By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Nov 06, 2026
नयी दिल्ली, छह नवंबर प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने शुक्रवार को कहा कि संविधान एक निरंतर जिम्मेदारी है और इसके आदर्शों को जीवंत बनाने का महान कार्य एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सौंपा जाता है। भारत मंडपम में एससी, एसटी एवं ओबीसी एडवोकेट्स एसोसिएशन द्वारा भारत रत्न डॉ. बी.आर. आंबेडकर का जीवन, संघर्ष और संवैधानिक विरासत विषय पर आयोजित पहले राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने यह बात कही। उन्होंने कहा कि भारत के महान सपूत आंबेडकर असाधारण विद्वता के धनी और अडिग साहस वाले सुधारक थे, और उन्होंने अपने सबसे महत्वपूर्ण संघर्षों में से कई लड़ाइयां कानून के जरिये लड़ीं।
सीजेआई ने कहा कि उनका मानना है कि उन संघर्षों का सबसे स्थायी परिणाम देश का संविधान है। उन्होंने कहा, ‘‘मैंने हमेशा महसूस किया है कि संविधान एक निरंतर जिम्मेदारी है, क्योंकि जहां इसका पाठ (मूल रूप) पूर्ण है, वहीं इसके आदर्शों को जीवन देने का महान कार्य एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होता रहता है।’’ उन्होंने कहा कि आंबेडकर स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री बनने और प्रारूप समिति की अध्यक्षता करने से बहुत पहले, बार के एक ऐसे सदस्य थे जो मुकदमे के बोझ और न्याय के लिए लंबे इंतजार को अच्छी तरह समझते थे। सीजेआई ने कहा, ‘‘वह समझते थे कि शिक्षा स्वतंत्रता का पहला साधन है, क्योंकि यह काम करने का रास्ता खोलती है, सार्वजनिक जीवन में अपनी बात रखने का अधिकार देती है और अपने अधिकारों का दावा करने का आत्मविश्वास प्रदान करती है।’’ उन्होंने उल्लेखनीय दूरदर्शिता के साथ उस प्रावधान की पैरवी की, जिसने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाकर मौलिक अधिकारों को लागू कराने के अधिकार को स्वयं एक मौलिक अधिकार बना दिया, और संविधान सभा के समक्ष इसे संविधान की आत्मा बताया था।
सीजेआई ने कहा, ‘‘उस व्यक्ति के लिए जिसे अन्याय का सामना करना पड़ा है और जिसके पास जाने के लिए कोई अन्य ठिकाना नहीं है, ऐसा अधिकार जिस तक उसकी पहुंच नहीं है, जिसे समझ नहीं सकता, या जिसका दावा करने का खर्च नहीं उठा सकता, वह केवल कागजों पर ही एक अधिकार बनकर रह जाता है; और उसे कागज से निकालकर उस व्यक्ति तक पहुंचाना ही उनके (आंबेडकर के) काम का वह हिस्सा है, जो अब न्यायपालिका और बार (वकीलों) के जिम्मे आता है।’’ उन्होंने कहा कि आंबेडकर जानते थे कि अकेले अदालतें कभी भी समानता को एक जीवंत वास्तविकता नहीं बना सकतीं, क्योंकि लोकतंत्र के बारे में उनका दृष्टिकोण अदालत कक्ष से कहीं आगे तक फैला हुआ था। उन्होंने कहा कि आंबेडकर इस विश्वास को संविधान सभा में लेकर गए थे और अपने समापन भाषण में चेतावनी दी थी कि जब तक राजनीतिक लोकतंत्र के आधार में सामाजिक लोकतंत्र — यानी जीवन का एक ऐसा तरीका जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को जीवन के सिद्धांतों के रूप में मान्यता देता है — नहीं होगा, तब तक राजनीतिक लोकतंत्र टिक नहीं सकता। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि आंबेडकर ने यह भी चेतावनी दी थी कि भारत विरोधाभासों से भरे जीवन में प्रवेश कर रहा है, जहां राजनीति में तो समानता होगी, लेकिन उसके सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता बनी रहेगी।