ रही हैं और गैस सप्लाई चेन टूट गई है।

भारत को आज रिफाइनिंग, सौर और पवन ऊर्जा में अपनी क्षमता को मजबूत करना चाहिए, जो देश के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकती है। आज भारत की नवीकरणीय (रिन्यूएबल) क्षमता 250 गीगावाट है। हमारे देश में, पहले हम कभी मेगावाट से आगे नहीं सोचते थे, आज हम गीगावाट के बारे में बात कर रहे हैं। आज जब हमारा देश ग्रीन हाइड्रोजन और ग्रीन अमोनिया जैसे क्षेत्रों में काम कर रहा है, तब जन-भागीदारी बहुत महत्वपूर्ण है। भारत ने पिछले 12 वर्षों में ऊर्जा क्षेत्र में जो क्षमता बनाई है, वह बेहद महत्वपूर्ण है। पहले, भारत में सौर ऊर्जा का उत्पादन नगण्य था। आज विश्व के शीर्ष पांच देशों में भारत का समावेश है और न केवल सौर ऊर्जा, बल्कि इथेनॉल सम्मिश्रण (ब्लेंडिंग) क्षमता में भी वृद्धि हुई है, रेलवे विद्युतीकरण तेज हुआ है, परमाणु ऊर्जा पर बहुत सुंदर काम हो रहा है। देश का पुराना बिजली ट्रांसमिशन नेटवर्क आधुनिक और विस्तृत हुआ है। गैस पाइपलाइन नेटवर्क का बड़े पैमाने पर विस्तार हुआ है, साथ ही बंदरगाहों (पोर्ट्स) की क्षमता में भी वृद्धि हुई है, जिससे अधिक पेट्रोलियम उत्पाद वहाँ पहुँच सके हैं और उन्हें संग्रहीत (स्टोर) किया जा रहा है।

भारत नकारात्मकता से बहुत आगे बढ़ चुका है। यह असीमित आशावाद का देश है। असाधारण आकांक्षाओं से भरा हुआ देश है। भारत के नागरिक सपनों से भरे हैं, संकल्पों से भरे हैं। लोगों को संकल्प को सिद्धि में बदलने के लिए प्रतिबद्ध होना होगा और जब भारत तथा पूरी दुनिया के लोग संकल्पबद्ध होंगे, तब देश हर लक्ष्य को प्राप्त कर सकेगा।

मगनभाई पटेल ने अपने वक्तव्य के अंत में कहा की हमारे आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्रभाई मोदी साहब तथा उनकी टीम के विकसित भारत के निर्माण के संकल्प को गति देने के लिए, प्रकृति के साथ प्रगति के उनके और उनकी टीम के प्रयासों का हम ऑल इंडिया एमएसएमई (MSME) फेडरेशन स्वागत करता हैं। साथ ही, विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर 'एक पेड़ माँ के नाम' अभियान से यदि देश का हर नागरिक जुड़ेगा, तो हम पर्यावरण को शुद्ध रखने की दिशा में आगे बढ़ सकेंगे और मनचाहे परिणाम निश्चित रूप से प्राप्त कर सकेंगे।

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